जस्टिस भुइयां का ‘विधिवेत्ता’ पर खेद: 76 वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं हुआ नियुक्ति
30 अगस्त 2026 को NLU दिल्ली के LLM समारोह में जस्टिस उज्जल भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 124(3) के ‘विधिवेत्ता’ प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा कि 76 वर्षों में इस श्रेणी के किसी को सुप्रीम कोर्ट जज नहीं बनाया गया। उन्होंने यह संभावना जताई कि भारतीय कानूनी अकादमिक जगत में गहराई की कमी और कॉलेजियम तथा केंद्र सरकार द्वारा इस विकल्प को नज़रअंदाज़ करने के कारण यह स्थिति बनी है। उनके बयान ने कॉलेजियम प्रणाली और न्यायपालिका में विविधता पर नई बहस का मार्ग प्रशस्त किया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
यही वजह है कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी को सिर्फ अकादमिक विमर्श नहीं, बल्कि भारत में जजों की नियुक्ति, कॉलेजियम सिस्टम और न्यायपालिका में विविधता की बड़ी बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है।
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जस्टिस भुइयां ने आखिर कहा क्या?
दरअसल, 30 अगस्त 2026 को NLU दिल्ली के LLM कार्यक्रम के दीक्षांत समारोह में जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि संविधान में ‘विधिवेत्ता’ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने का प्रावधान होने के बावजूद 76 साल में इस श्रेणी से कोई व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंचा। उन्होंने इसे अफसोसजनक बताते हुए कहा कि एक distinguished jurist यानी विशिष्ट विधिवेत्ता ...अपनी कानूनी विद्वता के जरिए सुप्रीम कोर्ट की निर्णय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।उनका जोर खास तौर पर कानून पढ़ाने, शोध करने और कानून के क्षेत्र में गंभीर अकादमिक योगदान देने वाले लोगों पर था। जस्टिस भुइयां के मुताबिक, किसी व्यक्ति को विशिष्ट विधिवेत्ता मानने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसने अदालत में वकालत की हो।
संविधान में क्या है ‘Distinguished Jurist’ का प्रावधान?
हमारे भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) सुप्रीम कोर्ट के जज बनने की योग्यता बताता है। इसके तहत व्यक्ति:- भारत का नागरिक हो और निर्धारित न्यायिक अनुभव रखता हो; या
- हाई कोर्ट में निर्धारित अवधि तक जज रहा हो; या
- हाई कोर्ट में निर्धारित अवधि तक अधिवक्ता रहा हो; या
- राष्ट्रपति की राय में “distinguished jurist” यानी विशिष्ट विधिवेत्ता हो।
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76 साल में कोई ‘Distinguished Jurist’ जज क्यों नहीं बना?
मामले में जस्टिस भुइयां की टिप्पणी और उनके कहे पर ध्यान दें तो उन्होंने इसके दो संभावित कारण बताए। पहली संभावना...पहले केंद्र सरकार और कॉलेजियम व्यवस्था आने के बाद कॉलेजियम को लगा हो कि भारतीय कानूनी अकादमिक जगत में सुप्रीम कोर्ट जज के लिए पर्याप्त गहराई नहीं है। दूसरी बात...केंद्र सरकार और कॉलेजियम ने इस संवैधानिक प्रावधान को गंभीरता से तलाशा ही नहीं। यानी जस्टिस भुइयां ने यह आरोप नहीं लगाया कि कॉलेजियम ने जानबूझकर अकादमिक लोगों को बाहर रखा। उन्होंने एक संवैधानिक विकल्प के अब तक इस्तेमाल न किए जाने पर सवाल उठाया है। और फिर यहीं से कॉलेजियम पर बहस का रास्ता खुलता है।क्या जस्टिस भुइयां ने कॉलेजियम सिस्टम पर निशाना साधा है?
दरअसल, जस्टिस भुइयां ने कहीं भी कॉलेजियम व्यवस्था को असंवैधानिक या विफल नहीं बताया। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों की नियुक्तियां गलत तरीके से हुई हैं। उनकी टिप्पणी का निशाना कुछ और है। भारत में सुप्रीम कोर्ट जजों के चयन की प्रक्रिया ने Article 124(3)(c) में उपलब्ध ‘distinguished jurist’ विकल्प को क्यों नहीं अपनाया? उन्होंने खुद दो संभावनाओं में कॉलेजियम के साथ केंद्र सरकार को भी शामिल किया है। इसलिए इसे केवल कॉलेजियम पर हमला कहना... उनके वक्तव्य को जरूरत से ज्यादा राजनीतिक रंग देना होगा।जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड, इस्तीफा और 'संवैधानिक संकट', क्या इस्तीफे के बाद भी संसद जस्टिस वर्मा पर 'महाभियोग' शुरू कर सकती है?
‘Distinguished Jurist’ का मतलब क्या सिर्फ कानून का प्रोफेसर है?
जस्टिस भुइयां ने ‘विधिवेत्ता’ की व्याख्या को काफी व्यापक बताया। उनके अनुसार कानून के क्षेत्र में विशेषज्ञता और ज्ञान रखने वाला व्यक्ति विधिवेत्ता हो सकता है। वकील और जज भी विधिवेत्ता हो सकते हैं, लेकिन Article 124(3) के संदर्भ में विधिवेत्ता की श्रेणी इन दोनों से आगे जाती है। इसका मतलब यह हो सकता है कि किसी विश्वविद्यालय के ऐसे कानूनविद, जिसने:- कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध किया हो,
- संवैधानिक या सार्वजनिक कानून के विकास में योगदान दिया हो,
- कानून की अकादमिक दुनिया में असाधारण प्रतिष्ठा बनाई हो,
- या विधि-विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो
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