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बार-बार न्याय की जड़ में एक सुप्रीम कोर्ट की कहानी: 14 साल से ज्यादा समय लगा दोषियों के केस का निपटारा

सुप्रीम कोर्ट ने सात दशकों पुराने मामले में फैसला सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने 5 साल में मामले का निपटारा किया जबकि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इसे 10 साल में कर दिया।

28 जून 2026 को 09:24 am बजे
बार-बार न्याय की जड़ में एक सुप्रीम कोर्ट की कहानी: 14 साल से ज्यादा समय लगा दोषियों के केस का निपटारा

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने गैर-इरादतन हत्या के एक मामले में अपील पर फैसला करने में 14 साल लगा दिए। जबकि ट्रायल कोर्ट ने 5 साल और हाई कोर्ट ने 10 साल में फैसला दिया था। इस दौरान2 दोषियों की मौत हो गई। सुप्रीम कोर्ट में 14 सालों में सिर्फ 12 तारीखों पर सुनवाई हुई।

नई दिल्ली: भले ही सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार इस कानूनी सिद्धांत का जिक्र किया है कि कि ''देर से मिला न्याय, न्याय को खत्म कर देता है'', फिर भी कई मौकों पर शीर्ष अदालत ने किसी मामले का फैसला करने में ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के मुकाबले ज्यादा समय लिया है। गैर-इरादतन हत्या के एक आपराधिक मामले में, सुप्रीम कोर्ट को अपील पर फैसला करने में लगभग 14 साल लग गए। इस दौरान, तीन दोषियों में से दो की मौत हो गई।

ट्रायल कोर्ट ने पांच साल में कार्यवाही पूरी कर ली थी और उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 10 साल में अपील का निपटारा कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर मौजूद रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले 14 सालों में सुप्रीम कोर्ट में इस अपील पर 12 तारीखों पर सुनवाई हुई।

क्या है पूरा मामला

यह मामला 1997 में 500 रुपये की घड़ी की बिक्री को लेकर हुई बहस से जुड़ा है, जो मारपीट में बदल गई और इसमें एक सूखी नहर में गिरने से विक्रेता की मौत हो गई। ट्रायल कोर्ट ने 2002 में तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया और उन्हें पांच साल की जेल की सजा सुनाई। तीनों ने हाई कोर्ट में अपील की, जिसने 2012 में उनकी सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इसके बाद वे सितंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट गए।

लगभग 30 साल बीत जाने और दोषी की उम्र को ध्यान में रखते हुए, जस्टिस उज्ज्वल भुयान और अरुण पल्ली की बेंच ने उसकी सजा को घटाकर उतनी ही कर दिया जितनी सजा वह पहले ही काट चुका था, यानी डेढ़ साल। बेंच ने कहा कि यह घटना 12 फरवरी, 1997 को हुई थी। अपील करने वाले की उम्र 33 साल थी।

अपील करने वाले की उम्र 60 साल से ज्यादा हो गई

आज हम 2026 में हैं, तब से लगभग तीन दशक बीत चुके हैं। अपील करने वाले की उम्र अब 60 साल से ज्यादा हो चुकी है। हमने मृतक और आरोपी के बीच हुई बहस की वजह पर भी ध्यान दिया है। सभी चोटें साफ तौर पर सूखी नहर में गिरने की वजह से लगी थीं, जिसकी सतह पथरीली थी।

अदालत ने कहा कि इतने समय बाद, हमारा मानना है कि अगर हम दोषसिद्धि (कनविक्शन) को बरकरार रखते हुए पांच साल की कठोर कैद की सजा को घटाकर उतनी ही सजा कर दें जितनी सजा अभियुक्त पहले ही काट चुका है, तो इससे न्याय के उद्देश्य पूरे होंगे।

लेखक के बारे मेंसंजीव कुमारसंजीव कुमार (सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर)

संजीव कुमार वर्तमान में नवभारत टाइम्स में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। वे मई 2025 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के नवभारत टाइम्स, डिजिटल विंग से जुड़े। पत्रकारिता में ऑनलाइन न्यूज डेस्क पर उन्हें काम करने का 6 साल का अनुभव है। नवभारत टाइम्स में जुड़ने से पहले वह अमर उजाला, वन इंडिया हिंदी और दैनिक जागरण के डिजिटल विंग में सेवा दे चुके हैं। वह वर्तमान में नवभारत टाइम्स में नेशनल और दिल्ली डेस्क से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं। खबरों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए स्रोतों की जांच के साथ तथ्यों की पुष्टि अनिवार्य रूप से करते हैं।

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संजीव कुमार ने पत्रकारिता में स्नातक और मास्टर की डिग्री हासिल करने के बाद अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में पत्रकारिता का शुरुआती ज्ञान लिया, यहां उन्होंने हेडलाइन, ब्रेकिंग न्यूज, लाइव कवरेज, स्पेशल खबरों को यूजर के इंटरेस्ट के अनुसार बनाने के तरीके को बारीकी से समझा। इसके बाद उन्होंने वन इंडिया हिंदी में नेशनल डेस्क पर काम किया। फिर दैनिक जागरण में बिहार-झारखंड की लोकल खबरों पर 1 साल 6 महीने तक काम किया है। इसके बाद नवभारत टाइम्स में पारी की शुरुआत की।

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