सुप्रीम कोर्ट ने माना केंद्र सरकार और एफ. एस. एस. ए. आई. कॉर्पोरेट दबाव में है!
सुप्रीम कोर्ट ने एफ. एस. एस. ए. आई. पर आरोप लगाया कि वह ज्यादा चीनी, नमक, और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स के पैकेटों पर वॉर्निंग लेबल लगाने में हिचकिचा रहा है, और सरकार और एफ. एस. एस. ए. आई. पर आरोप लगाया कि वे कॉर्पोरेट दबाव में हैं और पब्लिक हेल्थ के हित में ऐसे वॉर्निंग लेबल लगाने के लिए तैयार नहीं हैं.

सौजन्य से:- हिंदुस्तान
'अगर आप नहीं करेंगे, तो हम कर देंगे'; केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों थमाया ऐसा अल्टीमेटम
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच एक ऐसे केस की सुनवाई कर रही थी जिसमें कोर्ट ने पहले एफ. एस. एस. ए. आई. से पब्लिक हेल्थ के हित में ऐसे वॉर्निंग लेबल लगाने पर विचार करने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (13 अगस्त) को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफ. एस. एस. ए. आई.) की उस हिचकिचाहट पर सवाल उठाया, जिसमें वह ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स के पैकेटों पर ऊपर में ही वॉर्निंग लेबल लगाने में हिचकिचा रहा है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और एफ. एस. एस. ए. आई. के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई और पूछा कि क्या अधिकारी कॉर्पोरेट्स के दबाव में हैं। इसके बाद कोर्ट ने दो टूक कहा, "अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो हम करेंगे।"
शीर्ष अदालत ने केंद्र और एफ. एस. एस. ए. आई. से कहा, "यह मामला नागरिकों, खासकर बढ़ती उम्र के बच्चों की सेहत से जुड़ा है और इससे जुड़े फैसले कॉर्पोरेट घरानों के दबाव में प्रभावित नहीं होने चाहिए।" एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने एफ. एस. एस. ए. आई. की खूब खिंचाई की, जब याचिकाकर्ता ने इस बात की ओर इशारा किया कि फ़ूड बॉडी लेबलिंग के विचार के ख़िलाफ है। बता दें कि कोर्ट ने पहले भी एफ. एस. एस. ए. आई. से पब्लिक हेल्थ के हित में ऐसे वॉर्निंग लेबल लगाने पर विचार करने को कहा था।
वॉर्निंग लागू करने में हिचकिचा रहा एफ. एस. एस. ए. आई.
आज, कोर्ट ने इस बात पर गंभीरता से ध्यान दिया कि फूड स्टैंडर्ड्स वॉचडॉग की मीटिंग के मिनट्स के आधार पर, एफ. एस. एस. ए. आई. ऐसा कोई तरीका लागू करने में हिचकिचा रहा है। याचिकाकर्ता के वकील ने 7 मार्च को हुई एफ. एस. एस. ए. आई. की मीटिंग के मिनट्स का हवाला देते हुए कहा कि उसमें लिए गए फैसले कोर्ट के पहले के निर्देशों के बिल्कुल उलट थे। खाने के पैकेट पर वॉर्निंग लेबल के इंडस्ट्री के विरोध का हवाला देते हुए, एफ. एस. एस. ए. आई. ने एक्स्ट्रा चीनी, सैचुरेटेड फैट और नमक की रोज़ाना की ज़रूरत की टेबल में घोषणा करने का सुझाव दिया है।
कॉरपोरेट लॉबी के दबाव के आगे झुक रही सरकार
यह बताया गया कि एफ. एस. एस. ए. आई. के एफिडेविट में सिर्फ़ फ़ूड इंडस्ट्री के विरोध का ज़िक्र था, लेकिन सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए एक्स्ट्रा सैचुरेटेड फैट, चीनी और नमक वाले खाने की चीज़ों के इस्तेमाल को रोकने में मदद करने के लिए वॉर्निंग लेबल के पक्ष में सबूतों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इस पर कोर्ट ने पूछा कि क्या एफ. एस. एस. ए. आई. फूड मैन्युफैक्चरिंग में शामिल कॉर्पोरेट एंटिटीज़ के आगे झुक रहा है।
आप कोर्ट को बेवकूफ़ बना रहे हैं?
बेंच ने कहा, "क्या आप कोर्ट को बेवकूफ़ बना रहे हैं? ... इन सभी कॉर्पोरेट हाउस का आप पर बहुत ज़्यादा प्रेशर है। और आप उस प्रेशर के आगे झुक रहे हैं! हम यह पब्लिक इंटरेस्ट में कर रहे हैं। यह ध्यान रखें। हम यह अपने लिए नहीं कर रहे हैं। आप हमारे ऑर्डर का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं? आपने अब तक क्या किया है? हम आप पर प्रेशर जानते हैं। क्या आप यह खुद करेंगे या हमें कोई ऑर्डर पास करना चाहिए?" कोर्ट इस बात से भी प्रभावित नहीं हुआ कि अगर ऐसे वॉर्निंग लेबल लगाए गए तो नमकीन जैसे कई इंडियन खाने की चीज़ों पर भी फैट, शुगर या सॉल्ट ज़्यादा होने का लेबल लग जाएगा। कोर्ट ने पूछा, “आप नहीं चाहते कि इस देश के लोग हेल्दी रहें? खासकर बढ़ते बच्चे?”
क्या सरकार जरूरी कार्रवाई करने को तैयार है?
बेंच ने केंद्र की तरफ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) बृजेंद्र चाहर से सीधे सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार ज़रूरी कार्रवाई करने को तैयार नहीं है और दोहराया कि कोर्ट का आदेश साफ़ है। बेंच ने यह भी कहा कि सरकार पर बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों का बहुत ज़्यादा दबाव है और वह "उस दबाव के आगे झुक रही है"। कोर्ट ने कहा कि वह यह एक्शन "पब्लिक इंटरेस्ट" में ले रहा है। गुस्से में कोर्ट ने पूछा, "क्या सरकार खुद ऐसा करेगी, या हमें ऑर्डर जारी करना होगा?" एएसजी ब्रिजेंद्र चाहर ने कोर्ट से रिक्वेस्ट की कि उन्हें सरकार के एक्शन के प्लान के बारे में बताने की इजाज़त दी जाए, लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार को ठीक वही करना होगा जो कोर्ट ने कहा है। बेंच ने दोहराया, "अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो हम ऑर्डर पास करेंगे।"
लेखक के बारे में
प्रमोद प्रवीणप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले एनडीटीवी, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।
न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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