होमअपराधपुलिस पहचान का अधिकार: क्या सादे कपड़ों में पुलिस लाठीचार्ज कर सकती है?
अपराध

पुलिस पहचान का अधिकार: क्या सादे कपड़ों में पुलिस लाठीचार्ज कर सकती है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 36 में पुलिस पहचान को लेकर नियम तय किए गए हैं। यह नियम पुलिस कार्रवाई में जवाबदेही तय करने में मदद करते हैं।

28 जुलाई 2026 को 03:52 pm बजे
पुलिस पहचान का अधिकार: क्या सादे कपड़ों में पुलिस लाठीचार्ज कर सकती है?

सौजन्य से:- AajTak

Sign In

Advertisement

X

20 मई को जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन के दौरान हुआ लाठीचार्ज अब सिर्फ पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है. इस पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों की पहचान साफ थी? वीडियो में कुछ पुलिसकर्मी बिना नेम टैग के दिखे तो कुछ सादे कपड़ों में नजर आए. यही वजह है कि अब चर्चा हो रही है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस की पहचान को लेकर कानून क्या कहता है.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 36 में पुलिस पहचान को लेकर नियम तय किए गए हैं. इसके मुताबिक, किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी के पास ऐसी पहचान होनी चाहिए, जिससे उसे आसानी से पहचाना जा सके. अधिकारी का नाम स्पष्ट और दिखाई देने वाली जगह पर होना जरूरी है.

इस नियम का मकसद सिर्फ पहचान बताना नहीं है, बल्कि पुलिस कार्रवाई में जवाबदेही तय करना भी है. अगर किसी व्यक्ति के साथ गलत व्यवहार होता है या बल प्रयोग किया जाता है, तो वह संबंधित पुलिसकर्मी की पहचान कर सके.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदान बी. लोकुर ने कहा कि पुलिसकर्मियों के पास उचित पहचान होना जरूरी है. उन्होंने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुई तैनाती पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना नेम टैग वाले पुलिसकर्मियों और सादे कपड़ों में मौजूद अधिकारियों का लाठीचार्ज करना पूरी तरह गलत है. उन्होंने कहा कि पुलिस कमिश्नर या संबंधित इलाके के डीसीपी को यह बताना चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों बनी. उनके मुताबिक, पुलिस पहचान को लेकर सिर्फ कानून ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियम, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस भी मौजूद हैं.

Advertisement

कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस को वर्दी में होना चाहिए?

वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने पुलिस तैनाती की अलग-अलग भूमिकाओं को समझाते हुए कहा कि कुछ सुरक्षा जिम्मेदारियों के लिए पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में तैनात हो सकते हैं. हालांकि, कानून-व्यवस्था संभालने वाले पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सिविल ड्रेस में मौजूद पुलिसकर्मी खुफिया या सुरक्षा ड्यूटी पर थे तो उनके हाथ में लाठी क्यों थी? उनके अनुसार, भीड़ नियंत्रण जैसी कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों को नाम और रैंक वाली वर्दी में होना चाहिए.

बल प्रयोग के समय पहचान क्यों जरूरी?

वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने भी कहा कि ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारी की पहचान साफ होना जरूरी है. उनका कहना है कि आम लोगों को यह पता होना चाहिए कि सामने मौजूद व्यक्ति पुलिस अधिकारी है. यह बात उस समय ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब किसी प्रदर्शन के दौरान लोगों पर बल प्रयोग किया जाता है. अगर कोई व्यक्ति घायल होता है या उसके साथ गलत व्यवहार होता है तो पुलिसकर्मी की पहचान से जवाबदेही तय करने में मदद मिलती है.

पारिख के मुताबिक, पुलिस कुछ विशेष अभियानों जैसे गुप्त कार्रवाई में सादे कपड़ों का इस्तेमाल कर सकती है, लेकिन सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका अलग होती है. ऐसे मामलों में पुलिस नेतृत्व को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सिविल ड्रेस में अधिकारियों को ऐसी जिम्मेदारी क्यों दी गई.

Advertisement

शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार भी अहम

संजय पारिख ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है. शिक्षा, परीक्षा में गड़बड़ी और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर युवा अपनी बात रखना चाहते हैं तो उन्हें शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी आवाज उठाने का मौका मिलना चाहिए.उनका कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इसका पालन करते समय लोगों के अधिकारों का ध्यान रखना भी जरूरी है.

डीके बासु केस में सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे निर्देश

पुलिस पहचान से जुड़े नियम नए नहीं हैं. साल 1996 में डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर कई अहम निर्देश दिए थे. कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तारी और पूछताछ में शामिल पुलिसकर्मियों की पहचान साफ होनी चाहिए. उनके नाम और पद की जानकारी दिखाई देनी चाहिए, जिससे किसी भी गलत कार्रवाई की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जा सके.

जंतर-मंतर लाठीचार्ज विवाद ने एक बार फिर पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दे को सामने ला दिया है. कानून पुलिस को व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार देता है, लेकिन साथ ही यह भी उम्मीद करता है कि कार्रवाई करने वाले अधिकारी अपनी पहचान स्पष्ट रखें.

---- समाप्त ----

TOPICS:

Latest News in Hindi »

Advertisement

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →
पेपर लीक रोकने के लिए 10 साल तक की जेल, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना: क्या है नए क़ानून का दायरा?
अपराध

पेपर लीक रोकने के लिए 10 साल तक की जेल, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना: क्या है नए क़ानून का दायरा?

ट्रांसजेंडर अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती मानी संशोधित अधिनियम के खिलाफ
अपराध

ट्रांसजेंडर अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती मानी संशोधित अधिनियम के खिलाफ

लोकसभा में डिंपल यादव का सरकार पर हमला, सांसदों के दल बदल पर कानून लाने की मांग
अपराध

लोकसभा में डिंपल यादव का सरकार पर हमला, सांसदों के दल बदल पर कानून लाने की मांग

कलकत्ता उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला
अपराध

कलकत्ता उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: छात्रों को रिहा करने और डेटा सुरक्षित रखने के निर्देश
अपराध

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: छात्रों को रिहा करने और डेटा सुरक्षित रखने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जानें कब और कैसे किशोर पर वयस्क की तरह चलेगा मुकदमा
अपराध

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जानें कब और कैसे किशोर पर वयस्क की तरह चलेगा मुकदमा

8 राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच करें बलप्रयोग की बात
अपराध

8 राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच करें बलप्रयोग की बात

सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश, डिजिटल अरेस्ट को अलग कानूनी दायरे में लाने की तैयारी
अपराध

सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश, डिजिटल अरेस्ट को अलग कानूनी दायरे में लाने की तैयारी

ताज़ा ख़बरें