पिता को अदालत का झटका: बेटी की शिक्षा के लिए जमा पैसा भरण-पोषण में नहीं गिना जा सकता
दिल्ली उच्च अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पिता द्वारा बेटी की शिक्षा के लिए जमा की गई राशि का उपयोग पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए नहीं किया जा सकता। यह फैसला एक पिता की अपील पर आया, जिसने बेटी के नाम पर खुले पीपीएफ खाते से 8 लाख रुपये निकाले थे।

सौजन्य से:- रतोपति
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि बेटी की शिक्षा के लिए निवेश की गई राशि का उपयोग पिता द्वारा पत्नी और बेटी को दिए जाने वाले भरण-पोषण को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
‘सुधीर क्वात्रा बनाम शाम्ली क्वात्रा’ के मामले में फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने अपने फैसले में उल्लेख किया है कि बेटी अपने नाम पर किए गए निवेश को प्राप्त करने की पूरी हकदार है। फैसले में कहा गया है, ‘पिता बेटी के नाम पर खोले गए निवेश खाते में केवल एक संरक्षक के रूप में अधिकार रख सकता है, मालिक के रूप में नहीं।
फैसले में उल्लेख किया गया है कि 'बेटी के नाम पर किए गए निवेश पर उसी का अधिकार होता है। पिता ने संरक्षक की हैसियत से वह रकम निकाली होगी, लेकिन इसका उपयोग अपनी भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने या उस राशि के साथ मिलान करने के लिए नहीं किया जा सकता है।'
सुधीर क्वात्रा ने वर्ष 1999 में अपनी बेटी शाम्ली क्वात्रा के नाम पर पीपीएफ खाता खोला था। वर्ष 2017 में खाता परिपक्व होने पर जब शाम्ली ने बैंक में पता किया, तो उसे पता चला कि उसके पिता ने वर्ष 2016 में ही 8 लाख रुपये से अधिक की पूरी शेष राशि निकालकर खाता बंद कर दिया है।
उसके माता-पिता अलग रह रहे हैं और वह अपनी माँ के साथ रहती है। माँ और बेटी का भरण-पोषण पिता के दायित्व के अंतर्गत आता है, लेकिन यह पाए जाने पर कि पिता ने बेटी के खाते का उपयोग करके 8 लाख रुपये निकाले और उनका उपयोग किया, शाम्ली ने पारिवारिक अदालत में मुकदमा दायर किया था।
बैंक को दिए गए वचन में पिता ने उल्लेख किया था कि उन्होंने वह राशि बेटी की शिक्षा और कल्याण के लिए निकाली है। हालाँकि, बेटी शाम्ली ने यह कहते हुए धन की वसूली के लिए मुकदमा दायर किया कि वह राशि उसकी शिक्षा पर खर्च नहीं की गई थी और उसे कॉलेज की फीस का भुगतान करने में भी आर्थिक कठिनाई हो रही थी।
उनका तर्क था कि उन्होंने पारिवारिक अदालत के आदेश के अनुसार बेटी को दिए जाने वाले भरण-पोषण के रूप में लगभग 6 लाख रुपये उसी पीपीएफ कोष से खर्च किए थे। इसके अलावा, उत्तराखंड उच्च अदालत के आदेश के अनुसार पत्नी को दी जा रही अतिरिक्त राशि भी बेटी के लिए ही उपयोग की जा रही थी।
हालाँकि, उच्च अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा, 'संतान का भरण-पोषण करना पिता का स्वतंत्र कानूनी कर्तव्य है।'
अदालत ने अपने फैसले में कहा है, 'अभिभावक बेटी के बचपन में भविष्य के लिए बचत या निवेश कर सकते हैं, लेकिन ‘भरण-पोषण’ संतान के दैनिक पालन-पोषण और खर्चों के लिए पिता की एक अलग कानूनी जिम्मेदारी है। वैवाहिक कलह के बहाने बेटी के ही पैसों से पिता के दायित्व को पूरा करना न्यायसंगत नहीं है।
अदालत ने यह तय किया है कि चूंकि बेटी बालिग हो चुकी है, इसलिए उस राशि पर उसी का अधिकार है। फैसले में कहा गया है, 'पिता उस राशि को अपने खाते में स्थानांतरित नहीं कर सकता था, उसे वह पैसा बेटी को ही वापस करना होगा।'
अदालत ने पिता सुधीर क्वात्रा को आदेश दिया है कि वह पीपीएफ के पूरे 8 लाख रुपये और उस पर 8 प्रतिशत ब्याज जोड़कर बेटी को सौंप दें।
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न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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