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संविधान पीठ: 29 बड़े मामले लंबे इंतजार के बाद तेजी से निपटेंगे, क्या है इस पर सुप्रीम कोर्ट की योजना?

सुप्रीम कोर्ट में 29 संविधान पीठ के मामले लंबित हैं, जो महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर सुनवाई करते हैं। संविधान पीठ के पहले के प्रमुख ऐतिहासिक मामले 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य', 'के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ', 'इंद्र साहनी बनाम भारत संघ', 'एस.आर. बोम्बाई बनाम भारत संघ', 'मिनरवा मिल्स बनाम भारत संघ' और 'शायरा बानो बनाम भारत संघ' हैं।

14 अगस्त 2026 को 02:56 am बजे
संविधान पीठ: 29 बड़े मामले लंबे इंतजार के बाद तेजी से निपटेंगे, क्या है इस पर सुप्रीम कोर्ट की योजना?

सौजन्य से:- Navbharat Times

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सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ Constitution Bench आखिर होती क्या है?

- संविधान पीठ सुप्रीम कोर्ट की ऐसी बड़ी पीठ होती है, जो संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर सुनवाई करती है।

- संविधान Article 145(3) के जरिए कहता है कि किसी मामले में संविधान की व्याख्या से जुड़ा कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न होने पर कम से कम पांच जजों की पीठ जरूरी है। इसी वजह से पांच, सात या उससे अधिक जजों वाली पीठ को संविधान पीठ के रूप में गठित किया जा सकता है।

- ऐसे मामलों में अदालत के फैसले का असर केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि व्यापक संवैधानिक व्यवस्था पर पड़ सकता है। मौलिक अधिकार, संघीय संरचना, विधायी शक्तियाँ और संवैधानिक संशोधन जैसे प्रश्न कई बार ऐसी पीठों के सामने आते हैं।

- सुप्रीम कोर्ट के अपने फैसलों में भी Article 145(3) के तहत पांच जजों की न्यूनतम आवश्यकता को स्पष्ट किया गया है। इसीलिए संविधान पीठ मामलों का तेजी से निपटना न्यायिक व्यवस्था के लिए भी खासा महत्व रखता है।

कितने संविधान पीठ के मामले लंबे समय से लंबित हैं?

बार एंड बेंच की उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में कुल 29 संविधान पीठ के मामले लंबित हैं, जिनमें कई मामलों को बड़े यानी सात जजों वाली पीठ के सामने सुनवाई की आवश्यकता है। इन मामलों में ऐसे कानूनी प्रश्न शामिल हैं जिनका अंतिम उत्तर छोटी पीठों द्वारा नहीं दिया जा सकता। एक संविधान पीठ के मामले की सुनवाई में कई दिनों या उससे भी अधिक समय लग सकता है। इसके कारण नियमित मामलों की सूची और संविधान पीठ के मामलों के बीच समय का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता है। CJI का दो घंटे का स्लॉट इसी चुनौती को दूर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।Tribunal Reforms Bill संसद से पास, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या कनेक्शन? 16 ट्रिब्यूनलों पर रखेगा नजर

संविधान पीठ के पहले के प्रमुख ऐतिहासिक मामले और उनके फैसले क्या थे

- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) - इसमें कुल 13 न्यायाधीश शामिल थे, जो कि अब तक की सबसे बड़ी पीठ रही है। इसके फैसले में 'संविधान की मूल संरचना' का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। जिसके जरिए यह तय हुआ कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह उसके मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती।

- के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) - इसमें पीठ का आकार कुल 9 न्यायाधीश वाला था। इस संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया कि 'निजता का अधिकार' भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है।

- इंद्र साहनी बनाम भारत संघ (1992) - यह संविधान पीठ भी कुल 9 न्यायाधीशों को शामिल कर के बनाई गई थी। इसे 'मंडल मामला' भी कहा जाता है। दरअसल, इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण को वैध ठहराया गया, लेकिन आरक्षण की कुल सीमा 50% से अधिक न हो (क्रीमी लेयर के सिद्धांत के साथ) यह भी तय किया गया।

- एस.आर. बोम्बाई बनाम भारत संघ (1994) - इस संविधान पीठ वाले मामले में कुल 9 न्यायाधीश शामिल रहे। इस संविधान पीठ के फैसले ने अनुच्छेद 356 यानी राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था के तहत राज्य सरकारों की मनमाने ढंग से बर्खास्तगी किए जाने पर कड़ा अंकुश लगाया और धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मूल ढांचा माना।

- मिनरवा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) - इस संविधान पीठ का आकार कुल 5 न्यायाधीशो का था। इस पीठ के फैसले के जरिए यह साफ हुआ कि मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान के बुनियादी ढांचे का एक हिस्सा है, और न्यायिक समीक्षा की शक्ति को छीना या वापस नहीं लिया जा सकता।

- शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) - इस संविधान पीठ में कुल 5 न्यायाधीश शामिल रहे। इस का फैसला मुस्लिमों में तीन तलाक से जुड़ा था। इस मामले में संविधान पीठ ने तत्काल तीन तलाक (तलाक ए बिदत) की प्रथा को असंवैधानिक और मनमाना घोषित किया ।

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