सुप्रीम कोर्ट ने कहा- प्रकृति की अनुकूलनीयता का दूसरा हिस्सा पीढ़ीगत रूप से कमजोरी, बेटी बचाने के अभियान भी बंद होने की जरूरत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आंकड़े दिखाते हैं कि प्रकृति की अनुकूलनीयता का दूसरा हिस्सा पीढ़ीगत रूप से कमजोरी, आजादी के 75 साल बाद भी बेटियों के सशक्तिकरण और वित्तीय सुरक्षा के पोस्टर देखे जा रहे हैं

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति का हवाला देकर पूछा- 'आजादी के 75 साल बाद भी बेटी बचाने के पोस्टर क्यों?'
सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति के श्लोक और सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता का हवाला देते हुए पितृसत्तात्मक सोच और लिंग चयन पर जताई गहरी चिंता.
By Sumit Saxena
Published : June 11, 2026 at 6:56 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बेटी के जन्म पर मां की खुशी को बयां करने वाली कविता 'बालिका का परिचय' का जिक्र किया. इसके साथ ही कोर्ट ने मनुस्मृति के श्लोक- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" (जहाँ महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता वास करते हैं)- का हवाला देते हुए बेटों को तरजीह देने वाली पुरुष-प्रधान सोच और गुपचुप तरीके से किए जाने वाले भ्रूण परीक्षण की प्रथा पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई.
सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा कि आजादी के 75 से ज्यादा साल बीत जाने के बाद भी, हमारे कस्बों और शहरों में बेटियों की शिक्षा, सशक्तिकरण और वित्तीय सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले पोस्टर देखना एक आम बात है. यहां तक कि दिल्ली में भी दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की बसों पर अक्सर ऐसे संदेश लिखे हुए मिल जाते हैं.
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आता, तब तक 'गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक' (PCPNDT) अधिनियम को कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता है.
बेटियों के लिए चलाई जा रही "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, जननी सुरक्षा योजना, लाडली लक्ष्मी योजना" जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा- "ये योजनाएं इस पुरुष-प्रधान व्यवस्था में बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लगातार प्रयासों को दर्शाती हैं. इस दिशा में काफी प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है."
पीठ ने संक्षेप में कहा कि हालांकि स्थिति 1990 के दशक के मध्य की तुलना में काफी बेहतर है, लेकिन आंकड़े इस मामले में लापरवाही या संतुष्ट होकर बैठ जाने की इजाजत नहीं देते.
अदालत ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि अब तक हुई प्रगति अधूरी और असमान है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, "नतीजतन, पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) अधिनियम जैसे कल्याणकारी कानूनों की ईमानदारी और सख्ती से पालना तब तक जरूरी है, जब तक कि समाज की मानसिकता में व्यापक बदलाव नहीं आ जाता. जब तक महिला की तथाकथित 'जन्मजात कमजोरी' की सोच वास्तविक समानता में नहीं बदल जाती, तब तक ऐसे ईमानदार प्रयास जारी रखने होंगे. जब समाज को यह अहसास हो जाएगा, तब ऐसे अभियानों की जरूरत नहीं रह जाएगी."
पीठ ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि आईपीसी/बीएनएस (IPC/BNS) जैसे कानूनों के तहत महिलाओं को मिलने वाले कानूनी संरक्षण की जरूरत खत्म हो जाएगी. बल्कि कम से कम समाज में इस बात पर सवाल उठना बंद हो जाएगा कि किसी बेटी को जन्म लेने का अधिकार है या नहीं.
पीठ ने कहा कि इतिहास के पन्ने पलटने से यह बात साबित होती है. जनगणना के आंकड़े दिखाते हैं कि राष्ट्रीय बाल लिंगानुपात साल 1991 में 945 था, जो 2001 में घटकर 927 और 2011 में और गिरकर 919 पर पहुंच गया. यह गिरावट उस गंभीर असंतुलन को दर्शाती है जिसके कारण पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) अधिनियम को इतनी सख्ती से लागू करना पड़ा.
पीठ ने कहा कि जन्म के समय लिंगानुपात सुधरकर 929 होना आंशिक सुधार तो दिखाता है, लेकिन यह अभी भी सच्ची समानता और स्वीकार्यता का रास्ता नहीं है. राज्यों के बीच के अंतर से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है. उदाहरण के लिए, हरियाणा और पंजाब, जहां सदी की शुरुआत के तुरंत बाद के वर्षों में बाल लिंगानुपात 900 से भी नीचे दर्ज किया गया था, वहां बाद के सर्वेक्षणों में सुधार देखा गया है.
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा, "इसके बावजूद, कई राज्य अब भी जन्म के समय राष्ट्रीय औसत से कम लिंगानुपात दर्ज कर रहे हैं. यह बेटों को तरजीह देने वाली गहरी पितृसत्तात्मक (पुरुष-प्रधान) सोच की निरंतर मौजूदगी और 'पर्दे के पीछे' गुपचुप तरीके से चलने वाली लिंग चयन (भ्रूण परीक्षण) की प्रथा को दिखाता है."
पीठ ने कहा कि वर्तमान स्थिति, चाहे वह अच्छी हो या बहुत अच्छी न हो, जिसमें सुधार की पूरी गुंजाइश है, केंद्र और राज्य सरकारों के निरंतर प्रयासों का ही परिणाम है. पीठ ने आगे कहा, "हम केवल यही कह सकते हैं कि अपनी आजादी की राह पर चलने के 75 से अधिक वर्षों के बाद भी, आज किसी भी कस्बे या शहर में बेटियों की शिक्षा, उत्थान और उनकी वित्तीय सुरक्षा से जुड़े पोस्टर देखना कोई असाधारण बात नहीं है. यहां तक कि दिल्ली में भी यह नज़ारा आम है, जहां दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की बसों पर अक्सर ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं."
सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणियां एक डॉक्टर द्वारा दायर उस अपील को खारिज करते हुए कीं, जिसमें 'गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन का प्रतिषेध) अधिनियम' (PCPNDT Act) की धारा 23 के तहत दंडनीय अपराधों के मामले में कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी.
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
गुजरात में नौवाहनविभाग और नौवहन कानूनों पर कार्यशाला का उद्घाटन

