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जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में जारी रही जांच: क्या जज के इस्तीफे से खत्म हो जाती है जांच?

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ न्यायिक कदाचार के आरोपों की जांच करने वाली लोकसभा समिति ने उन्हें दोषी माना। इस्तीफे के बावजूद जांच जारी रही। जानें क्या है इसके पीछे की वजह और कानूनी पेच।

15 अगस्त 2026 को 06:57 am बजे
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में जारी रही जांच: क्या जज के इस्तीफे से खत्म हो जाती है जांच?

सौजन्य से:- Navbharat Times

जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ न्यायिक कदाचार के आरोपों की जांच करने वाली लोकसभा समिति ने सभी आरोपों को सही पाया। वर्मा के अप्रैल 2026 में इस्तीफा देने के बावजूद जांच जारी रही। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और जजों के खिलाफ तय इन-हाउस प्रक्रिया से समझिए कि इस्तीफे के बाद भी जांच क्यों जारी रखी जा सकती है।

नई दिल्लीः जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ न्यायिक कदाचार के आरोपों की जांच कर रही लोकसभा की समिति ने सभी आरोपों को सही पाया है। समिति के अनुसार, उनके आधिकारिक आवास पर बड़ी मात्रा में ऐसी नकदी मिली, जिसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। आग लगने की घटना के बाद जली हुई करेंसी को पुलिस द्वारा सुरक्षित नहीं रखे जाने के बावजूद जस्टिस वर्मा ने इस संबंध में टालमटोल वाला स्पष्टीकरण दिया। हालांकि, उन्होंने अप्रैल 2026 में राष्ट्रपति को इस्तीफा दे दिया था, इसके बावजूद समिति ने जांच जारी रखी और अपनी रिपोर्ट पेश की। ऐसे में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठा कि इस्तीफे के बाद भी जांच क्यों जारी रही?

पद से हटने के बाद जज को इम्यूनिटी नहीं

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ज्ञानंत सिंह के मुताबिक, 1999 में तय की गई इन-हाउस प्रक्रिया के तहत जांच के बाद यदि किसी जज को जिम्मेदार पाया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम उस जज को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश केंद्र सरकार से कर सकता है। इसके बाद संसद इस मामले पर फैसला करती है। सुप्रीम कोर्ट ने 1991 के के. वीरास्वामी मामले में कहा था कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा जज के खिलाफ आपराधिक मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के बिना मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। वहीं, 1999 की इन-हाउस प्रक्रिया के तहत जजों के खिलाफ कदाचार के आरोपों की आंतरिक जांच का प्रावधान है। हालांकि, यह प्रक्रिया आपराधिक जांच का विकल्प नहीं है। वीरास्वामी फैसले के तहत पद पर रहते हुए जज को मिलने वाली सुरक्षा पद छोड़ने के बाद लागू नहीं रहती और जांच एजेंसियां अपने स्तर पर जांच कर सकती हैं।

1978 का सुप्रीम कोर्ट फैसला भी महत्वपूर्ण

जज के इस्तीफे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट का 1978 का Union of India v. Gopal Chandra Misra फैसला महत्वपूर्ण माना जाता है। पांच जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि हाई कोर्ट का न्यायाधीश तत्काल प्रभाव से या भविष्य की किसी तारीख से अपना इस्तीफा दे सकता है। यदि इस्तीफा तत्काल प्रभाव से दिया गया है तो उसी समय न्यायाधीश का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। वहीं, यदि इस्तीफा किसी भविष्य की तारीख से प्रभावी होना है, तो उस तारीख तक उसे वापस लिया जा सकता है।

इस्तीफा देने से जांच खत्म नहीं होती

एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या जांच समिति गठित होने के बाद न्यायाधीश के इस्तीफा देने से जांच स्वतः समाप्त हो जानी चाहिए। कानूनी जानकारों के मुताबिक, ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी न्यायाधीश को प्रतिकूल जांच रिपोर्ट से बचने के लिए इस्तीफे का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी वजह से जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद भी समिति ने अपनी जांच जारी रखी और रिपोर्ट पेश की।

रिपोर्ट के बाद आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट मैथ्यू जे. नेदुम्पारा के मुताबिक, जस्टिस वर्मा पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं, इसलिए उनके खिलाफ महाभियोग चलाने का मामला अब नहीं रह जाता। लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी के अनुसार, यदि जस्टिस वर्मा पद पर होते तो समिति की रिपोर्ट के बाद उन्हें हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता साफ होता। अब इस्तीफे के कारण उस प्रक्रिया का स्वरूप अलग हो गया है।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें

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