पासपोर्ट के नवीनीकरण में भी देरी नहीं: कलकत्ता हाई कोर्ट का न्यायसंगत फैसला
कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामला लंबित होने मात्र से किसी व्यक्ति को पासपोर्ट पाने या उसका नवीनीकरण कराने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

सौजन्य से:- Jagran
'पासपोर्ट सिर्फ विदेश यात्रा का टिकट नहीं, हर नागरिक का अधिकार', कलकत्ता हाई कोर्ट का अहम फैसला
कलकत्ता हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि आपराधिक मामले लंबित होने मात्र से किसी व्यक्ति को पासपोर्ट पाने या उसके नवीनीकरण के अधिकार से वंचित नहीं किया ...और पढ़ें
HighLights
- आपराधिक मामला लंबित होने पर भी पासपोर्ट का अधिकार।
- कलकत्ता हाई कोर्ट ने 10 साल के नवीनीकरण का निर्देश दिया।
- विदेश यात्रा के लिए अदालत की अनुमति अभी भी आवश्यक।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने मात्र से उसे पासपोर्ट पाने या उसका नवीनीकरण कराने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने बुधवार को कहा कि पासपोर्ट भी अन्य सरकारी दस्तावेजों की तरह एक नागरिक दस्तावेज है। केवल यह मान लेना कि पासपोर्ट बनते ही व्यक्ति विदेश भाग जाएगा, कानून की सही व्याख्या नहीं हो सकती। पासपोर्ट बनवाना और विदेश यात्रा करना दोनों बिल्कुल अलग विषय हैं।
विदेश जाने की अनुमति देना या रोकना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विषय हो सकता है, लेकिन पासपोर्ट की वैधता तय करना पूरी तरह पासपोर्ट प्राधिकरण की प्रशासनिक जिम्मेदारी है। किसी कानून की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे नागरिकों के अधिकार अनावश्यक रूप से सीमित हों या अदालतों पर अतिरिक्त बोझ पड़े।
यह पूरा मामला अमित कुमार अग्रवाल नामक एक व्यक्ति से जुड़ा है, जिन पर प्रिवेंशन आफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत झारखंड के रांची की विशेष अदालत में दो मामले लंबित हैं।
इन मामलों के चलते उनके पासपोर्ट की मियाद पूरी होने के बाद जब उन्होंने नवीनीकरण (रिन्यूअल) के लिए आवेदन किया, तो निचली अदालत ने कुछ शर्तों के साथ अनुमति तो दी, लेकिन पासपोर्ट प्राधिकारी ने यह तर्क देते हुए केवल एक साल का पासपोर्ट देने की जिद पकड़ी कि अदालत ने अवधि स्पष्ट नहीं की है।
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इसके खिलाफ अमित कुमार अग्रवाल ने कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि बालिगों के लिए सामान्य नियमों के तहत 10 साल का पासपोर्ट मिलना चाहिए, न कि सिर्फ एक साल का।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और निर्देश
विदेश मंत्रालय की ओर से 1993 की एक अधिसूचना का हवाला देते हुए यह दलील दी गई थी कि यदि अदालत अवधि का जिक्र न करे, तो एक साल का पासपोर्ट देने का नियम है। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी कानून की व्याख्या इस तरह नहीं की जानी चाहिए जिससे नागरिकों के अधिकारों का अनावश्यक हनन हो या अदालतों पर प्रशासनिक बोझ बढ़े।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आरोपित के पासपोर्ट की अवधि 10 साल के लिए बढ़ाई जाती है, तो इससे चल रही जांच या न्यायिक प्रक्रिया में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी। इससे हर साल रिन्यूअल के लिए अदालतों के चक्कर काटने की झंझट से राहत मिलेगी।
अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि पासपोर्ट की अवधि 10 साल की होगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपित बिना अनुमति विदेश जा सकेगा।
विदेश यात्रा करने के लिए उसे संबंधित विशेष अदालत से पूर्व अनुमति लेनी होगी और निचली अदालत की सभी शर्तें ज्यों की त्यों लागू रहेंगी। अदालत ने पासपोर्ट प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह आगामी तीन सप्ताह के भीतर आवेदक का पासपोर्ट पूरे 10 साल की अवधि के लिए नवीनीकृत (रिन्यू) करे।
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