सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के सरकारी आदेशों का सामना किया, कल्याणकारी लाभों को मतदाता सूचियों के परिणामों से जोड़ने का खंडन करना है
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के आदेशों पर प्रतिक्रिया दी, जिन्होंने मतदाता सूचियों के परिणामों को कल्याणकारी लाभों और आधिकारिक जाति प्रमाणनों के साथ जोड़ा। अदालत ने कहा कि मतदाता सूचियों से नाम विलोपित होने का असर कल्याणकारी लाभों पर नहीं पड़ सकता।

सौजन्य से:- द हिंदू
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस रुख को दोहराया है कि मतदाता सूचियों से नाम बाहर होने का असर उन चीजों पर नहीं पड़ सकता जिनका मतदान से कोई लेना-देना नहीं है। कोर्ट मई में जारी पश्चिम बंगाल सरकार के उन आदेशों पर प्रतिक्रिया दे रहा था, जिन्होंने कल्याणकारी लाभों और आधिकारिक जाति प्रमाणनों को मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के परिणामों से जोड़ दिया। जिनके नाम बाहर हुए हैं वे इन आदेशों के तहत कुछ खास कल्याणकारी लाभों और प्रमाणनों के लिए अपात्र हो जायेंगे। बीते 19 मई की अधिसूचना ने निर्देशित किया कि मतदाता सूची से हटाये गये लोगों को अन्नपूर्णा योजना (महिलाओं के लिए नकद ट्रांसफर की योजना) के लाभार्थी में न रखा जाए, सिवाय इस सूरत के कि उन्होंने एसआईआर ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर की हुई है। 4 जून के आदेश ने ऐसे लाभार्थियों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से हटाने का निर्देश दिया। 14 मई को, सरकार ने उन व्यक्तियों के जाति प्रमाणपत्रों को पुनर्सत्यापित करने और रद्द करने का निर्णय लिया जिनके नाम मतदाता सूचियों से विलोपित कर दिये गये हैं। ये निर्णय बिहार एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के ठीक उलट हैं। उसने प्राधिकारियों को स्पष्ट रूप से मना किया था कि एसआईआर के परिणामों का इस्तेमाल मताधिकार निर्धारण के अलावा किसी अन्य मकसद के लिए न किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अब भारत निर्वाचन आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी किये हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के परिणामों के खिलाफ लगभग 34 लाख अपीलें दायर की गयी हैं। उनमें से एक बहुत छोटे हिस्से का ही निपटारा हुआ है और लाखों लोग अनिश्चितता के अधर में लटके हुए हैं। उन्हें अनाज की मदद सहित विभिन्न कल्याणकारी लाभों से बाहर कर देना अन्याय है।
नागरिकता और मतदाता सूची के बीच संबंध में कानूनी विरोधाभास है। इस सूची में केवल नागरिकों को शामिल किया जा सकता है, लेकिन सूची में नाम दर्ज होना अपने आप नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इस विरोधाभास को छोड़ भी दें, तो यह एक दुरुस्त और सामान्य समझदारी वाली धारणा है कि अनेक नागरिकों के नाम मतदाता के तौर पर सूची में दर्ज नहीं हैं। दूसरे शब्दों में, सूची में मतदाताओं के रूप में दर्ज सभी लोगों को नागरिक अवश्य होना चाहिए, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि सभी नागरिक बतौर मतदाता सूची में दर्ज हों ही। यह सरल
और सीधा विचार हो सकता है, लेकिन राज्य के लिए किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में न होने को नागरिक जीवन के दूसरे पहलुओं — खासकर गुजर-बसर से जुड़े लाभों — से जोड़ देना अतार्किक और क्रूर है। बिहार एसआईआर के अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि मतदाता सूची अपने आप नागरिकता की स्थिति तय नहीं कर सकती और एसआईआर के परिणाम केवल चुनावी मकसदों से जुड़े हैं। एसआईआर से जुड़े विशिष्ट तथ्य और कानूनी सिद्धांत अपनी जगह हैं, बड़े मुद्दे भी दांव पर हैं। इसमें सार्वभौमिक मानवाधिकार शामिल हैं जो सभी व्यक्तियों के लिए हैं, नागरिकों और गैर-नागरिकों के लिए एक समान ढंग से। साफ-सुथरी मतदाता सूचियां और कल्याणकारी योजनाओं का लक्षित लोगों तक पहुंचना बेहतर शासन में मददगार हो सकते हैं। लेकिन सरकार को तर्क और सामान्य समझदारी को ताक पर नहीं रख देना चाहिए।
प्रकाशित - जुलाई 22, 2026 10:25 पूर्वाह्न भारतीय समय
न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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