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सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल जेल के बाद दोषसिद्धि रद्द की, आजीवन सजा को माना गया त्रुटिपूर्ण

16 साल और सात महीने जेल में रहने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न और हत्या के आरोपी की दोषसिद्धि को खारिज कर दिया। न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के सबूतों में कई लापता कड़ियों, अनभरोसे योग्य न्यायेतर स्वीकारोक्ति और DNA परीक्षण के अभाव को दोष सिद्ध करने का आधार न मानते हुए त्रुटिपूर्ण निर्णय की ओर इशारा किया।

2 सितंबर 2026 को 07:32 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल जेल के बाद दोषसिद्धि रद्द की, आजीवन सजा को माना गया त्रुटिपूर्ण

सौजन्य से:- etvbharat.com

16 साल और सात महीने जेल में बिताए... सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की दोषसिद्धि रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने व्यक्ति को दोषी ठहराने और आजीवन कारावास की सजा सुनाने में गलती की थी.

By Sumit Saxena

Published : September 2, 2026 at 10:49 PM IST

नई दिल्ली: 16 साल और सात महीने जेल में बिताने के बाद, एक व्यक्ति आखिरकार बरी हो गया. बुधवार को, सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न और उसकी हत्या के आरोपी व्यक्ति की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया. अदालत ने फैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष के सबूतों की कड़ी में "लापता कड़ियों" के कारण यह मामला टिकने लायक नहीं है.

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने कहा, "अभियोजन पक्ष (prosecution) के मामले की श्रृंखला में कई कड़ियां गायब हैं, जो हमारी राय में यह संदेह से परे साबित नहीं करती हैं कि आरोपी ने ही अपराध किया था. चूंकि हमारी राय में अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है, इसलिए इसका लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए."

पीठ ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराने और आजीवन कारावास की सजा सुनाने में गलती की थी और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी उनकी सजा को बरकरार रखकर गलती की थी.

पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष का यह मत कि आरोपी और मृतक को आखिरी बार एक साथ देखा गया था, गवाहों के बयानों से स्पष्ट रूप से साबित नहीं होता है. अदालत ने आगे कहा कि प्रासंगिक समय पर बच्चे के आरोपी के साथ होने का तथ्य भी निर्णायक सबूतों से स्थापित नहीं होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के गांव के सरपंच के सामने कथित न्यायेतर स्वीकारोक्ति के लिए कोई 'सही वजह' नहीं थी, जिससे न तो उसका और न ही पीड़ित का कोई लेना-देना था.

पीठ ने कहा, "न्यायेतर स्वीकारोक्ति साक्ष्य का एक कमजोर हिस्सा है और बिना किसी स्वतंत्र और ठोस पुख्ता परिस्थिति या सबूत के इसे अपने आप में दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता है.

पीठ ने कहा कि जहां कहीं भी अदालत अभियोजन पक्ष के संपूर्ण साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन करने के बाद किसी न्यायेतर स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि करना चाहती है, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह स्वीकारोक्ति विश्वास के योग्य हो और अन्य अभियोजन साक्ष्यों द्वारा उसकी पुष्टि होती हो."

पीठ ने कहा, "अगर, हालांकि, न्यायेतर स्वीकारोक्ति में महत्वपूर्ण विसंगतियां या अंतर्निहित असंभवताएं हैं और अभियोजन पक्ष के संस्करण के अनुसार यह विश्वसनीय प्रतीत नहीं होती है, तो अदालत के लिए इस तरह की स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्ध करना कठिन हो सकता है. ऐसे परिदृश्यों में, अदालत इस तरह के साक्ष्य को विचार से बाहर करने के लिए पूरी तरह से उचित होगी."

पीठ ने आगे कहा कि हालांकि पीड़ित के अंडरवियर पर सीमेन पाया गया था, लेकिन आरोपी के अंडरवियर पर मिले वीर्य और मृतक के मलाशय के नमूने (rectal swab) से प्राप्त वीर्य का मिलान करने के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं किया गया था.

पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने माना कि, चूंकि आरोपी शादीशुदा नहीं था, इसलिए उसने अपने अंडरवियर में सीमेन होने की कोई वजह नहीं बताई.

पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी और पीड़ित के बीच संबंध; प्रासंगिक समय पर आरोपी के साथ पीड़ित की उपस्थिति और यहां तक कि घटना स्थल पर आरोपी की उपस्थिति या आरोपी के किसी भी संबंध को उचित संदेह से परे स्पष्ट रूप से स्थापित करने में विफल रहा है.

पीठ ने कहा, अभियोजन पक्ष के मामले की सत्यता पर गंभीर संदेह है. अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही से इस संदेह को और बल मिलता है, जिन्होंने यह बयान दिया कि आरोपी को 12 मार्च 2007 को यानी कथित न्यायेतर स्वीकारोक्ति से दो दिन पहले पुलिस द्वारा लाया गया था.

कोर्ट ने कहा कि पीड़ित 11 मार्च, 2007 को लापता हो गया था और अगली सुबह उसका शव मिला था और अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि मौके से मृतक की चप्पलें और नमकीन का एक खुला पैकेट जब्त किया गया था.

पीठ ने उल्लेख किया कि जब्ती 12 मार्च 2007 को की गई थी, जबकि अपीलकर्ता द्वारा नमकीन का पैकेट खरीदने की कथित कहानी 14 मार्च को उसके कथित इकबालिया बयान के बाद ही सामने आई.

पीठ ने कहा कि मौके से कथित तौर पर बरामद नमकीन के पैकेट को अभियोजन पक्ष के गवाह की दुकान से आरोपी द्वारा कथित तौर पर खरीदे गए नमकीन के पैकेट से जोड़ने के लिए ऐसा कोई सबूत नहीं है.

पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि अपीलकर्ता को आखिरी बार पीड़ित बच्चे के साथ देखा गया था, और यह आरोप लगाया गया था कि उसने अप्राकृतिक यौन उत्पीड़न किया और फिर लड़के का गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी और शव को कुएं में फेंक दिया.

अपील स्वीकार करते हुए पीठ ने उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया. पीठ ने कहा कि जब उसने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा था, तब यह निर्देश दिया था कि अपीलकर्ता को तुरंत जेल से रिहा किया जाए, जब तक कि किसी अन्य मामले में उसकी कैद कानूनी रूप से जरूरी न हो. पीठ ने कहा कि उक्त आदेश की इसके द्वारा दोबारा पुष्टि की जाती है.

यह भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल बाद तलाक मंजूर किया, कहा- पत्नी ने पति को 'छोड़ने का फैसला किया'

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