तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गाय और बछड़ों के वध पर प्रतिबंध की चुनौती
तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की है, जिसमें उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट द्वारा लगाए गए गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध के फैसले को चुनौती दी है। राज्य सरकार ने कहा है कि हाई कोर्ट ने वैधानिक कानून की जगह न्यायिक कानून बनाने जैसा कदम उठाया है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध के खिलाफ तमिलनाडु सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट
मद्रास हाई कोर्ट द्वारा तमिलनाडु में गाय और बछड़ों के वध पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध के फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
मामले में क्या है राज्य सरकार का कहना
राज्य सरकार का कहना है कि इस कानून के तहत 10 साल से अधिक उम्र की ऐसी गायों का वध किया जा सकता है, जो काम करने और प्रजनन के लिए अनुपयुक्त हों और जिनके लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाण पत्र जारी किया गया हो। सरकार ने कहा कि अन्य लागू कानून जैसे पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम, 2001, तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम, 1998 और तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय नियम, 2023 भी पशु वध की परिस्थितियों को नियंत्रित करते हैं, लेकिन पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाते।राज्य सरकार ने लगाया आरोप
राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि पूर्ण प्रतिबंध लगाकर हाई कोर्ट ने वैधानिक कानून की जगह न्यायिक कानून बनाने जैसा कदम उठाया है। यह मामला हाई कोर्ट के 27 मई के आदेश से जुड़ा है, जिसे जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायण की पीठ ने बकरीद की पूर्व संध्या पर एक जनहित याचिका पर सुनाया था। यह याचिका हिंदू मक्कल काची के महासचिव के. सूर्य प्रसांत ने दायर की थी।हाई कोर्ट ने फैसले सुनाते हुए SC के आदेशों का दिया हवाला
याचिकाकर्ता की मांग केवल यह थी कि पशु वध केवल निर्धारित स्थानों पर ही हो, लेकिन हाई कोर्ट ने राज्य में किसी भी दिन और किसी भी स्थान पर गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में एक सरकारी आदेश का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि गाय वध पर प्रतिबंध दूध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया था, जिनमें कहा गया था कि बकरीद के लिए गाय की कुर्बानी कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।तमिलनाडु सरकार ने याचिका में कही ये बात
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में तमिलनाडु सरकार ने कहा कि जब कानून किसी विशेष श्रेणी की गायों के वध की अनुमति देता है, तो उसके विपरीत कोई न्यायिक आदेश टिक नहीं सकता। राज्य ने हाई कोर्ट द्वारा सरकारी आदेश संख्या 1715 पर भरोसा करने पर भी आपत्ति जताई है। सरकार का कहना है कि इस आदेश की वैधता या लागू होने का मुद्दा हाई कोर्ट के सामने था ही नहीं। कार्यपालिका का कोई निर्देश राज्य में पशु वध से जुड़े वैधानिक कानूनों को खत्म नहीं कर सकता।डिवीजन बेंच ने किया फैसले का विस्तार
तमिलनाडु सरकार ने अपनी विशेष अनुमति याचिका (SLP) में कहा कि हाई कोर्ट में दाखिल याचिका सीमित रूप से कोयंबटूर में बकरीद के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर गाय वध रोकने तक थी। इसके बावजूद डिवीजन बेंच ने मुद्दे का विस्तार करते हुए निर्धारित वधशालाओं में भी गाय वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जबकि याचिकाकर्ता ने ऐसी कोई मांग नहीं की थी।बिना मांग और दलील के कोर्ट ने दिया ऐसा फैसला
सरकार ने कहा कि हाई कोर्ट ने ऐसा राहत आदेश दिया, जिसकी न तो याचिका में मांग की गई थी और न ही दलील दी गई थी। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के फैसले में विरोधाभास है। एक ओर कोर्ट ने कहा कि पशु वध केवल निर्धारित वधशालाओं में होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर यह निर्देश दे दिया कि बकरीद या किसी भी अन्य दिन गाय या बछड़े का वध नहीं किया जा सकता।9 जून को दाखिल हुई थी याचिका
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, तमिलनाडु सरकार की याचिका 9 जून को दाखिल की गई थी और फिलहाल फाइलिंग संबंधी कमियों को सुधारने के लिए डिफेक्ट लिस्ट में है। यह याचिका राज्य की ओर से स्टैंडिंग काउंसल जयश्री नरसिम्हन और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के माध्यम से दायर की गई है।कन्वर्सेशन शुरू करें
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