‘कोई भी जज फैसला नहीं सुना पाएगा’, जस्टिस जीएस पटेल के परिवार पर हमले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी - Jansatta
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जजों और उनके परिवारों को मिल रही धमकियों और उन पर हो रहे हमलों पर चिंता जाहिर की है। यह चिंता खासकर बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस जीएस पटेल और उनके परिवार को मिल र…

सौजन्य से:- Jansatta
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जजों और उनके परिवारों को मिल रही धमकियों और उन पर हो रहे हमलों पर चिंता जाहिर की है। यह चिंता खासकर बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस जीएस पटेल और उनके परिवार को मिल रही धमकियों की खबरों के बाद जताई गई है।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने कहा कि ऐसी घटनाएं न्याय व्यवस्था पर चोट करती हैं और जजों को निडर होकर अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोक सकती हैं। कोर्ट मध्य प्रदेश में एक न्यायिक अधिकारी के घर पर हमले की अगुवाई करने के आरोपी व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
बेंच ने कहा कि अगर जजों को अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए इस तरह डराया-धमकाया जाता है, तो न्याय व्यवस्था पर इसके गंभीर परिणाम होंगे। बांर एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि बॉम्बे हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को तरह-तरह की धमकियां मिल रही हैं, लंदन में उनकी पोती पर हमला हुआ और आप उन जजों के साथ ऐसा कर रहे हैं जो फैसले सुनाते हैं? कोई भी जज फैसला नहीं सुना पाएगा।”
खबरों के अनुसार, दाऊदी बोहरा नेतृत्व विवाद में अप्रैल 2024 में दिए गए फैसले के बाद जस्टिस पटेल को लगातार धमकियां मिल रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक उनके परिवार के सदस्यों और धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ा है। इसके चलते भारत और यूके दोनों जगहों पर अधिकारी मामले की जांच कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी प्रियांशु सिंह की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान आई। सिंह मध्य प्रदेश में एक मजिस्ट्रेट के घर पर तोड़-फोड़ में शामिल होने के आरोपों के चलते सात महीने से ज्यादा समय से हिरासत में हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना तब हुई जब संबंधित मजिस्ट्रेट ने सिंह की पिछली जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद, आरोप है कि उसने न्यायिक अधिकारी को निशाना बनाने के लिए दूसरों के साथ मिलकर साजिश रची। राज्य का दावा है कि सिंह और कई सह-आरोपी रात में मजिस्ट्रेट के सरकारी बंगले में घुसे, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, पत्थर फेंके, अधिकारी के साथ बदसलूकी की और उन्हें जान से मारने की धमकी दी।
राज्य ने सीसीटीवी फुटेज का भी हवाला दिया। इसमें सिंह को घटना से जुड़ी अलग-अलग जगहों पर, यहां तक कि मजिस्ट्रेट के घर के सामने भी देखा गया था। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि यह अपराध न्याय प्रशासन में बाधा डालने जैसा है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मई में सिंह की जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता, मुख्य आरोपी के तौर पर उसकी कथित भूमिका और उसके आपराधिक इतिहास को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया था। हाई कोर्ट ने नोट किया कि उसके खिलाफ सात आपराधिक मामले दर्ज थे।
इसके बाद उसने राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, सिंह के वकील ने दलील दी कि वह पहले ही सात महीने से ज्यादा समय हिरासत में बिता चुके हैं और उन्हें सिर्फ शक के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि आरोप गंभीर हैं, लेकिन सिंह के खिलाफ कोई सीधा सबूत नहीं है।
आपके खिलाफ सात आपराधिक मामले दर्ज हैं- सुप्रीम कोर्ट
हालांकि, बेंच उनकी दलील से सहमत नहीं दिखी और कहा कि आरोप है कि सिंह ने उस ग्रुप की अगुवाई की थी जिसने मजिस्ट्रेट के घर पर हमला किया था। कोर्ट ने कहा, “उन्होंने सब कुछ तहस-नहस कर दिया और आप उनके लीडर थे और आपके खिलाफ सात आपराधिक मामले दर्ज हैं।”
ब्रिटेन में पुलिस ने परिवार को दी सुरक्षा
जस्टिस पटेल और उनके परिवार को मिली धमकियों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने जमानत नहीं दी। बता दें कि हर्टफोर्डशायर पुलिस ने ब्रिटेन में बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस गौतम पटेल के परिवार के सदस्यों को सुरक्षा दी है।
यह भी पढ़ें: व्यक्ति की अवैध हिरासत पर भड़का इलाहबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को आठ दिनों तक गैर-कानूनी रूप से पुलिस कस्टडी में रखने के मामले को गंभीरता से लिया है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह उसे 6 हफ़्ते के अंदर दो लाख रुपये का मुआवज़ा दे। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि राज्य सरकार यह रकम प्रयागराज के बारा इलाके के असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (ACP) से वसूलेगी, लेकिन इसके लिए पहले उनके ख़िलाफ़ तीन महीने के अंदर अनुशासनात्मक जांच करनी होगी। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
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इसका मतलब क्या है
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और न्यायाधीशों की सुरक्षा पर जोर देती है। यह दर्शाता है कि जजों और उनके परिवारों को मिल रही धमकियां और हमले न केवल व्यक्तिगत रूप से चिंताजनक हैं, बल्कि वे पूरे न्यायिक तंत्र को भी प्रभावित करते हैं। इससे न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता और स्थिरता पर Questions उठते हैं और यह जरूरी हो जाता है कि जजों को अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए सुरक्षित माहौल मिले।
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