वैवाहिक जीवन से सेक्स गायब, तलाक का आधार हो सकता है?
भारतीय कानूनों के तहत तलाक का आधार बन सकता है वैवाहिक जीवन से सेक्स गायब होना. लेकिन इसके लिए अदालत को कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार करना होता है.

सौजन्य से:- Navbharat Times
Sexless Marriage & Divorce : विवाह में भावनात्मक जुड़ाव, विश्वास और पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध की मौजूदगी तीनों महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ऐसे में यदि पति-पत्नी के बीच लंबे समय तक यौन संबंध ही पूरी तरह समाप्त हो जाएं, तो क्या हो? क्या यह तलाक का आधार बनता है?
नई दिल्ली: भारतीय समाज में विवाह के बारे में एक धारणा यह है कि यह सात जन्मों का बंधन है। इस केवल केवल सामाजिक संस्था नहीं बल्कि आजीवन चलने वाला माना जाता है। विवाह में भावनात्मक जुड़ाव, विश्वास और पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध की मौजूदगी तीनों महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ऐसे में यदि पति-पत्नी के बीच लंबे समय तक यौन संबंध ही पूरी तरह समाप्त हो जाएं, तो क्या हो? ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह तलाक का आधार बन सकता है? भारतीय कानून के तहत इस बारे में क्या कहा गया है। इस विषय पर स्पष्ट रूप से ‘ सेक्सलेस मैरिज ’ शब्द का उल्लेख नहीं करता, लेकिन न्यायालयों ने समय-समय पर अपने फैसलों में इसे मानसिक क्रूरता के दायरे में रखा है।
दरअसल, भारतीय विवाह कानूनों, विशेषकर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 में तलाक के विभिन्न आधार बताए गए हैं। इनमें व्यभिचार, क्रूरता, परित्याग, धर्म परिवर्तन और मानसिक बीमारी जैसे आधार शामिल हैं। लेकिन गौर करने वाली बात है कि कानून में सेक्सलेस मैरिज को अलग से तलाक का आधार नहीं बनाया गया है। हालांकि, यौन संबंधों से लगातार और बिना उचित कारण इनकार किया जाता है, तो अदालत इसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में रख सकती है। न्यायालय यह भी देखता है कि इनकार अस्थायी था या लंबे समय तक जारी रहा। यदि मामला चिकित्सीय या गंभीर बीमारी से जुड़ा हो तो संदर्भ अलग हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि लगातार ‘इनकार’ मानसिक क्रूरता है
ऐसे जटिल भावनात्मक रिश्तों से जुड़े विवादों को सुलझाने में सुप्रीम कोर्ट की गाईडलाइन बहुत काम आती हैं। समर घोष बनाम जया घोष (2007) मामले में शीर्ष अदालत के दिए गए दिशा-निर्देशों से ऐसे मामलों की गंभीरता जांची जा सकती है। वैवाहिक मामलों में मानसिक क्रूरता के पैमाने तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, शारीरिक संबंधों का अभाव और भावनात्मक उपेक्षा क्रूरता की श्रेणी में आते हैं। बिना किसी उचित कारण के लगातार यौन संबंध बनाने से इनकार मानसिक क्रूरता है। अदालत ने कहा कि वैवाहिक संबंध केवल साथ रहने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैवाहिक निकटता भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।लगातार यौन संबंधों में जबरन दूरी विवाह की मूल भावना को ही कमजोर करती है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा व्यवहार दूसरे जीवनसाथी को गंभीर मानसिक पीड़ा देता है।
कई मामलों में अदालत ने माना है कि यदि पति-पत्नी वर्षों से अलग रह रहे हों, उनके बीच कोई वैवाहिक संबंध न हो और सुलह की संभावना समाप्त हो चुकी हो, तो विवाह केवल कागजों पर रह जाता है। ऐसे मामलों में विवाह को जबरन जारी रखना दोनों पक्षों के साथ अन्याय हो सकता है। यदि सेक्सलेस मैरिज लंबे अलगाव और अन्य विवादों के साथ जुड़ी हो, तो तलाक की संभावना मजबूत हो जाती है। हालांकि अदालतों ने यह भी साफ किया कि केवल अलग रहना ही पर्याप्त नहीं है; पूरे वैवाहिक संबंध की परिस्थितियों का मूल्यांकन जरूरी है।
दरअसल, जैसा कि पहले के फैसलों और प्रावधानों से यह तय होता रहा कि दोनों पक्ष यानी पति-पत्नी यदि आपसी सहमति से ऐसे जीवन को स्वीकार कर रहे हों या चिकित्सीय कारण मौजूद हों, तो इसे क्रूरता नहीं माना जाएगा। लेकिन यदि एक पक्ष लगातार और अनुचित तरीके से दूसरे को वैवाहिक अधिकारों से वंचित करता है, तो यह मानसिक क्रूरता का केस बन सकता है। इसलिए हर मामला अपने अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर तय होता है और होगा कि वैवाहिक जीवन से सेक्स गायब होने पर भारतीय कानूनों के तहत तलाक का आधार बनेगा या नहीं।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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