बॉम्बे हाईकोर्ट ने चेतावनी दी, चाँद पर पहुँचा भारत फिर भी जाति‑भेद बना रहे जाल
अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की ऐसी नीति को रद्द किया जिसमें खतरनाक सफाई में मृत्यु वाले श्रमिकों के परिजन को निजी संस्थाओं से मुआवजा लेता गया। जस्टिस भारती डांगरे व मंजूषा देशपांडे की पीठ ने छह महीने के भीतर मृतकों की पहचान कर, उनके आश्रितों को 30 लाख रुपये की तत्काल रक्कम देने का निर्देश दिया, और बाद में इस राशि की वसूली को नियोक्ताओं से करवाने का आदेश दिया।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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बॉम्बे हाईकोर्ट: भेदभाव पर अदालत सख्त, कहा- भारत भले चांद पर पहुंचा, समाज में आज भी जाति व्यवस्था की बुराई
Sat, 05 Sep 2026 09:55 AM IST
ज्योति भास्कर
एजेंसी, मुंबई।
एजेंसी, मुंबई।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sat, 05 Sep 2026 09:55 AM IST
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हाथ से मैला ढोने की प्रथा की आलोचना करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि भले ही भारत चांद पर पहुंच गया हो, लेकिन जाति व्यवस्था की सामाजिक बुराई आज भी समाज में बनी हुई है, जो नागरिकों को ऐसा काम करने के लिए विवश करती है जो मानवीय गरिमा के विपरीत है। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया जिसके तहत खतरनाक सफाई के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के परिजनों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी निजी सोसाइटियों और नियोक्ताओं पर डाल दी गई थी।
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जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़ितों के आश्रितों को फौरन मुआवजा दे और बाद में चाहे तो संबंधित निजी संस्थाओं या नियोक्ताओं से वह राशि वसूल कर ले। अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि वह छह महीने के भीतर उन सभी व्यक्तियों की पहचान करे, जिनकी मृत्यु मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम 2013 के दायरे में आने वाली खतरनाक सफाई के दौरान हुई हो।
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पहचान किए जाने के बाद राज्य सरकार की ओर से ऐसे प्रत्येक मृतक व्यक्ति के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। पीठ ने कहा कि 21वीं सदी में अंतरिक्ष के क्षेत्र में उपलब्धियों का दावा करने के बावजूद यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि देश में जातिगत भेदभाव व सामाजिक कुप्रथाएं कायम हैं।
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मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया : अदालत ने कहा कि 2013 का अधिनियम सार्वजनिक या निजी नियोक्ता के आधार पर श्रमिकों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता है। इस नीति को समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानते हुए अदालत ने सरकारी प्रस्ताव के उस प्रावधान को खारिज कर दिया, जिसके जरिये निजी व्यक्तियों को मुआवजे के भुगतान के लिए उत्तरदायी बनाया गया था।
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