सच्चाई की खोज में अदालत की भूमिका, सुप्रीम कोर्ट ने रेप मामले में दोषी को बरी किया
सुप्रीम कोर्ट ने पांच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के दोषी ठहराए गए व्यक्ति को नौ साल बाद रिहा किया, यह कहते हुए कि ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट ने तथ्य और सबूतों की जांच में गंभीर चूक की थी। न्यायालय ने बताया कि आपराधिक मुकदमे में अदालत का प्राथमिक कर्तव्य सच्चाई स्थापित करना और केवल पक्षीय बहस से आगे जाकर भरोसेमंद सबूतों पर आधारित निर्णय देना है।

सौजन्य से:- jagran.com
'सच का पता लगाना अदालत की जिम्मेदारी', रेप केस के दोषी को बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने पांच वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म के दोषी एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि आपराधिक मुकदमा ...और पढ़ें
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पांच वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म के दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि आपराधिक मुकदमा सिर्फ अभियोजन पक्ष और आरोपित के बीच की लड़ाई से कहीं अधिक होता है। ऐसे मामलों में कोर्ट की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सच का पता लगाना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना होती है।
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट ने व्यक्ति को दोषी ठहराने और उसकी सजा बरकरार रखने में गंभीर गलती की।
सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के दोषी को नौ साल बाद बरी किया
ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष और हाई कोर्ट से उनकी पुष्टि तथ्यों और कानूनी दोनों ही नजरिये से पूरी तरह बेबुनियाद हैं। ट्रायल कोर्ट व हाई कोर्ट ने अपने निष्कर्षों में कहा था कि अभियोजन पक्ष का मामला विश्वसनीय और भरोसेमंद सुबूतों पर आधारित है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'आपराधिक मुकदमा सिर्फ अभियोजन पक्ष और आरोपित के बीच का टकराव नहीं होता। अदालत की मुख्य जिम्मेदारी सच का पता लगाना और यह सुनिश्चित करना है कि दोषी ठहराने का फैसला कानूनी रूप से मान्य व भरोसेमंद सुबूतों पर आधारित हो।
अदालत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह उस समय मूकदर्शक बनी रहे, जब आरोपित के दोषी या निर्दोष होने से सीधे जुड़े किसी सुबूत पर ध्यान न दिया गया हो। अदालत की भूमिका सिर्फ पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत सुबूतों को चुपचाप दर्ज करने तक सीमित नहीं है; उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि न्यायोचित फैसले के लिए अहम सुबूत उचित तरीके से रिकार्ड पर लाए जाएं।'
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह अभियोजन के मामले में आरोपित की पहचान को लेकर गंभीर कमियां हैं। साथ ही चोटों की उम्र से जुड़े मेडिकल सुबूत और एफआइआर व अभियोजन के गवाहों के बयानों में बताए गए घटना के कथित समय के बीच भारी विरोधाभास है।
हाई कोर्ट के फैसलों में गंभीर त्रुटियां
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि वह व्यक्ति नौ वर्षों से अधिक समय से हिरासत में है। राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मामले में व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा था और उसे जीवित रहने तक उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
बच्ची के पिता ने सात दिसंबर, 2016 को अजमेर के केकड़ी पुलिस थाने में एफआइआर दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि उनकी पत्नी व दो बच्चे (11 वर्षीय बेटा और पांच वर्षीय बेटी) दो दिन पहले एक रिश्तेदार के घर गए थे।
उनकी पत्नी ने उन्हें उनके कार्यस्थल पर फोन कर पूछा कि क्या बेटी उनके साथ है। जब उन्होंने 'नहीं' में जवाब दिया, तो पत्नी ने कहा कि बेटी का पता नहीं चल रहा है।
शिकायतकर्ता तुरंत गांव लौटा और बेटी को खोजने लगा। कुछ समय बाद दो लोग बच्ची को लेकर उसके घर आए। उस समय पत्नी ने देखा कि बच्ची घायल थी। बच्ची ने बताया कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ था।
आरोपित को पांच फरवरी, 2017 को गिरफ्तार कर लिया गया। उसने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उसे स्थानीय विधायक के कहने पर झूठे मामले में फंसाया गया था, जिनसे उसकी दुश्मनी थी।
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