FIR कैंसल करना एक आसान काम नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया हाई कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है जिसमें उच्च न्यायालयों को मुकदमा रद्द करने की अपनी शक्ति का इस्तेमाल बहुत ही सोच-समझकर और कभी-कभार ही करने के लिए कहा गया है। हाईकोर्ट को प्राथमिकी रद्द करने की मांग पर विचार करते समय मुकदमे का मिनी ट्रायल नहीं कर सकता।

सौजन्य से:- Hindustan
ऐसे नहीं कैंसल की जा सकती FIR, सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया हाई कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि हाई कोर्ट को किसी एफआईआर को रद्द करने को लेकर मिनी ट्रायल करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
प्रभात कुमार, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि उच्च न्यायालयों को मुकदमा रद्द करने की अपनी शक्ति का इस्तेमाल बहुत ही सोच-समझकर और कभी-कभार ही करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट प्राथमिकी रद्द करने की मांग पर विचार करते समय मुकदमे का मिनी ट्रायल नहीं कर सकते।
मुकदमा रद्द करने की शक्ति का प्रयोग सोचकर करें हाईकोर्ट
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर यह फैसला दिया। हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपों में कर्नाटक पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर दर्ज 6 प्राथमिकी रद्द कर दी थी। पीठ ने कहा कि यह तय कानून द्वारा स्थापित सिद्धांत है कि उच्च न्यायालयों को दर्ज प्राथमिकी रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। जस्टिस करोल ने कहा, जब कोई हाईकोर्ट प्राथमिकी रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा हो, तो उसे जांच से जुड़ी सामग्री के बारे में गैर-जरूरी छानबीन करने से बचना चाहिए। कहा गया कि हाईकोर्ट को बस यह देखना होता है कि क्या पहली नजर में प्राथमिकी के तथ्यों से किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है या नहीं। अदालत ने कहा कि प्राथमिकी रद्द करने की मांग के शुरुआती चरण में ही हाईकोर्ट द्वारा ‘मुकदमे का मिनी-ट्रायल’ नहीं किया जा सकता।
अदालत ने दायरे से बाहर जाकर काम किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने आदेशों में सीआरपीसी की धारा-482 के तहत याचिका पर विचार करने के दायरे से बाहर जाकर काम किया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दो अहम बातों पर ध्यान दिया था, पहला प्राथमिकी दर्ज करने में देरी और दूसरा पैसे की मांग या वसूली का कोई सबूत न होना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैर-कानूनी तरीके से पैसे या फायदे की मांग और उसकी वसूली का सबूत न होना, बरी होने का तो आधार बन सकता है लेकिन, यह प्राथमिकी रद्द करने का आधार नहीं हो सकता। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा छह प्राथमिकी रद्द करने का फैसला रद्द कर दिया।
यह है मामला
कर्नाटक पुलिस ने वर्ष 2020 में बेंगलुरु की सेंट्रल क्राइम ब्रांच के सहायक पुलिस आयुक्त प्रभु शंकर और अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण रोकथाम अधिनियम (पीसी एक्ट) एवं अन्य धाराओं में 6 प्राथमिकी दर्ज की थी। इसके बाद, आरोपी पुलिस अधिकारी प्रभु शंकर और इंस्पेक्टर निरंजन कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दर्ज प्राथमिकियों को रद्द करने की मांग की। हाईकोर्ट ने सितंबर, 2021 में सभी पक्षों को सुनने के बाद यह कहते हुए दर्ज प्राथमिकियां रद्द कर दी।
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Ankit Ojhaविद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के 'लाइव हिन्दुस्तान' के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।
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अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।
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