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सुप्रीम कोर्ट के आदेश से भागलपुर में NH-80 के दुकानदारों में खलबली, वैकल्पिक व्यवस्था की मांग

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से NH-80 पर अतिक्रमण हटाने की तैयारी हुई है, जिससे भागलपुर में दुकानदारों और व्यवसायियों में हलचल है। प्रशासन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करना बड़ी चुनौती होगी।

28 जून 2026 को 10:24 am बजे
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से भागलपुर में NH-80 के दुकानदारों में खलबली, वैकल्पिक व्यवस्था की मांग

सौजन्य से:- Jagran

NH 80 Encroachment : सुप्रीम कोर्ट के आदेश से NH-80 के दुकानदारों में खलबली, भागलपुर में शुरू हुई ये बड़ी तैयारी

सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रीय राजमार्गों को अतिक्रमण मुक्त करने के निर्देश से NH-80 के किनारे बसे दुकानदारों में हलचल है। भागलपुर में अभी कार्रवाई शुरू न ...और पढ़ें

HighLights

- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से NH-80 पर अतिक्रमण हटाने की तैयारी।

- भागलपुर में दुकानदारों और व्यवसायियों में बढ़ी हलचल।

- प्रशासन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करना बड़ी चुनौती।

संवाद सूत्र, अकबरनगर (भागलपुर)। राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) को पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश के बाद एनएच-80 के किनारे बसे बाजारों और व्यवसायियों के बीच हलचल तेज हो गई है। हालांकि भागलपुर जिले में अभी अतिक्रमण हटाने की कोई आधिकारिक कार्रवाई या अभियान शुरू नहीं हुआ है, लेकिन कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद लोगों के बीच इसकी चर्चा जोरों पर है।

भागलपुर से सुल्तानगंज तक अतिक्रमण की स्थिति अलग

एनएच-80 पर भागलपुर से सुल्तानगंज तक अतिक्रमण की स्थिति हर जगह अलग-अलग है। अकबरनगर बाजार में सड़क के दोनों ओर वर्षों से अतिक्रमण की समस्या बनी हुई है, जिससे अक्सर महाजाम की स्थिति पैदा हो जाती है। वहीं अकबरनगर से सुल्तानगंज और दोगच्छी तक सड़क चौड़ीकरण के बाद अधिकांश स्थानों पर दोनों ओर नालों का निर्माण हो चुका है।

नालों के ऊपर सजीं अस्थायी दुकानें

इस रूट पर स्थायी अतिक्रमण तो कम है, लेकिन नालों के ऊपर और उसके किनारे बड़ी संख्या में अस्थायी दुकानें लगती हैं। दूसरी ओर, नाथनगर क्षेत्र में एनएच के दोनों ओर स्थायी और अस्थायी अतिक्रमण काफी अधिक है। इसके अलावा प्रखंड के महेशी, अब्जूगंज, दिलगौड़ी, सुल्तानगंज स्टेशन रोड, घाट रोड व नगर पंचायत अकबरनगर बाजार से सिमराहा तथा थाना से इंग्लिश चिचरौंन तक भी कई स्थानों पर सड़क किनारे अस्थायी दुकानें और झुग्गी-झोपड़ियां दिखाई देती हैं।

प्रशासन के लिए आसान नहीं होगी यह कार्रवाई

स्थानीय लोगों और जानकारों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुपालन में अभियान चलाया जाता है, तो प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती घनी आबादी वाले बाजारों और वर्षों से कारोबार कर रहे दुकानदारों को हटाने की होगी। कई स्थानों पर सैकड़ों परिवारों की आजीविका इसी सड़क किनारे की दुकानों पर निर्भर है। ऐसे में कानून का पालन कराने के साथ-साथ उनके पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था करना भी प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा होगी।

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जानिए क्या है सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों की 'राइट ऑफ वे' (RoW) को पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त रखने का सख्त निर्देश दिया है। कोर्ट के मुताबिक सड़क, शोल्डर, नाला, फुटपाथ और भविष्य के चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहित की गई पूरी भूमि पर किसी भी प्रकार का स्थायी या अस्थायी अतिक्रमण नहीं होना चाहिए।

30 से 60 मीटर तक हो सकती है एनएच की सीमा

एनएच-80 में यह सीमा हर स्थान पर एक समान नहीं है। संबंधित हिस्से की स्वीकृत 'रॉव' (RoW) के अनुसार यह 30, 45 या फिर 60 मीटर तक हो सकती है। इसकी वास्तविक सीमा का निर्धारण एनएचएआई (NHAI) एवं पथ निर्माण विभाग के पुराने सरकारी अभिलेखों के आधार पर किया जा रहा है।

सड़क चौड़ी हुई, लेकिन फिर लौट आया अतिक्रमण

घोरघट से दोगच्छी तक एनएच-80 का चौड़ीकरण होने के बाद सड़क के दोनों ओर नालों का निर्माण कराया गया था, जिससे यातायात सुगम होने की उम्मीद जगी थी। लेकिन कुछ ही समय बाद कई स्थानों पर नालों के ऊपर और सड़क किनारे फिर से अस्थायी दुकानें, ठेले और अन्य अवैध कब्जे होने लगे। इससे सड़क की चौड़ाई का पूरा लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समय-समय पर प्रशासनिक निगरानी और कार्रवाई नहीं होने के कारण अतिक्रमण दोबारा बढ़ता गया।

नगर पंचायत अध्यक्ष ने उठाई वैकल्पिक व्यवस्था की मांग

इस मामले पर नगर पंचायत अध्यक्ष किरण देवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करना सभी के लिए आवश्यक है। यदि प्रशासन की ओर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होती है तो नगर पंचायत इसमें पूरा सहयोग करेगी। उन्होंने आगे कहा कि जहां अवैध अतिक्रमण है, वहां नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन साथ ही छोटे दुकानदारों और फुटपाथी व्यवसायियों के लिए वेंडिंग जोन जैसी वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए ताकि उनकी रोजी-रोटी प्रभावित न हो।

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