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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जब्त निजी जेवरों की शीघ्र रिलीज़ का आदेश दिया और नीट काउंसलिंग में सीट छोड़ने पर रोक को वैध ठहराया

कोर्ट ने वाराणसी की अदालत द्वारा निजी जेवरों को कई वर्षों तक थाने में रखने के आदेश को रद्द कर, फोटो‑पंचनामा तैयार कर वास्तविक मालिक को एक माह के भीतर मुचलके पर रिलीज़ करने की निर्देश दिया। साथ ही, नीट यूजी काउंसलिंग में सीट छोड़ने वाले छात्रों पर अगले सत्र में प्रवेश से वंचित करने वाले शासनादेश को वैध मानते हुए याचिका खारिज कर दी गई।

5 सितंबर 2026 को 10:31 pm बजे
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जब्त निजी जेवरों की शीघ्र रिलीज़ का आदेश दिया और नीट काउंसलिंग में सीट छोड़ने पर रोक को वैध ठहराया

सौजन्य से:- Jagran

'मुचलके पर रिलीज किए जाएं जब्त जेवर, एक माह में हो फैसला' इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द किया वाराणसी की अदालत का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट में जब्त निजी जेवरों को मालखाने में अनावश्यक रूप से रखने को जनहित में ...और पढ़ें

HighLights

- एनडीपीएस एक्ट में जब्त जेवर तुरंत रिलीज हों।

- मालखाने में वर्षों तक रखना जनहित में नहीं।

- वाराणसी अदालत का आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द किया।

जागरण संवाददाता, संवाददाता प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि एनडीपीएस एक्ट में जब्त निजी जेवर अनावश्यक रूप से वर्षों तक मालखाने में रखना जनहित और न्यायहित में नहीं है। कोर्ट को उसका फोटो-पंचनामा तैयार कराकर वास्तविक स्वामी को मुचलके पर रिलीज कर देना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की एकलपीठ ने वाराणसी के संदीप इंद्रजीत तिवारी की याचिका स्वीकार कर ली है। निर्देश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार अधीनस्थ अदालत याची की अर्जी महीने भर में निस्तारित करे।

याची के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत थाना एनसीबी लखनऊ जोन वाराणसी में मुकदमा दर्ज है। पुलिस ने चार अगस्त 2023 को याची को गिरफ्तार किया था। उससे स्वर्ण चेन मय पेंडेंट, तीन स्वर्ण अंगूठियां, गोल्ड ब्रेसलेट और 850 रुपये बरामदगी दिखाई गई। उसी दिन फर्द भी तैयार हुई। याची ने 23 मई 2025 को वाराणसी की अदालत में अर्जी देकर कहा कि ये वस्तुएं केस प्रापर्टी नहीं हैं, इन पर कोई अन्य दावेदार भी नहीं है। पत्नी द्वारा खरीदे गए जेवर का एस्टीमेट भी पेश किया।

एनसीबी उपनिरीक्षक ने आपत्ति दाखिल कर आशंका जताई कि ये वस्तुएं मादक पदार्थों की अवैध बिक्री से अर्जित लाभ से खरीदी गई हो सकती हैं। अपर जिला व सत्र न्यायाधीश कोर्ट नंबर 14 ने तीन जुलाई 2025 को याची के जेवरों को रिलीज करने की अर्जी इसी आशंका पर खारिज भी कर दी। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। दोनों पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने कहा- ट्रायल कोर्ट ने स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों पर विचार ही नहीं किया। सिर्फ जांच एजेंसी की मौखिक आशंका पर किसी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत वस्तुओं के उपभोग से वंचित रखना उचित नहीं है।

आज तक उन वस्तुओं पर किसी अन्य व्यक्ति ने दावा भी नहीं किया है। इस क्रम में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2003) का हवाला देते हुए कहा कि संपत्ति के निस्तारण के अधिकार का प्रयोग शीघ्रता और विवेकपूर्ण तरीके से होना चाहिए, उसे लंबे समय तक थाने में रखना उपयोगी नहीं है। कोर्ट ने याची को स्वतंत्रता दी है कि वह फैसले की तिथि से एक माह के भीतर स्वामित्व दर्शाने वाले दस्तावेजों के साथ ट्रायल कोर्ट में फिर से उचित अर्जी दे।

नीट काउंसलिंग में सीट छोड़ने पर साल भर रोक का शासनादेश वैध

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में नीट यूजी काउंसलिंग के दौरान सीट छोड़ने पर अगले सत्र में रोक लगाने वाले राज्य सरकार के आदेशन को वैध ठहराया है। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने जौनपुर निवासी रोहन यादव की याचिका खारिज कर दी है।

याची ने नीट यूजी 2025 में सफल होकर किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया था। बेहतर रैंक के लिए वह नीट यूजी 2026 में शामिल हुआ और फिर से काउंसलिंग में शामिल होने की इच्छा जताई। उसे पता चला कि 26 जून 2024 के शासनादेश के तहत यदि कोई छात्र कोर्स पूरा होने से पहले सीट छोड़ता है तो उसे अगले शैक्षणिक सत्र की प्रवेश प्रक्रिया से वंचित कर दिया जाएगा।

पहले सीट छोड़ने पर बांड मनी वसूली का प्रविधान था, जिसे अब खत्म कर रोक का प्रविधान लाया गया है। याची ने इसे अनुच्छेद 14, 19 और 21 के खिलाफ बताया। उड़ीसा हाई कोर्ट के डा. सत्यब्रत कानूनगो और बाम्बे हाई कोर्ट के मैथिली कदम के फैसलों का हवाला दिया, जिसमें ऐसी रोक को अनुचित ठहराया गया था। राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया।

