दिल्ली अदालत ने 1984 सिख दंगों की दो मौतों के FIR आदेश को रद्द किया, सहानुभुति को कानूनी आधार नहीं माना
विशेष न्यायाधीश ने 2017 के मजिस्ट्रेट आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें अमीर सिंह व नरेंद्र सिंह की मौत की जांच हेतु FIR दर्ज करने का निर्देश था। अदालत ने कहा कि पीड़ितों के प्रति सहानुभूति समझ में आती है, परन्तु केवल भावनात्मक आधार पर कानूनी कार्रवाई जारी नहीं रखी जा सकती।

सौजन्य से:- Prabhat Khabar
सिख दंगे: 1984 में दो लोगों की मौत पर FIR का आदेश रद्द, कोर्ट ने कहा- सहानुभूति कानून का आधार नहीं
दिल्ली अदालत ने 1984 सिख दंगे में दो मौतों की जांच के लिए FIR दर्ज करने के आदेश को किया रद्द. फोटो-AI
दिल्ली की एक अदालत ने 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े दो लोगों की मौत के मामले में अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने मजिस्ट्रेट अदालत के FIR दर्ज करने के आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि सहानुभूति कानूनी कार्रवाई का आधार नहीं हो सकती.
साल 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान दो लोगों की मौत से जुड़े मामले में दिल्ली की एक अदालत ने अहम फैसला सुनाया है. पीटीआई न्यूज एजेंसी मुताबिक, विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अमीर सिंह और नरेंद्र सिंह की मौत के मामले की जांच के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया था. अदालत ने कहा कि किसी की मौत के प्रति सहानुभूति अपनी जगह है, लेकिन केवल भावनात्मक आधार पर कानूनी कार्रवाई जारी नहीं रखी जा सकती.
2017 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दिया था FIR दर्ज करने का निर्देश
विशेष न्यायाधीश भूपिंदर सिंह दिल्ली पुलिस की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. यह याचिका जनवरी 2017 में मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थी. मजिस्ट्रेट अदालत ने पहाड़गंज थाना प्रभारी को 1984 के दंगों के दौरान अमीर सिंह और नरेंद्र सिंह की मौत के संबंध में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था.
शिकायतकर्ता की पीड़ा समझती है अदालत
विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि अदालत शिकायतकर्ता की पीड़ा और घटना से जुड़ी त्रासदी को समझती है. हालांकि, अदालत को किसी भी मामले में उपलब्ध सामग्री और संबंधित कानून के आधार पर ही फैसला करना होता है. न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि भावनात्मक पहलू कानूनी प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकता.
'सहानुभूति कानूनी आधार की जगह नहीं ले सकती'
31 अगस्त को दिए आदेश में अदालत ने कहा, “मृत्यु के प्रति सहानुभूति है लेकिन घटना चाहे कितनी भी सच्ची और समझ में आने वाली क्यों न हो, मामले में कानूनी कार्यवाही जारी रखने के लिए जरूरी कानूनी आधार का विकल्प नहीं हो सकती.” अदालत की यह टिप्पणी मामले में कानूनी आधार की अहमियत को रेखांकित करती है.
धारा 156(3) के तहत दाखिल हुई थी याचिका
मजिस्ट्रेट अदालत में याचिका तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156(3) के तहत दाखिल की गई थी। इस प्रावधान के तहत मजिस्ट्रेट किसी संज्ञेय अपराध की जांच के लिए संबंधित थाने के प्रभारी अधिकारी को निर्देश दे सकता है. अब इसी तरह का प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) में है.
दो पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग
याचिका में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने के साथ तत्कालीन मध्य दिल्ली के पुलिस उपायुक्त अमोद कंठ और पहाड़गंज के तत्कालीन थाना प्रभारी एस एस मनन के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की गई थी। दोनों अधिकारियों की ओर से अधिवक्ता सूरज राठी अदालत में पेश हुए.
अदालत ने FIR के निर्देश की प्रकृति पर भी उठाया सवाल
अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के निर्देश में किसी खास पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का स्पष्ट आदेश नहीं दिया गया था. अदालत के मुताबिक, उस निर्देश का उद्देश्य केवल “मौत के कारण का पता लगाना” था. इसी आधार पर विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट अदालत के जनवरी 2017 के आदेश को रद्द कर दिया.
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