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बिना पढ़े पास हुआ पंजाब का बेअदबी कानू, यह लोकतंत्र की बड़ी नाकामी

पंजाब विधानसभा ने राज्य का नया बेअदबी विरोधी कानून पूरी तरह पढ़े बिना ही पास कर दिया. यह घटना पंजाब में सिख समुदाय और सरकार के लिए बड़े सवाल खड़े करती है. यह कानून बेअदबी करने वालों के लिए सजा को बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया. लेकिन इसके लिए सरकार और विपक्ष ने संबंधित पक्षों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया, जो चिंताजनक है.

4 जुलाई 2026 को 06:23 pm बजे
बिना पढ़े पास हुआ पंजाब का बेअदबी कानू, यह लोकतंत्र की बड़ी नाकामी

सौजन्य से:- ThePrint Hindi

भारतीय घरों में एक बहुत आम बात होती है. स्कूल की डायरी या माता-पिता की सहमति वाले फॉर्म पर उनसे हस्ताक्षर करने को कहा जाता है और कई बार वे बिना ठीक से पढ़े ही साइन कर देते हैं. नौकरी के कॉन्ट्रैक्ट और बीमा (इंश्योरेंस) के कागजात के साथ भी हम अक्सर ऐसा ही करते हैं. शायद यही आदत पिछले हफ्ते सामने आई उस चौंकाने वाली बात को समझाती है कि पंजाब के विधायकों ने राज्य का नया बेअदबी विरोधी कानून पूरी तरह पढ़े बिना ही पास कर दिया.

29 जून को अलग-अलग राजनीतिक दलों के सिख विधायक जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 को लेकर श्री अकाल तख्त साहिब के सामने पेश हुए. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और अकाल तख्त ने इस कानून को लेकर दो तरह की आपत्तियां जताई थीं. पहली, कानून बनाने से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई. दूसरी, कानून की कुछ धाराओं पर भी उन्हें आपत्ति थी. ये दोनों मुद्दे महत्वपूर्ण हैं और इन पर गंभीर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए.

लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह रही कि कई विधायकों ने माना कि उन्होंने इस विधेयक का समर्थन करने से पहले उसका पूरा मसौदा पढ़ा ही नहीं था. यह पूरा मामला सरकार और विपक्ष के बीच होने वाली सामान्य राजनीतिक खींचतान जैसा ही था, लेकिन विधायकों के इस स्वीकार ने एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया, जो राजनीतिक बयानबाजी के बीच लगभग दबकर रह गया.

वोट देने के पीछे की जिम्मेदारी

प्रतिनिधि लोकतंत्र किसी विधायक से क्या उम्मीद करता है? विधानसभा सिर्फ इसलिए नहीं बनाई जाती कि वहां बहुमत के आधार पर कानून पास कर दिए जाएं. विधानसभा का असली काम किसी भी विधेयक पर विस्तार से चर्चा करना, उसे समझना, उस पर सवाल उठाना और बहस करना है. इसके बाद ही वह कानून बनता है.

विधायक अपनी पार्टी के निर्देश के मुताबिक वोट दे सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें उस विधेयक को समझने की ज़रूरत ही नहीं है. किसी भी प्रस्तावित कानून को पढ़ना कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी या विशेष मेहनत नहीं है. यह तो एक विधायक के लिए अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की सबसे बुनियादी शर्त है. इस मामले में विधायकों का यह स्वीकार और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, अगर हम यह देखें कि यह कानून किन परिस्थितियों में लाया गया था.

अकाल तख्त की सुनवाई में क्या हुआ

पंजाब पिछले करीब 10 साल से बेअदबी के मामलों में न्याय का इंतज़ार कर रहा है. इन मामलों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. साल 2015 में बरगाड़ी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटना हुई थी. इसके बाद बेहबल कलां और कोटकपूरा में प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोली चलाई थी. इन घटनाओं से लोगों का राजनीतिक संस्थाओं पर भरोसा बुरी तरह टूट गया.

उस समय शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी सरकार ने अपने कदमों का बचाव किया. इसके बाद कांग्रेस ने न्याय और संस्थागत सुधार का वादा करके सत्ता मांगी. वहीं आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी पंजाब के लोगों से कहा कि इस मामले के दोषियों को आखिरकार सजा दिलाई जाएगी, लेकिन करीब 10 साल बाद राजनीतिक चर्चा का केंद्र बदल गया.

मूल बेअदबी मामलों में दोषियों को सज़ा दिलाने के बजाय अब चर्चा उस नए कानून पर होने लगी, जिसे बेअदबी करने वालों के लिए सजा और कड़ी करने के उद्देश्य से लाया गया. 13 अप्रैल को पंजाब विधानसभा ने जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) विधेयक, 2026 को सर्वसम्मति से पास कर दिया. इस कानून में बेअदबी के मामलों में सख्त सज़ा का प्रावधान किया गया.