कोर्ट ने कहा कि शासनादेश का विषय ही नीट से प्रवेश पाने वाले छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर जारी किया गया है। इसमें वे छात्र भी शामिल हैं जो प्रतियोगी परीक्षा में बैठे लेकिन सीट न पा सके। यदि याची को अनुमति दी गई तो एक साल बर्बाद होगा और उसकी खाली की गई सीट लैप्स हो जाएगी, जिससे एक योग्य वंचित छात्र के संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा। याची चाहता तो एक साल रुककर दोबारा तैयारी कर सकता था, बजाय प्रवेश लेकर सीट खाली करने के। कोर्ट ने उड़ीसा और बाम्बे उच्च न्यायालयों के फैसलों से असहमति जताई।

कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सत्यब्रत वाले मामले में एसएलपी खारिज करते हुए कानून का प्रश्न खुला रखा था और दार-उर-सलाम ट्रस्ट केस में स्पष्ट किया था कि दूसरे राउंड के बाद सीट छोड़ने की अनुमति नहीं होगी, ताकि सीट ब्लाकिंग रोकी जा सके। कोर्ट ने कहा कि सीटों की संख्या अभ्यर्थियों से कम है, इसलिए लैप्स होने वाली सीटों को रोकने के लिए दंडात्मक प्रविधान उचित है। यह वंचित अभ्यर्थियों के साथ न्यायसंगत व्यवहार है। याचिका में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता।

दो अभ्यर्थियों को उनकी कापियां जल्द दिखाएं: कोर्ट पीसीएस मेंस-2024

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उप्र लोक सेवा आयोग को उत्तर प्रदेश सम्मिलित राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा मुख्य परीक्षा 2024 में सम्मलित दो अभ्यर्थियों को 26 नवंबर तक इंतजार कराने की बजाय तीन सप्ताह के भीतर जल्द तारीख तय कर उनकी कापियों का निरीक्षण कराने का आदेश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने सत्यम सिंह व एक अन्य की याचिका पर उनके अधिक्ता संजय कुमार यादव को सुन कर दिया है। याची ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत गत 26 अप्रैल को आयोग को प्रार्थनापत्र देकर पीसीएस मेंस 2024 की सभी उत्तर पुस्तिकाओं (सामान्य हिंदी, निबंध एवं सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र एक से छह तक) के निरीक्षण और स्क्रूटनी की मांग की थी।

आयोग के अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि उत्तर पुस्तिकाओं के निरीक्षण के लिए आयोग ने 26 नवंबर की तारीख निर्धारित की है। याची के अधिवक्ता ने कहा कि अप्रैल माह में ही आवेदन कर दिया गया था। इसके बावजूद आयोग ने लगभग सात महीने बाद की तारीख तय की है जो अनुचित और अत्यधिक विलंबकारी है।

एपीओ भर्ती में आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर चार सवाल तय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर चार सवाल तय किए हैं। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकलपीठ ने पंकज वर्मा व अन्य की याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि ये सभी प्रश्न फिलहाल तात्कालिक हैं और पक्षकारों के अधिवक्ताओं की अंतिम बहस सुनने के बाद ही इन पर निर्णय लिया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई सात सितंबर 2026 को होगी।

अदालत द्वारा तय पहला सवाल यह है कि क्या भर्ती विज्ञापन के पैराग्राफ 16 में दी गई शर्त बिना किसी वैधानिक प्रविधान के मान्य ठहराई जा सकती है। दूसरा तय यह सवाल है कि "अनारक्षित श्रेणी" का अर्थ केवल अनारक्षित अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित श्रेणी है या इसे मेरिट के आधार पर खुली श्रेणी के रूप में भरा जाना चाहिए?

तीसरा सवाल यह किया गया है कि प्रारंभिक परीक्षा के बाद सूची तैयार करते समय क्या यह केवल संबंधित श्रेणी के अभ्यर्थियों तक सीमित रहेगी या अनारक्षित श्रेणी में मेरिट के आधार पर भरी जाएगी। कोर्ट ने चौथा सवाल यह तय किया है कि क्या प्रारंभिक परीक्षा के स्क्रीनिंग चरण में चयन की प्रक्रिया शामिल मानी जाएगी? याचीगण की ओर से अधिवक्ता अनुराग त्रिपाठी ने पक्ष रखा, जबकि राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और मनीष गोयल ने दलीलें प्रस्तुत कीं।

जगदगुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ केस की मांग में याचिका खारिज

इलाबाद हाई कोर्ट ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि पुलिस प्राथमिकी नहीं लिखे तो सीधे हाई कोर्ट आने के बजाय पहले कानून में दिए गए उपाय अपनाने चाहिए। न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने रमेश उपाध्याय की आपराधिक रिट याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।

याची का आरोप था कि एक वीडियो में जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने उपाध्याय समुदाय और धार्मिक व्यक्तित्वों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हुआ, इससे उनकी भावनाएं आहत हुई। उन्होंने वाराणसी पुलिस आयुक्त से शिकायत कर एफआइआर की मांग की थी। राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया।

कहा गया कि याची ने संबंधित थाने या मजिस्ट्रेट से संपर्क नहीं किया और पुलिस को शिकायत मिलने का कोई सुबूत भी रिकार्ड पर नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्राथमिकी न दर्ज होने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जाया जा सकता है।

मजिस्ट्रेट एफआइआर दर्ज कराने, जांच का आदेश देने और निगरानी करने का अधिकार रखता है। वैधानिक रास्ता छोड़कर सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट आने से संवैधानिक अदालत प्रथम स्तर का मंच बन जाएगी, जो उचित नहीं है। याची को नियमानुसार उपाय अपनाने की छूट दी गई है।

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