सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर फोन पर ठग का 8 साल का कारावास
सुप्रीम कोर्ट के जज होने का दांव लगाकर न्यायिक अधिकारी पूनम चौधरी से फ़ोन करके जमानत की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश में चंद्रशेखर को 8 साल की सज़ा सुनाई गई। 170, 189 और 507 धाराओं के तहत कठोर कारावास और जुर्माने के साथ, यह सज़ा लगातार चलकर कुल 8 वर्ष बनती है।

सौजन्य से:- ABP News
सुकेश चंद्रशेखर को 8 साल की सजा, कोर्ट बोला- 'जज बनकर कॉल करना...'
सुकेश चंद्रशेखर ने 28 अप्रैल 2017 को दक्षिण भारत का सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर न्यायिक अधिकारी पूनम चौधरी को कई फोन किए. इसी मामले में उसे सजा हुई है.
दिल्ली की एक अदालत ने ठग सुकेश चंद्रशेखर को सुप्रीम कोर्ट जज बनकर जमानत की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश के मामले में 8 साल जेल की सजा सुनाई है.
चंद्रशेखर को भारतीय दंड संहिता की धारा 170 के तहत दो साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने, धारा 189 के तहत दो साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने और धारा 507 के तहत चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई.
यह आदेश 29 अगस्त को आया था. तीस हजारी कोर्ट की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा ने कहा, ‘‘सजा से यह स्पष्ट होना चाहिए कि आपराधिक न्याय व्यवस्था एक बार किए गए सामान्य गैरकानूनी कृत्य और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज को जानबूझकर प्रभावित करने, डराने या उसमें दखल देने के लिए लगातार और सुनियोजित तरीके से किए गए कृत्यों के बीच अंतर करती है.’’
तीनों सजाएं लगातार चलेंगी
अदालत ने निर्देश दिया कि तीनों सजाएं एक के बाद एक लगातार चलेंगी, जिससे कुल जेल की सजा आठ साल होगी. जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में चंद्रशेखर को एक महीने की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी. अदालत ने 20 अगस्त को चंद्रशेखर को धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी ठहराया था. ये धाराएं किसी अन्य व्यक्ति या पदाधिकारी का रूप धारण करने तथा धमकी देने से संबंधित हैं.
चंद्रशेखर पर क्या लगा आरोप?
आदेश के अनुसार, सुकेश चंद्रशेखर ने 28 अप्रैल, 2017 को न्यायिक अधिकारी पूनम चौधरी को कई फोन किए थे. उसने खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताया. अदालत ने कहा कि उसका उद्देश्य एक अन्य आपराधिक मामले में अपनी जमानत से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करना था. अदालत ने उसके इस कृत्य को न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता पर हमला बताया. अदालत ने कहा, ‘‘जिस व्यक्ति का रूप धारण (सुप्रीम कोर्ट जज बनकर कॉल करना) किया गया, उसका चयन संयोग से नहीं हुआ था.’’
कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि न्यायिक अधिकारी को धोखा देने या जमानत हासिल करने में नाकाम रहने को सजा कम करने के आधार के रूप में देखा जाना चाहिए.
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