होमफैसलेसुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी ने शुरू किया अरावली के जमीनी सर्वे
फैसले

सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी ने शुरू किया अरावली के जमीनी सर्वे

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित हाई पावर कमेटी ने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और इसकी परिभाषा से जुड़े मामले में राजस्थान में अपना जमीनी सर्वे शुरू कर दिया है। कमेटी चार दिन तक प्रदेश के अलग-अलग अरावली क्षेत्रों का दौरा करेगी और पर्यावरण, भूगोल, जल संसाधन, जैव विविधता, खनन गतिविधियों और भूमि उपयोग में हो रहे बदलावों का प्रत्यक्ष अध्ययन करेगी।

8 अगस्त 2026 को 09:16 am बजे
सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी ने शुरू किया अरावली के जमीनी सर्वे

सौजन्य से:- ETV Bharat

प्राकृतिक रक्षा कवच अरावली को बचाने निकली सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी, जानें कैसे होगा जमीनी अध्ययन

अरावली पर सुप्रीम कोर्ट की हाईपावर कमेटी को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मण सिंह लापोड़िया से अश्वनी पारीक ने की बातचीत...

Published : August 8, 2026 at 2:20 PM IST

जयपुर : अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और इसकी परिभाषा से जुड़े अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित हाई पावर कमेटी ने शुक्रवार, 7 अगस्त से राजस्थान में अपना जमीनी सर्वे शुरू कर दिया है. कमेटी चार दिन तक प्रदेश के अलग-अलग अरावली क्षेत्रों का दौरा करेगी और पर्यावरण, भूगोल, जल संसाधन, जैव विविधता, खनन गतिविधियों और भूमि उपयोग में हो रहे बदलावों का प्रत्यक्ष अध्ययन करेगी. इस सर्वे के आधार पर तैयार रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की जाएगी, जिसके बाद अरावली की परिभाषा और संरक्षण के दायरे को लेकर आगे का फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

राजस्थान के कई जिलों में होगा जमीनी अध्ययन : सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद यानी ICFRE के महानिदेशक की अध्यक्षता में हाई पावर कमेटी का गठन किया गया है. समिति 7 से 10 अगस्त तक राजस्थान के चयनित अरावली क्षेत्रों का विस्तृत फील्ड दौरा करेगी. राजस्थान के अलावा समिति दिल्ली और हरियाणा के अरावली क्षेत्रों का भी अध्ययन करेगी. राजस्थान में समिति के दौरे में कोटपूतली, नीमकाथाना, खंडेला, सरिस्का, जयपुर, अजमेर, किशनगढ़, ब्यावर, राजसमंद, उदयपुर, पिंडवाड़ा और माउंट आबू जैसे क्षेत्र शामिल हैं. इन क्षेत्रों में अरावली की वास्तविक भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थिति का आकलन किया जाएगा.

सुबह 8 से शाम 4 बजे तक फील्ड सर्वे, फिर जनसंवाद : कमेटी का फील्ड सर्वे प्रतिदिन सुबह करीब 8 बजे से शाम 4 बजे तक प्रस्तावित है. इसके बाद शाम 4:30 बजे से 6:30 बजे तक संबंधित क्षेत्रों में बहु-हितधारक परामर्श बैठकें होंगी. इन बैठकों में पर्यावरणविदों, संरक्षण विशेषज्ञों, स्वयंसेवी संस्थाओं, खनन पट्टाधारकों, खनन एसोसिएशन के प्रतिनिधियों, परियोजना संचालकों, खनन श्रमिकों, शोध संस्थानों के विशेषज्ञों, स्थानीय ग्रामीणों, किसानों और सरकारी अधिकारियों से संवाद किया जाएगा. समिति इन सभी पक्षों से अरावली की मौजूदा स्थिति, पर्यावरणीय बदलाव, खनन और संरक्षण को लेकर सुझाव और आपत्तियां भी लेगी.

पहले दिन सरिस्का, अलवर पहुंचेगी समिति : राजस्थान में 7 अगस्त को समिति का दौरा कोटपूतली, नीमकाथाना और खंडेला होते हुए सरिस्का तक प्रस्तावित है. यहां अरावली की पारिस्थितिकी, भूवैज्ञानिक संरचना, वन क्षेत्र, जल संसाधन और खनन गतिविधियों का अध्ययन किया जाएगा. सरिस्का, अलवर में जिला प्रशासन के साथ-साथ वन और खान विभाग के अधिकारियों और स्थानीय हितधारकों से संवाद भी किया जाएगा. 8 अगस्त को समिति जयपुर, अजमेर और किशनगढ़ क्षेत्र का दौरा करेगी. 9 अगस्त को ब्यावर, राजसमंद और उदयपुर में जमीनी अध्ययन किया जाएगा. वहीं, 10 अगस्त को अंतिम दिन उदयपुर से आगे बढ़ते हुए पिंडवाड़ा और माउंट आबू क्षेत्र का निरीक्षण प्रस्तावित है. उदयपुर में जिला प्रशासन, खान और वन विभाग सहित अन्य संबंधित विभागों और विभिन्न हितधारकों के साथ बैठक भी होगी.