हालांकि, यह सवाल भी उठा कि इतने महत्वपूर्ण धार्मिक विषय पर कानून लाने से पहले क्या संबंधित पक्षों से पर्याप्त सलाह-मशविरा किया गया था. मुझसे बातचीत में अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने कहा, “एह पहला कनून है जिस विच ओहना तों ही नहीं पुच्छेया जा रैया, जिना दे संबंधी एह कनून है.” (शायद यह पहला ऐसा कानून है, जिसे उन लोगों और संस्थाओं से सलाह किए बिना बनाया जा रहा है, जिनसे यह कानून सीधे जुड़ा हुआ है.)

उन्होंने कहा कि इस प्रस्तावित कानून की सबसे असामान्य बात यह है कि इसमें सिर्फ आरोपी ही नहीं, बल्कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की देखभाल और जिम्मेदारी संभालने वाले लोगों पर भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है. अगर बेअदबी की कोई घटना होती है, तो उन पर लापरवाही का आरोप लगाकर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है. उनके मुताबिक, यही एक बड़ा कारण था कि इस कानून को लाने से पहले संबंधित सिख संस्थाओं से व्यापक स्तर पर चर्चा होनी चाहिए थी.

इसी वजह से सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त ने पंजाब के सिख विधायकों और मंत्रियों को तलब किया, ताकि वे यह बताएं कि यह विधेयक किन परिस्थितियों में पास किया गया. इसी सुनवाई के दौरान विधायकों ने माना कि उन्होंने इस विधेयक का समर्थन करने से पहले इसे पढ़ा ही नहीं था. जब जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने AAP विधायक जगरूप सिंह गिल और कुलवंत सिंह से प्रस्तावित कानून के बारे में सवाल पूछे, तो दोनों ने स्वीकार किया कि उन्होंने विधेयक नहीं पढ़ा था और सिर्फ उस पर हस्ताक्षर कर दिए थे.

उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक विधानसभा में पेश होने से पहले उसे पढ़ने और समझने के लिए उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया गया. इस सुनवाई के दौरान एक और चिंताजनक बात सामने आई. जब AAP विधायक मनजीत सिंह से “कस्टोडियन” शब्द का मतलब पूछा गया, जो इस कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो उन्होंने इसका गलत अर्थ बताया.

इस घटना से यह साफ हुआ कि मामला सिर्फ जल्दबाजी में कानून पास करने का नहीं था, बल्कि विधायक ऐसे कानून का समर्थन कर रहे थे, जिसके महत्वपूर्ण कानूनी शब्दों का अर्थ भी वे ठीक से नहीं बता पा रहे थे.

बेअदबी कानून की बहस से आगे

इन सभी घटनाओं ने बहस को सिर्फ बेअदबी कानून की राजनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि कानून बनाने की पूरी प्रक्रिया पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. जब निर्वाचित जनप्रतिनिधि खुद यह स्वीकार करें कि उन्होंने किसी विधेयक को इसलिए नहीं पढ़ा क्योंकि उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिला, तो यह सिर्फ उनकी गलती नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की कमजोरी का संकेत है.

इसका मतलब है कि कानूनों की जांच और चर्चा का काम, जो विधानसभा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए, वह सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाने का खतरा पैदा हो गया है.

हालांकि, समय की कमी किसी भी विधायक के लिए बिना पढ़े किसी कानून का समर्थन करने का उचित कारण नहीं हो सकती. संसदीय लोकतंत्र में किसी विधायक की जिम्मेदारी सबसे पहले कानून को पढ़ने और समझने से शुरू होती है.

इसके अलावा, आज के समय में यह कहना कि दस्तावेज़ पढ़ने और समझने का समय नहीं मिला, उतना मजबूत तर्क नहीं है जितना पांच साल पहले हो सकता था. आज का समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का है. चैटजीपीटी और जेमिनी जैसे एआई टूल कुछ ही मिनटों में लंबे और जटिल दस्तावेजों का सार बता सकते हैं, उनका आसान भाषा में अनुवाद कर सकते हैं और उन्हें समझा भी सकते हैं.

कुछ आसान निर्देश देकर लंबे कानूनी दस्तावेजों को सरल भाषा में समझा जा सकता है और किसी विधेयक के अलग-अलग मसौदों की तुलना भी की जा सकती है. विडंबना यह है कि कई राजनीतिक नेता सोशल मीडिया पर एआई के इस्तेमाल को अपनी आधुनिक सोच और तकनीकी समझ का उदाहरण बताते हैं.

अगर एआई का इस्तेमाल भाषण, सोशल मीडिया पोस्ट, चुनावी सामग्री और वीडियो बनाने के लिए किया जा सकता है, तो फिर उसी एआई का इस्तेमाल विधायकों को उन कानूनों को समझाने के लिए क्यों नहीं किया जा सकता, जिन्हें उन्हें पास करना होता है? तकनीक किसी इंसान की समझ और फैसले लेने की क्षमता की जगह नहीं ले सकती, लेकिन यह इतना जरूर कर सकती है कि “समय नहीं था” जैसी दलील खत्म हो जाए.

लोकतंत्र के सामने असली सवाल

पंजाब के विधायकों का यह स्वीकार सिर्फ कुछ नेताओं या एक राज्य सरकार की कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी विधानसभाएं धीरे-धीरे उसी मूल जिम्मेदारी से दूर होती जा रही हैं, जिसके लिए उन्हें बनाया गया था.

