होम›अपराध›सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी पर अदालतों को उदार रवैया अपनाना चाहिए
अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी पर अदालतों को उदार रवैया अपनाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संवैधानिक अदालतों को दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी पर विचार करते समय उदार और सक्रिय रवैया अपनाना चाहिए। कोर्ट ने कहा है कि प्रक्रियात्मक देरी किसी कैदी के उस अधिकार के रास्ते में नहीं आनी चाहिए जिसके तहत वह अपनी आज़ादी पर असर डालने वाली सज़ा को चुनौती दे सकता है।

8 अगस्त 2026 को 11:15 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी पर अदालतों को उदार रवैया अपनाना चाहिए

सौजन्य से:- Live Law Hindi

दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने में अदालतों को उदार रवैया अपनाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

8 Aug 2026 3:43 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी पर विचार करते समय उदार और सक्रिय रवैया अपनाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रियात्मक देरी किसी कैदी के उस अधिकार के रास्ते में नहीं आनी चाहिए जिसके तहत वह अपनी आज़ादी पर असर डालने वाली सज़ा को चुनौती दे सकता है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी ओडिशा के एक व्यक्ति की सज़ा रद्द करते हुए की, जिसने ट्रिपल मर्डर केस में 22 साल जेल में बिताए। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा था और उसने देरी से दायर जेल अपील को शुरुआती चरण में ही खारिज करने के लिए ओडिशा हाईकोर्ट की आलोचना की।

कोर्ट ने अपने फ़ैसले की शुरुआत ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा जेल अपील दायर करने में हुई 3,157 दिनों की देरी को माफ़ करने से इनकार करने पर दुख जताते हुए की, जबकि दोषी उस समय तक पहले ही 12 साल की सज़ा काट चुका है।

कोर्ट ने कहा,

"हम उस आदेश से बहुत निराश और परेशान हैं, जिसमें 3,157 दिनों की देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी खारिज की गई और नतीजतन धारा 302 के तहत सज़ा (आजीवन कारावास) के आदेश के ख़िलाफ़ 'जेल मेमो ऑफ़ अपील' खारिज की गई, जबकि दोषी उस आदेश के समय 12 साल और अब 10 साल और, यानी कुल 22 साल जेल में बिता चुका था।"

अपील के ज़रिए न्याय पाने के मौक़े से वंचित किए जाने पर चिंता जताते हुए बेंच ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को जेल में बंद लोगों, खासकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लोगों की असलियतों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

अदालत ने कहा,

“हमारे समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों, और खासकर उनमें से दोषी ठहराए गए और जेल में बंद लोगों के लिए न्याय तक पहुंच अब भी मुश्किल है। जब लोकतंत्र के तीनों स्तंभ हर नागरिक, खासकर गरीबों, जरूरतमंदों और वंचितों तक कानूनी मदद पहुंचाने की लगातार कोशिश करते हैं तो हमें—संवैधानिक अदालतों में—आत्म-मंथन करना चाहिए और खुद को संवेदनशील बनाना चाहिए। हमें उदार रवैया अपनाना चाहिए, खासकर तब जब किसी को दोषी ठहराने और सज़ा सुनाने के आदेश के खिलाफ अपील करने में देरी होती है—एक ऐसी देरी जो किसी व्यक्ति को उसके सबसे कीमती और मौलिक अधिकार, यानी आज़ादी, से वंचित रखती है। सिर्फ उदार रवैया ही नहीं, बल्कि देरी को माफ़ करने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए—चाहे देरी कितनी भी लंबी क्यों न हो—जब कोई दोषी अपील लेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है; और मौजूदा मामले में यह कुछ गंभीर चिंताएं पैदा करता है।”

ओडिशा हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की जेल अपील खारिज की थी, क्योंकि उसने 3,157 दिनों की देरी को माफ़ करने से इनकार कर दिया था। उस समय तक वह पहले ही लगभग 12 साल की सज़ा काट चुका था। जब तक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, वह हिरासत में 22 साल बिता चुका है।

बेंच ने गौर किया कि सुप्रीम कोर्ट की ही एक दूसरी बेंच ने पहले अपील दायर करने में 3,703 दिनों की देरी को माफ़ किया और हाईकोर्ट के इनकार को "बहुत परेशान करने वाला" बताया। उस बेंच ने कहा था कि हाईकोर्ट को व्यावहारिक और सहानुभूतिपूर्ण नज़रिया अपनाना चाहिए, खासकर इसलिए क्योंकि अपील जेल अधिकारियों के ज़रिए एक ऐसे आजीवन कारावास की सज़ा पाए कैदी ने दायर की थी, जो पहले ही 12 साल से ज़्यादा की सज़ा काट चुका था।

