सुप्रीम कोर्ट में गुजरात हाई कोर्ट के आदेश पर नोटिस, वक्फ ट्रिब्यूनल में कोर्ट फीस की छूट पर विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संस्थाओं द्वारा दायर मामलों में कोर्ट फीस नहीं देने के आधार पर याचिकाएं खारिज किए जाने को बरकरार रखने वाले गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
वक्फ ट्रिब्यूनल में दायर याचिकाओं पर कोर्ट फीस में छूट को लेकर उठे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए सहमत हो गया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संस्थाओं द्वारा दायर मामलों में कोर्ट फीस नहीं देने के आधार पर याचिकाएं खारिज किए जाने को बरकरार रखने वाले गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने जाारी किया नोटिस
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने अहमदाबाद सुन्नी मुस्लिम वक्फ समिति की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया। पीठ ने सात अगस्त को पारित आदेश में कहा, “नोटिस जारी किया जाता है, छह सप्ताह में जवाब दाखिल किया जाए। समिति की ओर से अधिवक्ता एजाज मकबूल के माध्यम से दायर याचिका में गुजरात हाई कोर्ट के जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी गई है।
समिति ने किया दावा
याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट यह समझने में विफल रहा कि वक्फ अधिनियम या उसके तहत बनाए गए नियमों में कोर्ट फीस के भुगतान का कोई प्रावधान नहीं है। समिति ने दावा किया है कि कानून और नियम कोर्ट फीस के भुगतान को स्पष्ट रूप से बाहर रखते हैं।
गुजरात हाई कोर्ट ने खारिज की थी याचिका
गुजरात हाई कोर्ट ने दिसंबर 2025 में वक्फ संस्थाओं की एक याचिका खारिज करते हुए कहा था कि गुजरात राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत दायर कार्यवाही के लिए कोर्ट फीस से कोई व्यापक छूट उपलब्ध नहीं है। सुनवाई के दौरान गुजरात हाई कोर्ट ने कहा था कि मकान मालिक और किराएदार के बीच के विवाद में भी वक्फ संपत्तियों से जुड़े अधिकारों का फैसला होता है।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें
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