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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ प्राथमिकी याचिका को अस्वीकार किया

रमेश उपाध्याय द्वारा जगद्गुरु रामभद्राचार्य पर आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप लगाते हुए दायर की गई आपराधिक रिट याचिका को खंडपीठ ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने बताया कि शिकायतकर्ता को पहले मजिस्ट्रेट के पास जाकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के तहत उपाय अपनाना चाहिए, बजाय सीधे हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत आयें।

5 सितंबर 2026 को 12:31 pm बजे
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ प्राथमिकी याचिका को अस्वीकार किया

सौजन्य से:- Jagran

Allahabad High Court : जगदगुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग वाली याचिका खारिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा ...और पढ़ें

HighLights

- खंडपीठ ने आपराधिक रिट याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया

- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याची से कहा- पहले मजिस्ट्रेट के पास जाएं

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि पुलिस प्राथमिकी नहीं लिखे तो सीधे हाई कोर्ट आने के बजाय पहले कानून में दिए गए उपाय अपनाने चाहिए। न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने रमेश उपाध्याय की आपराधिक रिट याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।

आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप लगाया

याची का आरोप था कि एक वीडियो में जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने उपाध्याय समुदाय और धार्मिक व्यक्तित्वों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हुआ, इससे उनकी भावनाएं आहत हुई। उन्होंने वाराणसी पुलिस आयुक्त से शिकायत कर एफआईआर की मांग की थी। राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया। कहा गया कि याची ने संबंधित थाने या मजिस्ट्रेट से संपर्क नहीं किया और पुलिस को शिकायत मिलने का कोई सबूत भी रिकार्ड पर नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कोर्ट ने दिया हवाला

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्राथमिकी न दर्ज होने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जाया जा सकता है। मजिस्ट्रेट एफआईआर दर्ज कराने, जांच का आदेश देने और निगरानी करने का अधिकार रखता है। वैधानिक रास्ता छोड़कर सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आने से संवैधानिक अदालत प्रथम स्तर का मंच बन जाएगी, जो उचित नहीं है। याची को नियमानुसार उपाय अपनाने की छूट दी गई है।

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