सुप्रीम कोर्ट ने कमजोर इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के कारण मर्डर केस में आरोपी को बरी किया
कोर्ट ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज और सेलफोन रिकॉर्ड बिना 65B सर्टिफिकेट के सबूत नहीं माने गए, और अभियोजन ने केवल कबूलनामे और अनिश्चित गवाहियों पर भरोसा किया था। टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड और किरायेदारी के सबूत भी अविश्वसनीय पाए गए, जिससे आरोपी की सजा रद्द कर दी गई।

सौजन्य से:- Navbharat Times
जस्टिस जे बी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने कोंडापाका श्रीधर (उर्फ शेखर, मधु, गोपी या चिन्ना) की सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन का मामला कमजोर गवाही, ठीक से साबित न किए गए इलेक्ट्रॉनिक सबूत और ऐसी अविश्वसनीय जांच पर टिका था जो काफी हद तक कबूलनामे पर निर्भर थी।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि एविडेंस एक्ट की धारा 106 प्रॉसिक्यूशन को बुनियादी तथ्यों जैसे कि किसी जगह पर खास कब्जा या किरायेदारी को साबित करने की अपनी मुख्य जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती है; यह जिम्मेदारी तब तक प्रॉसिक्यूशन की ही रहती है जब तक कि आरोपी पर शव की मौजूदगी के बारे में सफाई देने का बोझ न डाला जाए।
कहानी में आगे बढ़ने से पहले पूरा मामला समझिए
डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला एक ऐसे व्यक्ति के अपहरण और हत्या से जुड़ा था, जो हैदराबाद गया था। उसके पिता से 2 लाख रुपये की फिरौती मांगी गई और उन्होंने गीतांजलि नाम की महिला से जुड़े एक खाते में 1.5 लाख रुपये जमा कर दिए। बाद में पीड़ित का शव एक अपार्टमेंट के अंदर रेफ्रिजरेटर में छिपा हुआ मिला। छह लोगों पर आरोप लगाए गए। एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई; ट्रायल कोर्ट ने बाकी पांचों को दोषी ठहराया। हाई कोर्ट ने चार लोगों को बरी कर दिया, लेकिन श्रीधर (A1) की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।कबूलनामे पर आधारित अभियोजन पक्ष जानिए
मुख्य रूप से कबूलनामे पर आधारित अभियोजन पक्ष का कहना था कि श्रीधर ने सह-आरोपियों के साथ मिलकर अपहरण की साजिश रची थी। ट्रायल कोर्ट ने कई बातों पर भरोसा किया, जैसे पीड़ित का गायब होना, फिरौती के लिए कॉल और पैसे जमा करना, पैसे की बरामदगी, गिरफ्तारी तक ले जाने वाले कॉल डिटेल रिकॉर्ड, शव का मिलना, फ्लैट में श्रीधर के किराएदार होने का आरोप, 'आखिरी बार देखे जाने' का सबूत और टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड।सुप्रीम कोर्ट को मामला कमजोर कहां नजर आया?
सुप्रीम कोर्ट को ये कड़ियां टूटी हुई लगीं। हाई कोर्ट ने खुद ही ATM से पैसे निकालने के CCTV फुटेज को खारिज कर दिया था क्योंकि उसमें आरोपी की पहचान साफ नहीं थी और सेक्शन 65B का सर्टिफिकेट भी नहीं था। इसी तरह सेलफोन रिकॉर्ड को भी खारिज कर दिया गया क्योंकि सर्विस प्रोवाइडर के नोडल अधिकारी से पूछताछ नहीं की गई थी और कोई 65B सर्टिफिकेट पेश नहीं किया गया था।टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड को अविश्वसनीय माना
तीन आरोपियों की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड को अविश्वसनीय माना गया क्योंकि गवाह को पहले ही संदिग्धों की तस्वीरें दिखाई गई थीं। कोर्ट ने 3 सितंबर, 2026 को अपने फैसले में कहा कि 'आखिरी बार देखे जाने' वाली थ्योरी के समर्थन में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं था। जिस फ्लैट से शव बरामद हुआ था, उसके बारे में कोर्ट ने पाया कि वहां मालिकाना हक या श्रीधर के अकेले कब्ज़े या किराएदार होने का कोई सबूत नहीं था। इस आधार के बिना, उससे स्पष्टीकरण मांगने के लिए सेक्शन 106 लागू नहीं किया जा सकता था। किसी भी स्वतंत्र गवाह ने कथित खुलासे वाले बयानों या शव की बरामदगी का समर्थन नहीं किया।बेंच ने कहा कि दो आरोपियों से बरामद पैसे का संबंध फिरौती की रकम से नहीं जोड़ा जा सका और जिस खाते में फिरौती की रकम जमा की गई थी, उसकी कभी ठीक से जांच नहीं की गई। बेंच ने कहा, 'अभियोजन पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के सामने कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया। जांच खराब थी और सिर्फ कबूलनामे पर आधारित थी।'
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
इल्लाहाबाद हाई कोर्ट ने इत्तेहाद‑ए‑मिल्लत काउंसिल अध्यक्ष की जमानत याचिका खारिज, 'सर‑तन‑से‑जुदा' नारे को राष्ट्रीय एकता की चुनौती माना

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्षद पर डॉक्टर‑हिंसा केस में जमानत पर कड़ी चेतावनी दी

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों पर हिंसा को कड़ा संदेश: नेताओं को जवाबदेह ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने 3‑महीने की सीमा तय की, फिर फैसला देने में दो साल लगाए

लाम डोंग प्रांत ने व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के प्रचार-प्रसार के साथ साइबर सुरक्षा अभ्यास कार्यक्रम का शुभारंभ किया

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा: विदेश में लापता भारतीय की जाँच का कानूनी आधार क्या?

शिमला कोर्ट ने शादी के झांसे के आरोप में आरोपी को बरी किया

हाईकोर्ट ने तय किया: शरिया कोर्ट नहीं बना सकता वैध तलाक, केवल धार्मिक राय दे सकता है
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट ने दो साल की देरी के बाद 3‑महीने की सीमा तोड़ते हुए आदेश सुनाया
- साइंस‑आधारित जांच व निजता: सुप्रीम कोर्ट ने किया जरूरी संतुलन पर ज़ोर
- शिवसेना पार्षद के डॉक्टर पर हमले के जमानत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए, सड़कों पर ऐसे लोगों का हक नहीं
- छह महीने से अधिक आरक्षित फैसले पर पुनः सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश को आवेदन का अधिकार
- 12 सितंबर को नेशनल लोक अदालत: पेंडिंग ट्रैफिक चालानों का आसान निपटारा और बड़ी छूट
- सुप्रीम कोर्ट ने नगा उग्रवादी होपेसन निंगशेन की उम्रकैद की सजा को निलंबित कर, अपील तक दिल्ली से बाहर न जाने की शर्त लगाई
- सच्चाई की तलाश में: सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल बाद दुष्कर्म के दोषी को रिहा किया
- हाईकोर्ट ने कहा: क्लोजर रिपोर्ट के बाद भी मजिस्ट्रेट सीधे तलब कर सकते हैं

