होममुकदमेसुप्रीम कोर्ट ने कहा, गृहिणियों का काम सिर्फ खाना बनाना नहीं, वह परिवार की नींव मजबूत करती हैं
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गृहिणियों का काम सिर्फ खाना बनाना नहीं, वह परिवार की नींव मजबूत करती हैं

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला में कहा कि एक महिला की मौत होने पर उसके द्वारा की जाने वाली परिवार की देखभाल और घरेलू काम की कीमत कम से कम ₹30 हजार प्रति महीना होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी का काम केवल खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और घर संभालना नहीं है, वह परिवार की नींव को मजबूत बनाती है।

11 जून 2026 को 10:24 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गृहिणियों का काम सिर्फ खाना बनाना नहीं, वह परिवार की नींव मजबूत करती हैं

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

- Hindi News

- National

- Nation Builder Vs Homemakers; Wives Role Domestic Income | Supreme Court Judgement

सुप्रीम कोर्ट बोला-गृहणियों के काम की कीमत ₹30,000 महीना जितनी:उन्हें होममेकर नहीं नेशन बिल्डर कहें, वे परिवार की नींव मजबूत करती हैं

- कॉपी लिंक

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला में कहा, ‘सड़क हादसे में गृहिणियों की मौत होने पर उनके द्वारा की जाने वाली परिवार की देखभाल और घरेलू काम की कीमत कम से कम ₹30 हजार प्रति महीना (₹3.6 लाख सालाना) मानी जाएगी।’

जस्टिस संजय करोल और न्यायाधीश एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा- यह रकम 'प्रणय सेठी' मामले में तय अन्य सभी मुआवजा नियमों के अलावा होगी। घर संभालने वाली महिलाओं को राष्ट्र निर्माता (नेशन बिल्डर) का दर्जा मिलना चाहिए। उनके काम की तुलना किसी पेशेवर से करके उनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता।

दरअसल, कोर्ट का यह फैसला नवंबर 2001 में हरियाणा में सड़क हादसे में हुए गृहणी की मौत के मामले में हुई सुनवाई पर आया। सड़क हादसों के मुआवजा मामलों की सुनवाई करने वाले मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) में अक्सर गृहिणियों के योगदान का मूल्यांकन करना चुनौती होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है।

SC ने कहा- महिलाएं प्रतिदिन 7 घंटे से ज्यादा का करती हैं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 15-59 साल की आयु के बीच की महिलाएं प्रतिदिन 7 घंटे से अधिक समय बिना वेतन वाले घरेलू कामों में बिताती हैं, जबकि पुरुष ऐसे कार्यों में 3 घंटे से भी कम समय देते हैं।

महिलाएं बिना वेतन वाले देखभाल और घरेलू कार्य पुरुषों की तुलना में 2.6 गुना अधिक करती हैं, यहां तक कि तब भी जब वे आर्थिक रूप से योगदान दे रही होती हैं।'

सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अपील की है कि वे खुद ऐसे मामलों की निगरानी करें और निर्देश जारी कर तय समय में मामलों का निपटारा सुनिश्चित कराएं।

सुप्रीम कोर्ट की 5 बातें, कहा- दावों पर फैसले एक साल में हों

- एक गृहिणी का काम केवल खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और घर संभालना नहीं है। वह परिवार की नींव को मजबूत बनाती है, अगली पीढ़ी तैयार करती है। जब किसी दुर्घटना के कारण गृहिणी की मौत हो जाती है, तब उसका मुआवजा तय करते उसके योगदान का आकलन जरूरी है।

- यदि किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी घायल हो जाती है या उसकी मौत हो जाती है, तो परिवार को केवल उसकी आय न होने के आधार पर कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता।

- सड़क दुर्घटना के दावों का निपटारा आमतौर पर एक साल के भीतर हो जाना चाहिए। अगर पीड़ितों को दशकों तक इंतजार करना पड़े, तो कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है।

- गृहिणियों की आय का आकलन करते समय उनकी उम्र, एजुकेशन, स्किल, पारवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक हालात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

- 'मुआवजा न तो किसी के लिए अचानक छप्परफाड़ लॉटरी जैसा होना चाहिए और न ही इतनी कम रकम होनी चाहिए कि पीड़ित का मजाक बने।

अब समझिए अब तक क्या थे नियम?

