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जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का कांग्रेस नेता पीरजादा सैयद को राहत देने से इनकार, जानें क्या है पूरा मामला

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का कांग्रेस नेता पीरजादा सैयद को राहत देने से इनकार, जानें क्या है पूरा मामला जस्टिस एम ए चौधरी ने कहा कि कानून अब मालिकाना जमीन के बदले कहाचराई जमीन पर कब्जा करने की इजाजत नहीं देता है. Published…

ETV Bharat के अनुसार6 जून 2026 को 06:44 pm बजे
जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का कांग्रेस नेता पीरजादा सैयद को राहत देने से इनकार, जानें क्या है पूरा मामला

सौजन्य से:- ETV Bharat

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का कांग्रेस नेता पीरजादा सैयद को राहत देने से इनकार, जानें क्या है पूरा मामला

जस्टिस एम ए चौधरी ने कहा कि कानून अब मालिकाना जमीन के बदले कहाचराई जमीन पर कब्जा करने की इजाजत नहीं देता है.

Published : June 6, 2026 at 2:36 PM IST

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने अनंतनाग विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक पीरजादा मोहम्मद सैयद की उस अर्जी को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने कहचराई जमीन (पशुओं को चराने की जमीन) पर कब्जा होने पर सुरक्षा देने और अधिकारियों को उनकी मालिकाना जमीन के बदले जमीन बदलने पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की थी.

सात पन्नों के फैसले में, जस्टिस एम ए चौधरी ने कहा कि कानून अब मालिकाना जमीन के बदले कहाचराई जमीन पर कब्जा करने की इजाजत नहीं देता और कोर्ट अधिकारियों को ऐसी आग्रह मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. हालांकि, कोर्ट ने यह निर्देश देकर थोड़ी राहत दी कि याचिकाकर्ता को कानून की सही प्रक्रिया के अलावा बेदखल नहीं किया जा सकता.

दक्षिण कश्मीर में अनंतनाग विधानसभा क्षेत्र से विधायक पीरजादा मोहम्मद सैयद ने 2015 में एक याचिका दाखिल करके कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उन्होंने फ्रेंड्स एन्क्लेव, हुमहामा में अपने अलॉटेड रेजिडेंशियल प्लॉट से सटे N-23 नाम के जमीन के एक हिस्से पर बने निर्माण को गिराने से अधिकारियों को रोकने के लिए गाइडलाइन मांगी थी, और जमीन के अदला-बदली के लेकर किया गया आग्रह पर भी विचार करने की मांग की थी.

याचिका के मुताबिक, सैयद ने कहा कि उन्होंने राज्य युवा कांग्रेस अध्यक्ष और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राज्य इकाई के अध्यक्ष के तौर पर काम किया है. उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्हें सालों से आतंकी खतरों का सामना करना पड़ा है और आतंकवादियों ने उन पर हमला किया है, जबकि कोकेरनाग (अनंतनाग जिले में) में उनके घर पर भी कई बार हमला हुआ है.

याचिकाकर्ता ने कहा कि फ्रेंड्स एन्क्लेव, हुमहामा में प्लॉट नंबर 21 उसे जम्मू कश्मीर कोऑपरेटिव हाउसिंग कॉर्पोरेशन ने अलॉट किया था और उसने वहां एक घर बनाया था. उसने दावा किया कि पास की लगभग 9 से 10 मरला जमीन की एक पट्टी बाद में 2010 में उसकी सुरक्षा की चिंताओं को देखते हुए उसे अलॉट की गई थी और उसने उस साइट पर सिक्योरिटी वालों के लिए निर्माण का काम किया था.

हालांकि, सरकार ने याचिकाकर्ता का विरोध किया और तर्क दिया कि पिटीशनर ने कहचराई जमीन (कहचराई जमीन का मतलब पशुओं को चराने की जमीन)के 17 मरला पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया था और बिना इजाजत के निर्माण किए थे.

अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि सीमांकन की प्रक्रिया से पता चला कि याचिकाकर्ता को सिर्फ 1 कनाल, 9 मरला और 6 सिरसाई अलॉट की गई थी, जबकि सर्वे नंबर 1076/2 की अतिरिक्त 17 मरला जमीन, जो कहचराई जमीन के तौर पर दर्ज है, पर कब्जा कर लिया गया था. प्रतिवादी ने आगे कहा कि बडगाम के तहसीलदार की हेड वाली एक कमिटी ने अतिक्रमण की पुष्टि की और बडगाम के डिप्टी कमिश्नर के आदेश के मुताबिक गैर-कानूनी निर्माण हटा दिए गए.

रिकॉर्ड देखने के बाद, जस्टिस चौधरी ने कहा कि यह झगड़ा तब शुरू हुआ जब अधिकारियों को याचिकाकर्ता के आवंटित भूखंड से सटी काहचराई जमीन पर अतिक्रमण का पता चला.

कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि हालांकि हाउसिंग कॉर्पोरेशन ने 2010 में सटी हुई स्ट्रिप के अलॉटमेंट की जानकारी दी थी, लेकिन याचिकाकर्ता को खुद पता था कि जमीन काहचराई प्रकृति की है और इसलिए उसने मालिकाना जमीन के बदले इसे बदलने के लिए जिला कलेक्टर को अप्लाई किया था.

फैसले में कहा गया कि याचिकाकर्ता की एक्सचेंज आवेदन को जिला कलेक्टर ने 27 जून, 2016 को पहले ही खारिज कर दिया था क्योंकि अदला-बदली के लिए कोई खास मालिकाना जमीन नहीं पहचानी गई थी.

लैंड रेवेन्यू एक्ट के सेक्शन 133(2) का जिक्र करते हुए, जस्टिस चौधरी ने कहा कि अक्टूबर 2020 में इसके बदलाव से पहले, यह नियम कब्जा करने वाले को कहचराई जमीन के बदले उतनी ही मालिकाना जमीन देने की इजाजत देता था. लेकिन, बाद में इस नियम को एक नए कानूनी ढांचे से बदल दिया गया, जिसका मकसद आम ज़मीन और पब्लिक जमीन पर कब्ज़ा रोकना था.

कोर्ट ने कहा, "लैंड रेवेन्यू एक्ट के सेक्शन 133(2) में बदलाव को देखते हुए, आज की तारीख में, मालिकाना जमीन के बदले कहचराई जमीन देने का ऐसा कोई नियम नहीं है." कोर्ट ने आगे कहा, "इसलिए, याचिकाकर्ता की यह दलील कि बदले के ऑफर पर सीधे विचार किया जाए, अब मानने लायक नहीं है."

जस्टिस चौधरी ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे लेन-देन को नियंत्रण करने वाला कानूनी ढांचा अब मौजूद नहीं है. कोर्ट ने फैसला सुनाया, "कानून के ऊपर बताए गए नियम को सीधे पढ़ने से यह साफ है कि मालिकाना हक वाली ज़मीन के बदले कब्ज़ा की गई कहचराई ज़मीन की अदला-बदली अब मंजूर नहीं है और संबंधित डिप्टी कमिश्नर के पास ऐसा कोई ऑफर स्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं है."

आगे कहा गया, "ऐसा होने पर, याचिकाकर्ता के ऑफर पर विचार करने के लिए कोई कानूनी आधार या कानूनी ढांचा न होने पर, यह कोर्ट प्रतिवादी के खिलाफ 'रिट ऑफ मैंडेमस' जारी नहीं कर सकता कि वे याचिकाकर्ता के कहचराई जमीन के बदले उसकी मालिकाना हक वाली जमीन की अदला-बदली के ऑफर को स्वीकार कर लें."

यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता बिना कानूनी अधिकार के जमीन पर कब्जा कर रहा था, कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि, "इस तरह, याचिकाकर्ता उस जमीन पर बिना इजाजत के कब्जा किए हुए पाया गया, जो कहचराई प्रकृति की है." फिर भी कोर्ट ने याचिकाकर्ता के प्रक्रिया से जुड़े अधिकारों की रक्षा की और निर्देश दिया कि किसी भी तरह की बेदखली कानून के हिसाब से होनी चाहिए. जस्टिस चौधरी ने याचिका का निपटारा करते हुए आदेश दिया कि, याचिकाकर्ता को कानून का पालन किए बिना बेदखल नहीं किया जाएगा.

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