सुप्रीम कोर्ट ने दो साल के बाद बकाया बिजली बिल की वसूली पर लगाया कड़ी शर्त
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो साल से अधिक पुराने बिजली बकाया की वसूली तभी मान्य होगी जब वह लगातार बिलों में बकाया के रूप में दर्ज हो। उत्तर प्रदेश की वितरण कंपनी द्वारा 1998 के बकाया को नौ साल बाद वसूले जाने की कोशिश को समय सीमा के उल्लंघन के कारण खारिज किया गया। इस कारण कंपनी की ₹57.74 लाख की माँग निरस्त हुई।

सौजन्य से:- Navbharat Times
किसी बिजली उपभोक्ता से दो साल की अवधि के बाद पुराना बकाया वसूलने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि वह राशि लगातार बिजली बिलों में वसूली योग्य बकाया के रूप में दर्ज हो
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने Electricity Act के बारे में एक अहम बात कही है। जिन बिजली उपभोक्ताओं के पुराने बकाये हैं..उसमें बकाए राशि की वसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि Electricity Act 2003 की Section 56(2) के तहत किसी बिजली उपभोक्ता से दो साल की अवधि के बाद पुराना बकाया वसूलने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि वह राशि लगातार बिजली बिलों में वसूली-योग्य बकाया के रूप में दर्ज की गई थी। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की वितरण कंपनी की करीब ₹57.74 लाख की मांग को समय-सीमा से बाधित माना।
बिजली बिल बकाये का क्या था पूरा मामला?
मामला उत्तर प्रदेश की वितरण कंपनी Dakschinanchal Vidyut Vitran Nigam Ltd. और उसके उपभोक्ता के बीच बिजली शुल्क को लेकर था। उपभोक्ता के लिए पहले 2000 KVA लोड की व्यवस्था थी और बाद में कंपनी ने अतिरिक्त 2000 KVA लोड देने की पेशकश की थी। उपभोक्ता ने अतिरिक्त लोड लेने में रुचि नहीं दिखाई और उसे वास्तव में इस्तेमाल भी नहीं किया। इसके बावजूद कंपनी ने फरवरी 1998 से सितंबर 1998 की अवधि के लिए ₹57,74,164 का Minimum Consumption Guarantee Charges मांग लिया।
नौ साल बाद आयी बकाए की याद, मांगे करीब ₹57.74
दरअसल ...इस मामले में विवादित राशि से जुड़ी अवधि 1998 की थी, लेकिन लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार वितरण कंपनी ने पहली बार 13 फरवरी 2007 को मांग उठाई। यानी कथित देनदारी और मांग के बीच लगभग नौ साल का अंतर था। ऐसे में उपभोक्ता ने Electricity Ombudsman के समक्ष इस मांग को चुनौती दी। Ombudsman ने बिजली कानून के Section 56(2) के तहत इसे समय-सीमा से बाधित मानते हुए मांग को खारिज कर दिया।
इस प्रावधान के अनुसार...किसी उपभोक्ता से कोई देय राशि उसके पहली बार बकाए होने की तारीख से दो साल बाद वसूली नहीं की जा सकती। इसका अपवाद तब है जब उस राशि को लगातार बिजली शुल्क के बकाए राशि के रूप में दिखाया गया हो। इसलिए दो साल की सीमा के बाद वसूली के लिए लगातार बकाए दिखाए जाने की शर्त महत्वपूर्ण बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वैधानिक आवश्यकता को मौजूदा मामले में लागू किया।
Electricity Act की Section 56(2) क्यों महत्वपूर्ण है?
सुप्रीम कोर्ट का तथ्यों पर ध्यान, समाझाया कानून
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश की बिजली वितरण कंपनी दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की अपील पर सुनवाई की।
अदालत ने ध्यान दिया कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे साबित हो कि 1998 से 2007 तक राशि लगातार बकाए के रूप में दिखाई गई थी। इसलिए 13 फरवरी 2007 को पहली बार उठाई गई मांग समय-सीमा के कारण वर्जित थी। जिसकी चर्चा Electricity Act की धारा 56(2) करती है।
इसके बाद लगभग नौ साल बाद उस अवधि के लिए Minimum Consumption Guarantee Charges की मांग की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर माना कि संबंधित रकम को लगातार वसूली योग्य बकाए के रूप में दिखाने की कानूनी शर्त पूरी नहीं हुई।
कोर्ट ने यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि अतिरिक्त 2000 KVA load facility वास्तव में उपभोक्ता ने इस्तेमाल नहीं की थी। नियमित बिजली बिल जारी होते रहे, लेकिन अतिरिक्त 2000 KVA से संबंधित राशि उन बिलों में नहीं दिखाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में K.C. Ninan v. Kerala State Electricity Board और Assistant Engineer (D1), Ajmer Vidyut Vitran Nigam Ltd. v. Rahamatullah Khan जैसे मामलों का भी संदर्भ लिया। 2020 के Rahamatullah Khan मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि Section 56(2) में first due का संबंध उस समय से है जब बिल के जरिए रकम पहली बार देय होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने वितरण कंपनी की अपील खारिज करते हुए हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने माना कि पुराने बकाये को दो साल की सीमा के बाद वसूलने के लिए उसे लगातार महीने के बिल में बकाये रकम के तौर पर दिखाना जरूरी है।
दरअसल...सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि बिजली कंपनी किसी भी पुराने बकाये की हर परिस्थिति में वसूली नहीं कर सकती। मुख्य बात यह है कि Section 56(2) के तहत दो साल की statutory limitation के बाद recovery के लिए लगातार बकाए दिखाए जाने की शर्त पूरी होनी चाहिए। इसलिए उपभोक्ताओं के पुराने बिजली बकाये के विवाद में बिजली बिलों का पूरा रिकॉर्ड और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कथित बकाया बाद के बिलों में लगातार दर्ज था या नहीं।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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