खनन गतिविधियों और पर्यावरणीय नुकसान पर विशेष नजर : कमेटी के अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र अरावली क्षेत्र में हो रही खनन गतिविधियां हैं. समिति यह देखेगी कि खनन, भूमि उपयोग में बदलाव और अन्य मानवीय गतिविधियों का अरावली की पारिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ा है? इसके साथ ही जल स्रोतों, भूजल, वन क्षेत्र और जैव विविधता की स्थिति का भी अध्ययन किया जाएगा. खनन के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहे दबाव और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर इसके प्रभाव को भी समझने का प्रयास होगा. कमेटी का उद्देश्य केवल पर्यावरणीय नुकसान का आकलन करना नहीं है, बल्कि संरक्षण और विकास के बीच वास्तविक संतुलन की स्थिति को समझना भी है.

अरावली की परिभाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल : इस पूरे मामले में अरावली की परिभाषा और संरक्षण के दायरे को लेकर विवाद महत्वपूर्ण है. कमेटी के सामने यह सवाल भी है कि क्या 100 मीटर ऊंचाई की शर्त लागू होने पर राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही संरक्षण के दायरे में रह जाएंगी. इसके अलावा दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी की शर्त से क्या संरक्षण क्षेत्र और सीमित हो जाएगा? क्या इससे बाकी क्षेत्रों में अवैध खनन को बढ़ावा मिलने की आशंका है या अरावली पर्वतमाला की पूरी संरचनात्मक अखंडता को किस तरह सुरक्षित रखा जा सकता है? कमेटी को यह भी देखना होगा कि किन क्षेत्रों को अरावली पर्वतमाला की परिभाषा में शामिल किया जाना चाहिए.

पढे़ं. Save Aravalli : अलवर में अवैध खनन के दर्द से कराह रही अरावली, 'नई परिभाषा' से वजूद पर संकट

अरावली बचाने का संघर्ष पुराना : अरावली संरक्षण के लिए लंबे समय से काम कर रहे पद्मश्री सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मण सिंह लोपाड़िया ने कहा कि अरावली को बचाने का संघर्ष नया नहीं है. उनके अनुसार वर्ष 1993 में गुरु शिखर से दिल्ली तक पैदल यात्रा कर अरावली संरक्षण की मांग देश की सरकार तक पहुंचाई गई थी. लोपाड़िया का कहना है कि अरावली केवल पहाड़ियों की शृंखला नहीं, बल्कि राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों के जीवन से जुड़ा प्राकृतिक तंत्र है. पश्चिम से आने वाली थार की रेतीली हवाओं को अरावली की पहाड़ियां आगे बढ़ने से रोकती हैं. उनके मुताबिक अरावली के एक तरफ जीवन और दूसरी तरफ पानी के लिए संघर्ष का क्षेत्र है, जिससे इसकी पर्यावरणीय अहमियत समझी जा सकती है. उन्होंने आशंका जताई कि अरावली की ऊंचाई और पहाड़ी संरचना में कमी आने के साथ प्रदेश में बारिश के स्तर पर भी असर पड़ा है. उनके अनुसार अरावली के नष्ट होने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है.

रणथंभौर, सरिस्का और गलता तीर्थ से भी जुड़ी अरावली : लोपाड़िया के मुताबिक रणथंभौर और सरिस्का जैसे क्षेत्रों का अस्तित्व भी अरावली की प्राकृतिक संरचना से जुड़ा है. जयपुर का गलता तीर्थ और वहां की जलधारा को भी उन्होंने अरावली से जोड़ते हुए इसकी पर्यावरणीय और जल संबंधी भूमिका पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि अरावली की चोटियों, दर्रों, तराई और तलहटी में अलग-अलग प्रकार की वनस्पतियां और जीव-जंतु पाए जाते हैं. हरियाणा, दिल्ली, गुजरात और राजस्थान के लिए यह पर्वतमाला बेहद महत्वपूर्ण है और इसके कमजोर होने से नदियों तथा जल संसाधनों पर भी संकट बढ़ सकता है.