देश की अदालतें और एक्सीडेंट ट्रिब्यूनल किसी हादसे में जान गंवाने वाली गृहिणियों का मुआवजा तय करने के लिए एक 'काल्पनिक आय' मानती थीं। इसके लिए राज्य के न्यूनतम वेतन को आधार बनाया जाता था, जो कि बहुत कम होता था।

2001 में हरियाणा की महिला की हादसे में मौत पर आया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला हरियाणा में एक मोटर एक्सीडेंट दावे पर आया। नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उसके पति और 3 बच्चों ने मुआवजे के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था।

ट्रिब्यूनल ने 2003 में मुआवजा दिया, लेकिन यह मामला सालों तक उलझा रहा। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दिसंबर 2024 में 8 लाख रुपए से ज्यादा का मुआवजा देने का आदेश दिया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट ने दुर्घटना के दो दशक से भी फैसला ना आने पर आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे के दावे पर आम तौर पर एक साल के अंदर फैसला आ जाना चाहिए।

बेंच ने जिस प्रणय सेठी के केस का जिक्र किया, उसके बारे में जानिए

प्रणय सेठी मामला मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून का एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच ने 2017 में दिया था।

मामला यह था कि सड़क दुर्घटनाओं में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय अलग-अलग अदालतें अलग-अलग तरीके अपना रही थीं। इस वजह से एक जैसे हालात में भी मुआवजे की राशि में बड़ा अंतर आ जाता था।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद यह सिद्धांत तय किया था कि सड़क दुर्घटना में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय मरने वाले की वर्तमान आय ही नहीं, बल्कि भविष्य में आय बढ़ने की संभावना को भी शामिल किया जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि अंतिम संस्कार, संपत्ति की हानि और जीवनसाथी के साथ संबंधों की हानि जैसी मदों के लिए एक समान और तय मानक अपनाए जाएं, ताकि देशभर में मुआवजा देने का तरीका एक जैसा और न्यायसंगत रहे, ताकि एक जैसे हालात होने पर अलग-अलग अदालतें, अलग-अलग मुआवजा न दें।

----------------------------

ये खबर भी पढ़ें…

दहेज केस में कहा- बेटी को बचाने की गुहार लगाने वाले को भिखारी कह रहे; सुप्रीम कोर्ट बोला-बहू और उसके परिवार का अपमान बंद करें

दहेज प्रताड़ना के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘आखिर लड़के शादी क्यों करते हैं, अगर उन्हें बाद में लड़की और उसके परिवार का अपमान ही करना है। समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि बहू और उसके परिवार का अपमान करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ पढ़ें पूरी खबर…

केरलम में निपाह वायरस लौटा, संक्रमित वेंटिलेटर पर: संपर्क में आए 15 लोग क्वारंटीन; शिगेला इंफेक्शन के भी 55 मरीज एडमिट, इनमें बच्चे ज्यादा

4 दिन में TMC के 4 राज्यसभा सांसदों का इस्तीफा: दावा-20 लोकसभा सांसद अलग गुट बना चुके; कल्याण बनर्जी बोले- ममता मुझे चुनें या अभिषेक को

मानसून बिहार पहुंचा, 8 दिन में 17 राज्य कवर: 2-3 दिन में झारखंड-छत्तीसगढ़ पहुंचेगा; यूपी-बिहार में आंधी और बिजली गिरने से 9 की मौत

NEET रीएग्जाम-संसदीय समिति ने चीन-अमेरिका से सीखने की नसीहत दी: चीन बोला- हमने बिना गड़बड़ी के 1.3 करोड़ छात्रों की परीक्षा कराई, देश एकजुट हुआ

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →
बिहार विश्वविद्यालय कानून के विरोध में शिक्षक संघों का प्रदर्शन
मुकदमे

बिहार विश्वविद्यालय कानून के विरोध में शिक्षक संघों का प्रदर्शन

लोकसभा में ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक पेश, 16 न्यायाधिकरणों के लिए निगरानी
मुकदमे

लोकसभा में ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक पेश, 16 न्यायाधिकरणों के लिए निगरानी

मानदेय बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी गई लड़ाई
मुकदमे

मानदेय बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी गई लड़ाई

पिछली तारीख से टैक्स की देनदारी सही, लेकिन जुर्माना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
मुकदमे

पिछली तारीख से टैक्स की देनदारी सही, लेकिन जुर्माना नहीं: सुप्रीम कोर्ट

बिहार में गुजरात मॉडल की शराबबंदी लागू होनी चाहिए: जीतन राम मांझी
मुकदमे

बिहार में गुजरात मॉडल की शराबबंदी लागू होनी चाहिए: जीतन राम मांझी

दुर्गा कॉलोनी का दोबारा सर्वे: फरीदाबाद में 234 एकड़ जमीन की होगी जांच, प्लॉटधारकों को राहत की उम्मीद
मुकदमे

दुर्गा कॉलोनी का दोबारा सर्वे: फरीदाबाद में 234 एकड़ जमीन की होगी जांच, प्लॉटधारकों को राहत की उम्मीद

पिता को अदालत का झटका: बेटी की शिक्षा के लिए जमा पैसा भरण-पोषण में नहीं गिना जा सकता
मुकदमे

पिता को अदालत का झटका: बेटी की शिक्षा के लिए जमा पैसा भरण-पोषण में नहीं गिना जा सकता

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मिलेगी दुर्गा बिल्डर कॉलोनी के प्लॉटधारकों को राहत
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मिलेगी दुर्गा बिल्डर कॉलोनी के प्लॉटधारकों को राहत

ताज़ा ख़बरें