सुप्रीम कोर्ट में शपथ ली जस्टिस सुनीता अग्रवाल, बनीं 13वीं महिला जज
नई दिल्ली में आयोजित समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने जस्टिस सुनीता अग्रवाल को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई, साथ ही जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह भी शपथ ले गए। अग्रवाल ने 2011 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश, 2013 में स्थायी न्यायाधीश, और 2023 में गुजरात हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस के रूप में सेवा की, जिससे वे राज्य के इतिहास में दूसरी महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं। उनका सुप्रीम कोर्ट में शामिल होना महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देगा और न्याय में विविधता लाएगा।

सौजन्य से:- The CSR Journal
नई दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट परिसर में आयोजित एक गरिमामय समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने जस्टिस सुनीता अग्रवाल को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। उनके साथ ही जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह ने भी शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। इस विशेष रिपोर्ट में हम जानेंगे जस्टिस सुनीता अग्रवाल के शुरुआती जीवन, उनके वकालत के सफर, ऐतिहासिक फैसलों और भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर उनके आगमन के प्रभाव के बारे में।
• अतिरिक्त न्यायाधीश (Additional Judge): 21 नवंबर 2011 को उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
• स्थायी न्यायाधीश (Permanent Judge): उनकी कार्यकुशलता को देखते हुए 6 अगस्त 2013 को उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के स्थायी जज के रूप में शपथ ली।
• गुजरात हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस: न्यायपालिका में वरिष्ठता और उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड के कारण सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 5 जुलाई 2023 को उनके नाम की सिफारिश गुजरात हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए की। 23 जुलाई 2023 को उन्होंने गुजरात हाई कोर्ट के 29वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। वे गुजरात हाई कोर्ट के इतिहास में मुख्य न्यायाधीश का पद संभालने वाली दूसरी महिला बनीं।
1. जस्टिस बी. वी. नागरत्ना: जो 31 अगस्त 2021 से सुप्रीम कोर्ट में सेवाएं दे रही हैं और सितंबर 2027 में देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने की कतार में हैं।
2. जस्टिस वी. मोहना: जिन्हें 2 जून 2026 को सीधे बार (वकील से सीधे जज) से सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया था।
न्यायविदों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की उपस्थिति से न्याय के सिद्धांतों में अधिक संवेदनशीलता और विविधता आती है, खासकर उन मामलों में जो महिलाओं के अधिकारों, पारिवारिक कानूनों और मानव अधिकारों से जुड़े होते हैं।
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