छोटी पहाड़ियां भी अरावली के ईको सिस्टम का हिस्सा : लोपाड़िया ने अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियों को लेकर भी चिंता जताई. उनका कहना है कि इन छोटी पहाड़ियों की आगोश में गांव बसे हैं और कई स्थानों पर धार्मिक एवं सामाजिक जीवन का आधार भी इन्हीं पहाड़ियों से जुड़ा है. पुराने समय में इन पहाड़ियों पर बनाए गए धार्मिक स्थलों के जरिए भी इनके संरक्षण का संकेत मिलता है, लेकिन आज सबसे ज्यादा संकट इन्हीं छोटी पहाड़ियों पर है. कई जगह मंदिर तो बचे हुए हैं, लेकिन आसपास की पहाड़ी संरचना कथित विकास गतिविधियों की भेंट चढ़ रही है. इन पहाड़ियों पर प्रवासी पक्षियों को भी आश्रय मिलने की बात उन्होंने कही.

राजेंद्र सिंह बोले- अरावली है प्राकृतिक रक्षा कवच : 'तरुण भारत संघ' के अध्यक्ष और 'जल बिरादरी' के राष्ट्रीय समन्वयक राजेंद्र सिंह ने अरावली को भारत का प्राकृतिक रक्षा कवच बताया. उनके अनुसार अधिकांश पर्वत शृंखलाओं की दिशा मानसून के अनुरूप उत्तर से पूर्व की ओर है, जबकि अरावली पश्चिम से उत्तर-मध्य दिशा में स्थित है. उनका कहना है कि अरावली पश्चिम से आने वाली रेतीली हवाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसी वजह से इसे भारत की रीढ़ भी कहा जाता है.

पढे़ं. Save Aravalli :अरावली में खनन ने खड़ा किया संकट, कभी निकलती थी 5 नदियां, अब एक ही बची

अरावली का विस्तार और भौगोलिक महत्व : अरावली पर्वतमाला दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में करीब 692 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है. इसमें लगभग 550 किलोमीटर हिस्सा राजस्थान में है. राजस्थान में यह गुजरात सीमा के खेड़ ब्रह्मा से लेकर उत्तर में खेतड़ी तक फैली है. राजस्थान में अरावली राज्य के लगभग 12.65 प्रतिशत क्षेत्र को कवर करती है और सात जिलों सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपुर, दौसा और अलवर में इसका विस्तार बताया गया है. यह पर्वतमाला राजस्थान को दो प्रमुख भौगोलिक हिस्सों में बांटती है, जिसके पश्चिमी में मरुस्थलीय क्षेत्र और पूर्वी हिस्से में उपजाऊ मैदान है.

अरावली की अलग-अलग पहचान : अरावली के दक्षिणी हिस्से में सबसे ऊंचा और सघन पहाड़ी क्षेत्र आता है. यहीं माउंट आबू में राजस्थान की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर स्थित है, जिसकी ऊंचाई 1,722 मीटर बताई गई है. कुम्भलगढ़ और अचलगढ़ भी इसी क्षेत्र में आते हैं. मध्य अरावली क्षेत्र अजमेर और जयपुर के बीच फैला है, जहां पहाड़ियों और घाटियों की अलग संरचना दिखाई देती है. पश्चिमी राजस्थान की महत्वपूर्ण लूणी नदी का उद्गम भी इसी क्षेत्र से जुड़ा है. उत्तर-पूर्वी अरावली जयपुर, अलवर, सीकर और झुंझुनू तक फैली है और इस क्षेत्र की कई पहाड़ियां अधिक क्षरणग्रस्त बताई गई हैं.

जैव विविधता और नदियों के लिए भी अहम : अरावली क्षेत्र में तेंदुआ, सियार, नीलगाय, सांभर और कई अन्य प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है. सरिस्का टाइगर रिजर्व और कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य इसकी जैव विविधता के प्रमुख उदाहरण हैं. अरावली से बनास, लूणी, साबरमती और साहिबी जैसी नदियों के जुड़ाव का भी उल्लेख किया गया है. इसके अलावा क्षेत्र में तांबा, जस्ता, सीसा, संगमरमर और ग्रेनाइट जैसे खनिज भी पाए जाते हैं. यही वजह है कि अरावली में पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन का सवाल लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है.

अब कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी नजर : चार दिवसीय जमीनी अध्ययन के बाद हाई पावर कमेटी विभिन्न क्षेत्रों से जुटाई गई जानकारी, विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के सुझावों और आपत्तियों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी. रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की जाएगी. अरावली की परिभाषा, संरक्षण के दायरे, खनन गतिविधियों और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के बीच यह रिपोर्ट बेहद अहम मानी जा रही है. अब नजर इस बात पर है कि जमीनी सर्वे के बाद कमेटी अरावली की संरचनात्मक और पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर क्या निष्कर्ष और सुझाव सुप्रीम कोर्ट के सामने रखती है.

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →

ताज़ा ख़बरें