सबूतों की जांच करने के बाद सुप्रीम कोर्ट को अभियोजन पक्ष के मामले में गंभीर कमियां मिलीं। अदालत ने माना कि दोषसिद्धि पूरी तरह से एक चश्मदीद गवाह के बयान पर आधारित थी, जिसके बयान में कई असंभव बातें और विसंगतियां थीं। अदालत ने जांच में हुई बड़ी खामियों की ओर भी इशारा किया, जैसे कि कथित हत्या के हथियारों की बरामदगी को लेकर विरोधाभास, आरोपी को अपराध से जोड़ने वाले फोरेंसिक सबूतों का अभाव, और कथित तौर पर थर्ड-डिग्री तरीकों से हासिल किए गए ऐसे इकबालिया बयान पर भरोसा करना जो कानूनी रूप से मान्य नहीं था।

यह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष का मामला "काफी अधूरा" था और अपीलकर्ता के दोषी होने को लेकर गंभीर संदेह बना हुआ था, बेंच ने संदेह का लाभ देते हुए उसे बरी कर दिया।

कड़े शब्दों में अपनी बात खत्म करते हुए अदालत ने कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली की कई नाकामियों को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा कि जहाँ तीन महिलाओं की जान चली गई थी, वहीं एक व्यक्ति को "सिर्फ़ शक के आधार पर" हिरासत में लिया गया, कथित तौर पर थर्ड-डिग्री तरीकों से एक ऐसा कबूलनामा हासिल किया गया, जो कानूनी रूप से मान्य नहीं था, ट्रायल कोर्ट सबूतों को ठीक से नहीं समझ पाया, और हाईकोर्ट "मामले निपटाने की संख्या बढ़ाने के चक्कर में बस मूकदर्शक बना रहा", जिसके नतीजे में "बिना किसी भरोसेमंद सबूत के एक व्यक्ति की ज़िंदगी के 22 साल बर्बाद हो गए।"

कोर्ट ने कोरापुट की ज़िला कानूनी सेवा प्राधिकरण को ज़िला प्रशासन की मदद से अपील करने वाले व्यक्ति के पुनर्वास और फिर से बसाने के लिए कदम उठाने का निर्देश भी दिया।

Cause Title: Arjun Jani @ Tuntun Versus State of Orissa

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →
बिल गेट्स ने चेतावनी दी: गलत हाथों में एआई से 100 करोड़ जीवन का खतरा, सरकार से कड़े नियमों की माँग
अपराध

बिल गेट्स ने चेतावनी दी: गलत हाथों में एआई से 100 करोड़ जीवन का खतरा, सरकार से कड़े नियमों की माँग

कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा: डिजिटल क्षेत्र में जातिगत गाली पर आपराधिक कार्रवाई संभव
अपराध

कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा: डिजिटल क्षेत्र में जातिगत गाली पर आपराधिक कार्रवाई संभव

दिल्ली HC: मुस्लिम वैवाहिक शादियों से POCSO का अपवाद नहीं
अपराध

दिल्ली HC: मुस्लिम वैवाहिक शादियों से POCSO का अपवाद नहीं

सुप्रीम कोर्ट में लॉ छात्र अक्षत त्रिपाठी की नई याचिका, यूपी सरकार पर भ्रामक जानकारी का आरोप
अपराध

सुप्रीम कोर्ट में लॉ छात्र अक्षत त्रिपाठी की नई याचिका, यूपी सरकार पर भ्रामक जानकारी का आरोप

चुनाव आयोग का फ़ॉर्म‑६ बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट का समर्थन कथन विवादास्पद
अपराध

चुनाव आयोग का फ़ॉर्म‑६ बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट का समर्थन कथन विवादास्पद

उत्तरी प्रदेश सरकार ने कोर्ट को गुमराह किया, नोटिस देने वाले कार्यकारी मैजिस्ट्रेट को निलंबित नहीं किया: लॉ छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
अपराध

उत्तरी प्रदेश सरकार ने कोर्ट को गुमराह किया, नोटिस देने वाले कार्यकारी मैजिस्ट्रेट को निलंबित नहीं किया: लॉ छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

सुप्रीम कोर्ट ने EC नियुक्ति विधि पर विभाजित रुख अपनाया: क्या बदलेगा चुनावी स्वतंत्रता?
अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने EC नियुक्ति विधि पर विभाजित रुख अपनाया: क्या बदलेगा चुनावी स्वतंत्रता?

संवैधानिक न्यायालय ही लगा सकते हैं संशोधित आजीवन कारावास, ट्रायल कोर्ट नहीं: सुप्रीम कोर्ट
अपराध

संवैधानिक न्यायालय ही लगा सकते हैं संशोधित आजीवन कारावास, ट्रायल कोर्ट नहीं: सुप्रीम कोर्ट

ताज़ा ख़बरें