विधायिका की शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी अपील
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधायिका कानून में संशोधन कर अधिनियम के तहत बने नियमों को अप्रभावी बना सकती है। इसी आधार पर आयुक्त को अनुशासनात्मक प्राधिकारी बनाए जाने के निर्णय को बरकरार रखा गया है।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
अधिनियम के तहत बने नियम कानून में संशोधन की विधायी शक्ति को सीमित नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
25 Jun 2026 1:18 AM IST
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी अधिनियम के तहत बनाए गए नियम या विनियम (Regulations) विधायिका की उस शक्ति को सीमित नहीं कर सकते, जिसके तहत वह मूल कानून (Parent Act) में संशोधन कर विनियमों को अप्रभावी बना सकती है।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए भ्रष्टाचार के मामले में दोषसिद्ध एक ग्रुप-ए अधिकारी को सेवा से बर्खास्त करने के दिल्ली नगर निगम आयुक्त के अधिकार को बरकरार रखा।
मामला नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के पूर्व कार्यकारी अभियंता राजेश शर्मा से जुड़ा था। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराए जाने के बाद वर्ष 2011 में आयुक्त ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था।
अधिकारी ने तर्क दिया कि 1959 के दिल्ली नगर निगम सेवा (नियंत्रण एवं अपील) विनियमों के अनुसार ग्रुप-ए अधिकारियों पर बड़ी सजा लगाने का अधिकार निगम (Corporation) को है, न कि आयुक्त को। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1993 में दिल्ली नगर निगम अधिनियम में संशोधन कर आयुक्त को अनुशासनात्मक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) बनाया गया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि विनियम अधीनस्थ कानून (Subordinate Legislation) होते हैं और विधायिका कानून में संशोधन कर उन्हें अप्रभावी बना सकती है। इसलिए 1993 के संशोधन के बाद आयुक्त ही अनुशासनात्मक प्राधिकारी हैं और बर्खास्तगी का आदेश देने के लिए सक्षम हैं।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अधिकारी की अपील खारिज कर दी।
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