पत्नी से 13 दिनों तक बात न करना क्रूरता नहीं; सुसाइड केस में पति को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराए गए एक पति को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी से कुछ दिनों तक बातचीत न करना क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष गंभीर दुर्व्यवहार साबित करने में नाकाम रहा और इस बा…

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराए गए एक पति को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी से कुछ दिनों तक बातचीत न करना क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष गंभीर दुर्व्यवहार साबित करने में नाकाम रहा और इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक मतभेद और कभी-कभार की चुप्पी सामान्य बात है।
नई दिल्ली: पत्नी से अगर कोई पति 13 दिनों तक बात नहीं करता है तो इसे क्रूरता बिल्कुल भी नहीं माना जाएगा। ये टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आत्महत्या के एक मामले में पति को बरी कर दिया। दरअसल, मस्कट (ओमान) में इंजीनियर के तौर पर काम करने वाले जयेश कन्नन की पत्नी संगीता ने 31 जनवरी 2015 को मायके में आत्महत्या कर ली थी।
माता-पिता के घर जाने पर बंद की थी बात
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि संगीता के अपने माता-पिता के घर चले जाने के बाद, पति ने उससे फोन पर बात करने से इनकार कर दिया था, जिससे वह मानसिक रूप से परेशान हो गई और उसने अपनी जान दे दी। ट्रायल कोर्ट ने जयेश को IPC की धारा 498A के तहत दोषी ठहराया था और उसे 10,000 रुपये के जुर्माने के साथ तीन साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी।
आरोप साबित करने में नाकाम रहा अभियोजन
मद्रास हाई कोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा व्यवहार साबित करने में नाकाम रहा, जो इस तरह की आपराधिक जवाबदेही के लिए काफी हो। कोर्ट ने कहा कि सजा का एकमात्र आधार यह था कि पति ने अपनी पत्नी से सिर्फ 13 दिनों तक बात नहीं की थी।
अदालत में पेश नहीं किए गए कॉल रिकॉर्ड
बेंच ने पाया कि इस आरोप के समर्थन में भी सबूत बहुत कम थे। अभियोजन पक्ष ने जुबानी गवाही और WhatsApp रिकॉर्ड्स पर भरोसा किया था, जिनसे पता चलता था कि कोई मैसेज नहीं भेजा गया था। कोर्ट ने कहा कि 'सिर्फ WhatsApp पर मैसेज न भेजना ही काफी नहीं है, क्योंकि बातचीत सामान्य फोन कॉल के जरिए भी हो सकती थी। पति ने तर्क दिया कि उसने अपनी पत्नी से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन उसका फोन काम नहीं कर रहा था, इसलिए उसने उसके पिता को फोन किया था। इस बात को गलत साबित करने के लिए कोई कॉल रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया।
एक साल तक नहीं लगाया क्रूरता का आरोप
मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य मामले में अपने पहले के फैसले का जिक्र करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि क्रूरता को लगातार/बार-बार या कम से कम समय के बहुत कम अंतराल में साबित किया जाना चाहिए। छोटी-मोटी लड़ाइयों को क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि उस दौरान कोई क्रूरता का आरोप नहीं लगाया गया और न ही साबित हुआ, जब यह जोड़ा असल में साथ रहा था। यानी 2 नवंबर 2014 को शादी से लेकर 29 नवंबर 2014 को पति के मस्कट जाने तक। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें शादी की तारीख से लेकर अपीलकर्ता के भारत से मस्कट जाने तक, अपीलकर्ता के साथ रहने के दौरान मृतक के प्रति उत्पीड़न और क्रूरता का कोई आरोप साबित हुआ हो।
लेखक के बारे मेंअक्षय श्रीवास्तवअक्षय श्रीवास्तव, नवभारत टाइम्स (डिजिटल) में प्रिंसिपल डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। मार्च 2025 में उन्होंने टाइम्स समूह का डिजिटल विंग नवभारत टाइम्स (NBT Digital) ज्वाइन किया। यहां अक्षय न्यूज टीम का हिस्सा हैं और राष्ट्रीय खबरों के साथ-साथ दिल्ली और अपराध से जुड़े समाचारों का संपादन और क्यूरेशन करते हैं। समय-समय पर वह फील्ड रिपोर्टिंग में भी उतरते हैं। अक्षय ग्राउंड पर जाकर खबरों के पीछे छिपी कहानी को निकालने में रुचि रखते हैं। अपने 13 साल के पत्रकारिता के अनुभव में अक्षय ने रिपोर्टिंग के साथ-साथ डेस्क पर भी कई जिम्मेदारियां संभाली हैं। अक्षय ने साल 2019 और 2024 की राजनीति के निर्णायक लोकसभा चुनाव भी कवर किए हैं।
करियर के दौरान अक्षय ने प्रिंट मीडिया में एक लंबी पारी खत्म कर साल 2018 में डिजिटल मीडिया में कदम रखा। यहां उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता का शुरुआती काम सीखा। इसके बाद वह दैनिक भास्कर के डिजिटल सेक्शन में काम करने लगे। यहां उन्होंने जीके सेक्शन की जिम्मेदारी संभाली। आज तक में कार्य के दौरान अक्षय ने कनमैलियों पर एक एक्सक्लूसिव स्टोरी की, जो चर्चा का विषय रही। नवभारत टाइम्स में वह कफ सिरप पीकर अपने बच्चे गंवाने वाले परिवारों तक पहुंचे और उनका दर्द जाना।
पत्रकारिता का अनुभव
अक्षय का पत्रकारिता करियर हिंदी अखबार दैनिक नव भारत भोपाल के साथ साल 2013 में बतौर ट्रेनी शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश से प्रकाशित राज एक्सप्रेस न्यूज पेपर में 2014 से 2016 तक उप-संपादक के रूप में कार्य किया। 2016 से 2018 तक अक्षय ने दैनिक हरिभूमि समाचार पत्र में बतौर उप-संपादक काम किया। साल 2018 में दैनिक भास्कर के साथ उन्होंने डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद जनवरी 2022 में AajTak डिजिटल के साथ जुड़े और मार्च 2015 तक होम पेज पर अपनी सेवाएं दीं।
अक्षय ने एशिया के पहले पत्रकारिता विश्वविद्यालय माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से बीएससी (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) और एमएससी (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) की पढ़ाई की है। विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान वह कई प्रतियोगताओं में भाग लेकर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर चुके हैं।... और पढ़ें
कन्वर्सेशन शुरू करें
Indiaकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद Hindi Newsडिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नवभारत टाइम्स पर
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें

सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट एवं विभिन्न आयोगों में लंबित वादों की समीक्षा,

'बॉलिंग कैंपों को राहत मिलेगी': केन विलियमसन के संन्यास पर सचिन तेंदुलकर का स्पष्ट फैसला

Sirmour News: अदालत ने गैर-हाजिरी पर लगाया जुर्माना

सीबीएसई अभ्यर्थियों को कानूनी झटका, उच्च न्यायालय ने पुनर्मूल्यांकन याचिका खारिज की; NEET पुनः परीक्षा के लिए बहु-एजेंसी ग्रिड जुटाया गया

बिल्हौर-घाटमपुर के वादकारियों का संघर्ष

2026 लाइवलॉ (एससी) 622 | धीरज दत्ता बनाम अनिर्बान सेन और अन्य।

1.7K views · 11 reactions | #CoverStory | 'होममेकर' नहीं, 'नेशन बिल्डर' कहिए गृहिणी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला देश निर्माण में गृहिणी का बड़ा योगदान एक गृहिणी की मासिक आय ₹30,000 तय की शिक्षक ही नहीं, गृहिणी भी 'नेशन बिल्डर' गृहिणी के योगदान का विश्लेषण देखिए सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट Rekha Aggarwal और सोशल एक्टिविस्ट Dr Rakhi Agarwal से ज़ी बिज़नेस एंकर Deepak Dobhal की खास बातचीत #SupremeCourt #Homemaker #NationBuilder #Housewife #WomenEmpowerment #WomenRights | Zee Business

2026 लाइवलॉ (एससी) 621 | आयुक्त, ब्रुहत बैंगलोर महानगर पालिका बनाम के.के. उमेश कुमार एवं अन्य
ताज़ा ख़बरें
- भारतीय न्यायपालिका मजबूत विवाद समाधान तंत्र के रूप में मध्यस्थता को बढ़ावा देती है: सीजेआई सूर्यकांत
- कानपुर की दो तहसीलों को न्यायिक क्षेत्राधिकार मिलने में हो रही देरी
- सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका पर सुनवाई से क्यों किया इनकार? जानें क्या बताई वजह
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हैदराबाद विश्वविद्यालय के विद्वानों को मान्यता मिली
- सुप्रीम कोर्ट ने IAS रोहिणी सिंधुरी और IPS डी रूपा से विवाद खत्म करने जस्टिस कुरियन जोसेफ को मध्यस्थ नियुक्त किया
- सपना चौधरी Domestic Violence का शिकार, पति के दोषी होने पर घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनों में क्या होगी सजा
- Explainer: 50 साल बाद भी चर्चा में क्यों है इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला? इंदिरा को दोषी ठहराने के बाद क्या हुआ?

