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सुप्रीम कोर्ट: दो अविवाहित लोगों के बीच सहमति से बने रिश्ते को चरित्र खराब करने का आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित बालिगों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को किसी व्यक्ति के चरित्र को खराब बताने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यही नहीं रोका, बल्कि उम्मीदवार की पुलिस नियुक्ति को भी मंजूरी दे दी

8 जून 2026 को 06:15 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट: दो अविवाहित लोगों के बीच सहमति से बने रिश्ते को चरित्र खराब करने का आधार नहीं

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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बिना शादी सहमति से संबंध खराब चरित्र का आधार नहीं:सुप्रीम कोर्ट बोला- ऐसा कोई कानून नहीं, अर्जी दायर करने वाले की पुलिस नियुक्ति को मंजूरी

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि दो अविवाहित बालिगों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को किसी व्यक्ति के चरित्र को खराब बताने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो दो बालिग और अविवाहित लोगों को अपनी पसंद का संबंध रखने से रोकता हो।

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह टिप्पणी तेलंगाना स्टेट लेवल पुलिस रिक्रूटमेंट बोर्ड के एक मामले की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने उस उम्मीदवार की अपील मंजूर कर ली, जिसकी पुलिस कांस्टेबल भर्ती रद्द कर दी गई थी।कोर्ट ने कैंडिडेट को अपॉइंट करने का निर्देश दिया।

बोर्ड ने नियुक्ति के अयोग्य ठहरा दिया था

PTI के मुताबिक, उम्मीदवार की नियुक्ति इसलिए रद्द की गई थी क्योंकि उसके खिलाफ 2014 में शादी का वादा कर दुष्कर्म का मामला दर्ज हुआ था। भर्ती बोर्ड ने इसे नैतिक अधमता (मॉरल टरपिट्यूड) का मामला मानते हुए उसे अयोग्य ठहराया था। कैंडिडेट ने इसी को चुनौती दी थी।

हालांकि, यह मामला एक असफल प्रेम संबंध से जुड़ा था। रिकॉर्ड के अनुसार, उम्मीदवार और शिकायतकर्ता पड़ोसी थे और करीब चार साल तक रिश्ते में रहे थे। बाद में दोनों के बीच समझौता हो गया और 2015 में लोक अदालत में मामला खत्म कर दिया गया। मामले में IPC की धारा 376 के तहत कोई आरोप आगे नहीं बढ़ाया गया।

आरोप साबित होने तक निर्दोष

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून में तब तक निर्दोष मानने का सिद्धांत लागू होता है, जब तक अदालत में आरोप साबित न हो जाएं।

- इस मामले में आरोप धोखाधड़ी का था।धोखाधड़ी साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि किसी व्यक्ति को झूठे बहाने से गुमराह किया गया। शिकायतकर्ता ही बता सकती थी कि क्या उसे धोखा देकर संबंध में लाया गया था।

- बेंच ने कहा कि जब शिकायतकर्ता ने खुद मुकदमा आगे नहीं बढ़ाया, कोई सबूत पेश नहीं किया और समझौते पर सहमति जताई, तब भर्ती बोर्ड के पास उम्मीदवार के चरित्र के बारे में नकारात्मक निष्कर्ष निकालने का कोई आधार नहीं था।

- सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के उस आदेश को भी बरकरार रखा, जिसमें उम्मीदवार की नियुक्ति पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही पुलिस कांस्टेबल के पद पर उसकी नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया।

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इसका मतलब क्या है

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी देश में अविवाहित लोगों के अधिकारों को स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्दिष्ट करता है कि बिना शादी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र पर असर न पड़ने देना चाहिए, खासकर जब तक कि अपराध साबित नहीं हो जाता। इस फैसले से अविवाहित लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सुरक्षित महसूस करने में मदद मिल सकती है। यह फैसला भारतीय अदालतों की एक सही और न्यायसंगत दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो अविवाहित लोगों के जीवन को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है।

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