हाईकोर्ट ने पत्नी के 'तुम जैसे 1000 पति रख सकती हूं' कहने पर पति की सजा में दी राहत
हाईकोर्ट ने आरोपी पति की सजा घटा दी और कहा कि पत्नी का कहना 'गंभीर और अचानक उकसावा' था। इसके साथ ही अपराध को 'गैर-इरादतन हत्या' माना गया, जिससे आरोपी को मौत की सजा से राहत मिली

सौजन्य से:- Navbharat Times
Wife Murder Judgment : एक मामले में पत्नी के यह कहने पर कि 'मैं तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं', पति ने पत्नी का कत्ल कर दिया था। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी का ऐसा कहना गंभीर और अचानक उकसावा माना जा सकता है। और अदालत ने आरोपी पति की सजा घटा दी।
नई दिल्ली: पति पत्नी के रिश्तों में कई बार उग्र और हिंसक वारदात होने के मामले भी सामने आते हैं। ऐसे ही एक मामले में पत्नी के यह कहने पर कि 'मैं तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं', पति ने पत्नी का कत्ल कर दिया था। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी का ऐसा कहना गंभीर और अचानक उकसावा माना जा सकता है। और अदालत ने आरोपी पति की सजा घटा दी। क्या है यह पूरा मामला, और हाईकोर्ट ने किस आधार पर दी पति को सजा में दी राहत , जानेंगे इस लीगल स्टोरी में...
क्या है पूरा मामला और फैसले की पृष्ठभूमि
मामला मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का है, जहां वर्ष 2021 में पति-पत्नी के बीच हुए विवाद के दौरान पत्नी किरण की मौत हो गई थी। अभियोजन के अनुसार विवाद के दौरान पत्नी ने पति शिवा से कहा कि 'वह उसके जैसे 1000 पति रख सकती है।' इसके बाद गुस्से में आए पति ने पास पड़ा पत्थर उठाकर पत्नी पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। फिर निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
आरोपी की अपील से जुड़े इस मामले को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने सुना
खंडपीठ ने कहा कि पत्नी की टिप्पणी पति के सम्मान और उसके अस्तित्व पर अप्रत्यक्ष प्रहार मानी जा सकती है।
अदालत ने माना कि ऐसे शब्द परिस्थितियों के अनुसार किसी व्यक्ति का आत्मसंयम समाप्त कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी देखा कि आरोपी ने घटना के तुरंत बाद स्वयं पुलिस और अन्य लोगों को सूचना दी थी।
यदि हत्या पूर्व नियोजित होती तो आरोपी का ऐसा व्यवहार सामान्य नहीं माना जाता। अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी अपने साथ कोई हथियार लेकर नहीं गया था बल्कि मौके पर पड़ा पत्थर उठाकर वार किया।
हाईकोर्ट ने पूरे घटनाक्रम, गवाहों के बयान और आरोपी के घटना के बाद के आचरण का पुनर्मूल्यांकन किया। अदालत ने माना कि घटना अचानक हुई थी और पहले से हत्या की कोई योजना नहीं थी। इसे 'गंभीर और अचानक उकसावा' माना जा सकता है।
इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी की सजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग-I से बदलकर धारा 304 भाग-II के तहत कर दिया। इसके साथ ही उम्रकैद की सजा घटाकर सात वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दी गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर मामला उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही तय किया जाएगा।
इसके तहत, यदि कोई व्यक्ति किसी अचानक और बेहद गंभीर उकसावे में आकर बिना सोचे-समझे, बिना किसी पूर्व योजना के किसी की हत्या कर देता है, तो उस अपराध को 'हत्या' न मानकर 'गैर-इरादतन हत्या' माना जाता है, जिससे आरोपी को मौत की सजा से राहत मिल सकती है। कई मामलों में यह एक कानूनी बचाव के रुप में उपयोगी होता है।
गंभीर और अचानक उकसावा यानी Grave and Sudden Provocation
'गंभीर और अचानक उकसावा' का कानूनी सिद्धांत क्या है?
दरअसल कानून में हत्या और गैर-इरादतन मानव वध के बीच अंतर करने में गंभीर और अचानक उकसावा यानी Grave and Sudden Provocation का सिद्धांत बड़ी भूमिका अदा करता है। और फिर सजा भी उसी आधार पर होती है। यदि कोई इंसान अचानक हुए गंभीर उकसावे के कारण अपना आत्मसंयम भूल बैठता है और अपराध कर डालता है, तो कुछ हालतों में हत्या का यह अपराध कम गंभीर श्रेणी में माना जा सकता है। हालांकि मैं यहां बता दूं कि यह कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। अदालत ऐसे केस में, हर मामले में यह देखती है कि उकसावा कितना गंभीर था, घटना कितनी अचानक हुई और क्या आरोपी ने सोच-समझकर अपराध किया था।
देखा जाए तो मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला बताता है कि आपराधिक मामलों में न्यायालय केवल घटना के परिणाम को नहीं देखती। बल्कि उसके पीछे की परिस्थितियों, आरोपी की मानसिक स्थिति, पूर्व नियोजन की मौजूदगी तथा घटना के बाद के व्यवहार का भी गहन विश्लेषण करता है। अदालत ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए केवल सजा की प्रकृति में बदलाव किया। इस फैसले से साफ होता है कि 'गंभीर और अचानक उकसावा' का सिद्धांत सीमित परिस्थितियों में ही लागू होता है और इसका स्वतः लाभ किसी भी आरोपी को नहीं मिल सकता। परिस्थितियां और तथ्यों के आधार पर यह अदालतें ही तय करेंगी।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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