सुप्रीम कोर्ट का फैसला: पैर कट जाने पर मुआवजे की राशि 40 लाख हो सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजे को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने बताया है कि मोटर दुर्घटना में मुआवजा तय करते समय केवल शारीरिक दिव्यांगता के प्रतिशत को ही आधार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि यह भी देखना अनिवार्य है कि उस चोट का संबंधित व्यक्ति की आजीविका पर कितना प्रभाव पड़ा है.

सौजन्य से:- ndtv.in
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजे को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत की पीठ ने स्पष्ट किया है कि मोटर दुर्घटना में मुआवजा तय करते समय केवल शारीरिक दिव्यांगता के प्रतिशत को ही आधार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि यह भी देखना अनिवार्य है कि उस चोट का संबंधित व्यक्ति की आजीविका पर कितना प्रभाव पड़ा है.
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक राजमिस्त्री को बड़ी राहत देते हुए कहा कि यदि किसी दुर्घटना में पैर घुटने के ऊपर से कट जाता है, तो पेशेवर रूप से उसकी कार्यात्मक दिव्यांगता को 100 फीसदी माना जाएगा.
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने तमिलनाडु के इस राजमिस्त्री को मिलने वाले मुआवजे की राशि को ₹29.01 लाख से बढ़ाकर ₹40.29 लाख कर दिया है.
क्या था पूरा मामला?
मामले के अनुसार, अप्रैल 2017 में नमक्कल-सेलम राजमार्ग पर साइकिल से जा रहे एक राजमिस्त्री को पीछे से आ रही एक लॉरी ने टक्कर मार दी थी. इस दुर्घटना में उसे गंभीर चोटें आईं और डॉक्टरों को उसका दाहिना पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा.
इसके बाद मेडिकल बोर्ड ने उसकी शारीरिक दिव्यांगता का आकलन 70 फीसदी किया था. इसी रिपोर्ट के आधार पर मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट ने उसकी आय क्षमता में 70 फीसदी की कमी मानते हुए मुआवजा निर्धारित किया था.
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट के फैसले को बदलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक राजमिस्त्री का काम पूरी तरह से शारीरिक श्रम और गतिशीलता पर निर्भर करता है. पैर कट जाने के बाद वह व्यक्ति अपना मूल पेशा किसी भी स्थिति में जारी नहीं रख सकता. इसलिए, व्यावहारिक रूप से उसकी आय अर्जित करने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो गई है.
अदालत ने कहा कि "अपीलकर्ता द्वारा झेली गई कार्यात्मक दिव्यांगता का आकलन 100% किया जाना चाहिए, न कि 70% जैसा कि ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट ने माना था."
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इस बात को दोहराया कि शारीरिक दिव्यांगता और कार्यात्मक दिव्यांगता दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं. किसी व्यक्ति के रोजगार या व्यवसाय पर चोट का वास्तविक व व्यावहारिक प्रभाव ही मुआवजा निर्धारण का मुख्य और महत्वपूर्ण आधार होना चाहिए.
भविष्य के मामलों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला आने वाले समय में उन सभी मामलों के लिए नजीर (मिसाल) बनेगा, जहां दुर्घटना के कारण किसी व्यक्ति की काम करने की क्षमता लगभग समाप्त हो जाती है भले ही चिकित्सा दृष्टि से उसकी शारीरिक दिव्यांगता 100 फीसदी न आंकी गई हो.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
ECI के दावे पर संदेह: क्या सुप्रीम कोर्ट ने नया फॉर्म‑6 घोषणा मंज़ूर किया?

बबेरू के दूकानदारों को सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश, विवाद में मिली राहत

तेलंगाना हाईकोर्ट ने SRSP विस्थापित महिला को कृषि भूमि न मिलने पर सरकार को किया कड़ा सवाल

फु क्वोक में छात्र मॉक ट्रायल से कानूनी ज्ञान और सामाजिक कौशल हासिल करते हैं

हाईकोर्ट ने किठौर मामले में आरोपी की जमानत अस्वीकृत, गवाहों पर दबाव की सम्भावना को प्राथमिकता दी

सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में 16,726 अवैध निर्माणों को सील‑ध्वस्त करने का आदेश दिया

हाईकोर्ट ने डॉक्टरों को चेतावनी: इलाज में देरी नहीं, २५,००० रुपये जुर्माना

MP उच्च न्यायालय में याचिकाओं से टैक्स ऑडिट डेडलाइन पर बढ़े प्रश्न
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को विवादास्पद नागरिकता डेटाबेस के उपयोग की स्वीकृति दी
- सुप्रीम कोर्ट ने SAVE डेटाबेस के इस्तेमाल को मंजूरी दी, ट्रम्प प्रशासन को राहत
- कानून का सही उपयोग: बहादुरपुर में एससी-एसटी अधिनियम पर बैठक
- सुप्रीम कोर्ट ने हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की याचिका खारिज की, आदेश से नहीं थोप सकते भाषा
- एपी हाई कोर्ट ने अमरावती को राजधानी मानने के बाद तीन‑राजधानी प्रस्ताव को निरर्थक घोषित किया
- सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं रोका SIR?
- महिला पहलवानों ने बृजभूषण सिंह की बरी को चुनौती, दिल्ली कोर्ट में दायर की अपील
- ICU सुधार में नया कदम: कोर्ट ने बुनियादी ढाँचा 9 महीने, स्टाफिंग 6 महीने में पूरा करने का आदेश