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में बड़े मामलों की सुनवाई

राममंदिर चढ़ावा चोरी मामले में सुप्रीम कोर्ट में 10 अगस्त को सुनवाई

भाजपा हमलावर, अदालत ने बोला झूठे थे उत्पीड़न के आरोप बृजभूषण शरण सिंह केस पर

लाइव लॉ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण आदेश और निर्णय - 3 अगस्त - 9 अगस्त, 2026

न्यायालय की संवेदनशीलता पुस्तिका

दिल्ली केस में भाग जाने वाली पत्नी और ससुर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज

पटना हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत के बाद दिया व्यक्ति के लापता होने के मामले में सीबीआई जांच का आदेश
ताज़ा ख़बरें
- निरीक्षण, मूल्यांकन और शिकायतें: केंद्र ने ट्रिब्यूनलों के लिए नए आयोग का प्रस्ताव रखा
- ममता बनर्जी पर हमला: अरविंद केजरीवाल का भाजपा पर तीखा हमला
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय साप्ताहिक राउंड-अप: 3 अगस्त - 9 अगस्त, 2026
- यूपी में खराब कानून व्यवस्था पर अखिलेश यादव ने की सरकार की आलोचना
- भाजपा सरकार ने कानून-व्यवस्था को बर्बाद कर दिया: अखिलेश यादव
- स्मृति सभा में शामिल होने पर टिस के दो छात्रों की गिरफ्तारी, अदालत ने जमानत देने से किया इनकार
- मंत्री पटेल ने विपक्ष के आरोपों का दी reply, कहा नहीं ओबीसी आरक्षण घटाया
- क्या भारत में किसी राज्य में धर्म परिवर्तन के लिए सबसे सख्त कानून है?