एक आधुनिक संसदीय लोकतंत्र की नींव समझदारी से की गई चर्चा और विचार-विमर्श पर टिकी होती है. विधायकों से सिर्फ सदन में मौजूद रहने की नहीं, बल्कि अपनी समझ और विवेक के साथ कानून बनाने की प्रक्रिया में भाग लेने की उम्मीद की जाती है. अगर जिन लोगों को कानून पास करना है, वही उन्हें खुद पढ़ना और समझना छोड़ दें, तो कानूनों पर होने वाली बहस सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी, न कि संविधान की एक महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था.

हर राजनीतिक दल, जिसके विधायक विधानसभा में बैठे हैं, उन्हें ईमानदारी से खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या उनके सभी विधायक हर विधेयक पर वोट देने से पहले उसे पढ़ते हैं?

मजबूत पार्टी व्यवस्था और सामूहिक फैसले संसदीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन वे किसी विधायक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकते. अगर बिना सवाल पूछे किसी भी विधेयक को मंजूरी देना, सभी दलों में सोच-समझकर जांच करने की जगह लेने लगे, तो यह सिर्फ राजनीतिक समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरी व्यवस्था की समस्या बन जाती है.

श्री अकाल तख्त साहिब में हुई यह स्वीकारोक्ति सिर्फ राजनीति पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज पर भी सोचने का मौका देती है. विधायक भी उसी समाज का हिस्सा हैं, जिसने उन्हें चुना है. वे भी उसी संस्कृति से आते हैं, जहां पढ़ने और समझने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है और जहां सोच-विचार करने की बजाय जल्दी फैसला लेने को ज्यादा महत्व दिया जाता है. अगर समाज में बिना पढ़े हस्ताक्षर करना सामान्य बात बन गई है, तो यह हैरानी की बात नहीं कि यही आदत धीरे-धीरे सार्वजनिक संस्थाओं तक भी पहुंच जाए, लेकिन जब कोई विधायक किसी कानून को समझे बिना उसका समर्थन करता है, तो उसका असर सिर्फ उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता.

कानून लोगों के अधिकार, जिम्मेदारियां, संस्थाएं और सरकारी नीतियां तय करते हैं. इनका असर करोड़ों नागरिकों पर पड़ता है, जो यह भरोसा करते हैं कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि पूरी समझ के साथ उनके लिए फैसले लेंगे. इसी वजह से इस घटना को सिर्फ एक प्रस्तावित कानून से जुड़ा विवाद मानकर नहीं भूल जाना चाहिए.

इसे उस याद दिलाने वाली घटना के रूप में देखा जाना चाहिए कि प्रतिनिधि लोकतंत्र किन मूल सिद्धांतों पर टिका हुआ है.

राजनीतिक विवाद हमेशा नहीं रहते. सरकारें बदलती हैं, कानूनों में संशोधन होते हैं और समय के साथ लोगों का ध्यान दूसरे मुद्दों की ओर चला जाता है, लेकिन संस्थाओं की कार्य संस्कृति बहुत धीरे-धीरे बदलती है. यह उन छोटी-छोटी आदतों से बनती है, जिन पर समाज धीरे-धीरे सवाल पूछना बंद कर देता है.

ऐसी ही एक आदत है—यह मान लेना कि समझने का काम किसी और को सौंपा जा सकता है, लेकिन जिम्मेदारी फिर भी अपनी ही रहेगी. लोकतंत्र इस सोच की अनुमति नहीं देता. कानून बनाने का अधिकार मिलने के साथ उसे पूरी तरह समझने की जिम्मेदारी भी आती है. अगर यह जिम्मेदारी खत्म हो जाए, तो किसी विधेयक को मंजूरी देना सिर्फ कहीं और लिए गए फैसलों पर औपचारिक हस्ताक्षर भर बनकर रह जाएगा.

श्री अकाल तख्त साहिब में हुई यह पूरी कार्यवाही सिर्फ चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए भी एक असहज आईना साबित हुई. बिना पढ़े हस्ताक्षर करने की आदत तब मामूली लग सकती है, जब शुरुआत स्कूल की डायरी पर “पापा, यहां साइन कर दो”, किसी बैंक के फॉर्म या किसी सामान्य दस्तावेज से होती है, लेकिन यही आदत तब बहुत गंभीर हो जाती है, जब हस्ताक्षर उस व्यक्ति के हों, जिसे कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई हो. संस्थाएं सिर्फ बड़े संकटों से ही कमजोर नहीं होतीं. अक्सर वे उन सामान्य आदतों की वजह से कमजोर होती हैं, जिन्हें समय के साथ लोग सामान्य मान लेते हैं.

बिना पढ़े हस्ताक्षर करना भी ऐसी ही एक आदत है.

और जब यह आदत कानून बनाने की प्रक्रिया में पहुंच जाती है, तो यह सिर्फ किसी व्यक्ति की निजी कमी नहीं रहती, बल्कि लोकतंत्र की कमजोरी बन जाती है.

दमनजीत कौर पंजाब की एक स्वतंत्र लेखिका हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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