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मतदाता सूची विवाद: सुप्रीम कोर्ट में 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाने की कानूनी लड़ाई

पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि राज्य की मतदाता सूची से लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 326 के तहत मताधिकार एवं समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।

28 जून 2026 को 11:24 am बजे
मतदाता सूची विवाद: सुप्रीम कोर्ट में 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाने की कानूनी लड़ाई

सौजन्य से:- Navbharat Times

Adhir Ranjan Challenges Electoral Roll Revision:पश्चिम बंगाल मतदाता सूची विवाद, लगता है अभी थमा नहीं। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि राज्य की मतदाता सूची से लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटाए गए हैं।

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद बीजेपी की सरकार बनी, पर विवाद लगता है अभी थमा नहीं। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि राज्य की मतदाता सूची से लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 326 के तहत मताधिकार एवं समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।

पश्चिम बंगाल से 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाने का है मामला

यह खबर तो अभी तक मीडिया के प्लेटफार्म तक ही थी कि पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बड़ी मात्रा में मतदाताओं की छंटनी हुई है। लेकिन अब राज्य में लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर निर्वाचन आयोग की कार्रवाई को चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूची संशोधन के दौरान बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम बिना पर्याप्त कारण और उचित प्रक्रिया अपनाए हटा दिए गए। सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में शीघ्र हस्तक्षेप की मांग की गई है।

याचिका में उठाए गए संवैधानिक और कानूनी सवाल

अधीर रंजन की याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार, अनुच्छेद 19 तथा अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए। हालांकि पहले ऐसे सवालों के जवाब में निर्वाचन आयोग का पक्ष रहा है कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कानून के अनुरूप किया गया है और इसका उद्देश्य केवल फर्जी, मृत अथवा दोहरे नाम हटाना है। लेकिन अब अधीर रंजन चौधरी का तर्क है कि यदि किसी मतदाता का नाम हटाया जाता है तो उसे पहले कारण बताने का नोटिस और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। याचिका में निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है।

निर्वाचन आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण S.I.R. चुनावी प्रक्रिया को स्वच्छ और विश्वसनीय बनाने के लिए किया जाता है। आयोग के अनुसार इस प्रक्रिया में मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं। आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने का अधिकार प्राप्त है। सु्प्रीम कोर्ट ने भी अपने हाल के एक फैसले में Special Intensive Revision से जुड़ी सभी शंकाओं को खत्म करते हुए, चुनाव आयोग के कानूनी अधिकारों को मान्यता दी है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट आगे इस याचिका पर सुनवाई करता है तो उसके सामने आयोग की प्रक्रियाओं को वैधानिक प्रावधानों और प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर कसने की चुनौती है।

ऐसे में गौर तलब करने वाली बात यह है कि यह मामला केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। इससे पूरे देश में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया को प्रभावित हो सकती है। जिसे लेकर देश में अलग अलग स्तरों पर विवाद चल रहे हैं। लेकिन यदि सुप्रीम कोर्ट पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के पक्ष में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करता है तो भविष्य में निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची संशोधन के दौरान अधिक कठोर प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है। इससे मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता दोनों मजबूत होंगी। दूसरी ओर यदि शीर्ष अदालत याचिका पर सुनवाई कर आयोग की प्रक्रियाओं को अधीर रंजन के तर्कों के आगे सही पाती है। तो ऐसे में निर्वाचन आयोग के अधिकारों को फिर मजबूती मिलना तय है।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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