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स्कूल में हुए यौन-शोषण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया, जिम्मेदारी किसे होगी?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि स्कूल अधिकारी को पीड़ित बच्चे से सीधे यौन अपराध की जानकारी मिलती है तो वह स्वयं जांच करने या तथ्यों का सत्यापन करने का अधिकार नहीं रखता। स्कूल प्रशासन को पुलिस को इस जानकारी की सूचना देनी होगी।

12 जुलाई 2026 को 09:13 am बजे
स्कूल में हुए यौन-शोषण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया, जिम्मेदारी किसे होगी?

सौजन्य से:- Navbharat Times

एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण मामलों में अनिवार्य रिपोर्टिंग को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी स्कूल अधिकारी को पीड़ित बच्चे से सीधे यौन अपराध की जानकारी मिलती है तो वह स्वयं जांच करने या तथ्यों का सत्यापन करने का अधिकार नहीं रखता।

नई दिल्ली: कई बार यह देखने में आता है कि स्कूलों में जब कोई बच्चा अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में स्कूल अधिकारियों से शिकायत करता है, तो स्कूल में ही जांच होने की बात कह कर मामला दबा दिया जाता है। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण मामलों में अनिवार्य रिपोर्टिंग को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी स्कूल अधिकारी को पीड़ित बच्चे से सीधे यौन अपराध की जानकारी मिलती है तो वह स्वयं जांच करने या तथ्यों का सत्यापन करने का अधिकार नहीं रखता। POCSO Act में साफ प्रावधान हैं कि इस तरह की घटना होने पर जानकारी मिलते ही पुलिस या सक्षम प्राधिकारी को सूचना देना कानूनी दायित्व है। शीर्ण अदालत ने और भी बहुत कुछ कहा है, और मामले में हेड मिस्ट्रेस को भी नहीं बख्शा है, पढ़िए पूरी स्टोरी...

यह मामला असम के एक स्कूल से जुड़ा है। लाईव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार यहां एक नाबालिग छात्रा ने कथित तौर पर अपनी हेडमिस्ट्रेस को यौन शोषण की जानकारी दी थी। आरोप थे कि आठवी कक्षा के छात्र ने उसका यौन उत्पीड़न किया था। लेकिन बच्ची के जरिए और फिर बच्ची की मां की शिकायत के बाद भी सूचना मिलने के बावजूद स्कूल प्रशासन ने पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। बच्ची की मां ने मामले में इंसाफ के लिए लेकर ट्रायल कोर्ट और फिर गुवाहाटी हाई कोर्ट में गुहार लगाई थी। लेकिन हाईकोर्ट के द्वारा स्कूल अधिकारियों - जिनमें हेडमिस्ट्रेस, प्रिंसिपल, शिक्षक और हॉस्टल वार्डन शामिल थे - को आरोपमुक्त करने के फैसला आने से, अंत में सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।

सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन और POCSO Act में अनिवार्य रिपोर्टिंग

बच्ची की मां की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने सुनवाई की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी स्कूल अधिकारी का यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उसने पहले स्वयं मामले की जांच की और अपराध नहीं पाया।

POCSO Act की धारा 19 किसी भी व्यक्ति पर यह कानूनी दायित्व डालती है कि यदि उसे बाल यौन अपराध की जानकारी हो तो वह तत्काल संबंधित अधिकारियों को सूचित करे। कानून का उद्देश्य अपराध को छिपाने के बजाय त्वरित हस्तक्षेप सुनिश्चित करना है।

कोर्ट ने कहा कि अपराध हुआ या नहीं, इसका निर्णय पुलिस और सक्षम जांच एजेंसियां करेंगी, न कि स्कूल प्रशासन। इसलिए किसी अधिकारी द्वारा स्वयं निष्कर्ष निकाल लेना कानूनी जिम्मेदारी से मुक्ति का आधार नहीं बन सकता।

और फिर शीर्ष अदालत स्कूल की हेड मिस्ट्रेस के खिलाफ POCSO Act के तहत मामला चलाए जाने को अनुमति दे दी।

संस्थान की निजी जांच POCSO Act के तहत निर्धारित वैधानिक दायित्व का विकल्प नहीं हो सकती। यदि प्रत्येक संस्था अपने स्तर पर सत्यापन करने लगे तो कई मामलों में रिपोर्टिंग में देरी होगी। इससे साक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं और पीड़ित बच्चे की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच की टिप्पणी

असम के स्कूल की ऐसी गलती पर पॉक्सो एक्ट की धारा 21 लागू होती है। पॉक्सो एक्ट की धारा 21 उन लोगों या संस्थाओं को सजा देने का प्रावधान करती है, जिन्हें किसी बच्चे के साथ हुए यौन अपराध की जानकारी होती है या वे इसे देखने के बाद भी पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को रिपोर्ट कराने से बचते हैं। इसमें भी दो एंगल है

आम नागरिक द्वारा रिपोर्ट न करने पर: यदि कोई व्यक्ति (जो बच्चा नहीं है) किसी अपराध की जानकारी होने पर उसकी रिपोर्ट नहीं करता है, तो उसे 6 महीने तक का कारावास, जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

संस्था प्रमुख द्वारा रिपोर्ट न करने पर: यदि किसी स्कूल, अस्पताल, शेल्टर होम या कंपनी का प्रमुख अपने नियंत्रण वाले किसी कर्मचारी या व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध की रिपोर्ट करने में विफल रहता है, तो उसे 1 साल तक की जेल और जुर्माना दोनों हो सकती है।

देखा जाए तो शीर्ष अदालत ने अदालत ने इस फैसले से साफ कर दिया है कि बाल यौन शोषण की जानकारी मिलने के बाद किसी भी अधिकारी के लिए निजी जांच, सत्यापन या संस्थागत प्रक्रिया का सहारा लेकर रिपोर्टिंग से बचना स्वीकार्य नहीं है। उम्मीद है आगे से ऐसे संस्थान, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद POCSO Act की अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था पर ध्यान देंगे ताकि बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के साथ जवाबदेही तय करने और POCSO Act के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में सक्रिय सहयोग हो सके।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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