सुप्रीम कोर्ट ने बताया - भारत में ट्रॉमा देखभाल प्रणाली पूरी तरह से विफल, सभी राज्यों में दुर्घटना पीड़ितों के लिए आवश्यक जीवनरक्षक उपायों को नहीं लागू
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से एक मजबूत ट्रॉमा केयर प्रणाली विकसित करने के लिए कहा है, जिसे सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम करने के लिए पांच महत्वपूर्ण उपायों पर जोर दिया गया है।

सौजन्य से:- Sanskriti IAS
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th July 2026, 6:00 PM
Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 5th July 2026, 8:00 AM
English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 20th July 2026
English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 15th July 2026, 8:00 AM
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- हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम करने के लिए राज्यों में एक समान और प्रभावी ट्रॉमा केयर प्रणाली (Trauma Care System) विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
- न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की रिपोर्टों से यह तथ्य सामने आया कि देश का कोई भी राज्य दुर्घटना पीड़ितों के लिए आवश्यक पांचों प्रमुख जीवनरक्षक उपायों को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया है।
- यह स्थिति तब है जब भारत दुनिया में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के मामले में सबसे गंभीर देशों में शामिल है।
- भारत में हर वर्ष लगभग 1.77 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इनमें से बड़ी संख्या ऐसी होती है जिन्हें समय पर चिकित्सा सहायता मिल जाती तो बचाया जा सकता था।
- दुर्घटना के बाद का पहला घंटा, जिसे "गोल्डन ऑवर (Golden Hour)" कहा जाता है, जीवन बचाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान त्वरित बचाव, एम्बुलेंस सेवा और उचित चिकित्सा उपचार मिलने पर मृत्यु की संभावना काफी कम हो जाती है।
- इसी उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा संगठन SaveLIFE Foundation की याचिका पर राज्यों को एक मजबूत ट्रॉमा केयर नेटवर्क विकसित करने के निर्देश दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने दुर्घटना प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए पांच महत्वपूर्ण उपायों पर विशेष बल दिया :
- देशभर में पुलिस, अग्निशमन, एम्बुलेंस और अन्य आपात सेवाओं को एक ही नंबर 112 से जोड़ने की व्यवस्था की गई थी, ताकि संकट की स्थिति में लोगों को अलग-अलग नंबर याद न रखने पड़ें।
-
सभी सरकारी और निजी एम्बुलेंसों में GPS आधारित ट्रैकिंग व्यवस्था हो ताकि निकटतम एम्बुलेंस को तुरंत भेजा जा सके और उसकी गतिविधि पर वास्तविक समय में निगरानी रखी जा सके।
- दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले नागरिकों को पुलिस या अस्पतालों द्वारा किसी प्रकार की पूछताछ अथवा उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।
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दुर्घटना से लेकर अस्पताल से छुट्टी मिलने तक पीड़ित की पूरी चिकित्सा यात्रा का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए, जिससे उपचार की गुणवत्ता का मूल्यांकन और नीतिगत सुधार किए जा सकें।
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दुर्घटना स्थल से घायल व्यक्ति को सुरक्षित निकालने, प्राथमिक उपचार देने और अस्पताल तक पहुंचाने की स्पष्ट एवं वैज्ञानिक प्रक्रिया विकसित की जाए।
- सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों ने बताया कि कोई भी राज्य इन पांचों मानकों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर रहा है।
- विशेष रूप से वे आठ राज्य, जिनमें देश की लगभग दो-तिहाई सड़क दुर्घटना मौतें होती हैं-उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार और आंध्र प्रदेश-भी इन व्यवस्थाओं को पूर्ण रूप से लागू नहीं कर पाए हैं।
- 2019 में शुरू किए गए राष्ट्रीय आपातकालीन नंबर 112 का उद्देश्य सभी आपात सेवाओं को एक मंच पर लाना था।
- लेकिन सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अधिक मौत वाले आठ राज्यों में से सात राज्यों ने अभी तक सभी हेल्पलाइन नंबरों का पूर्ण एकीकरण नहीं किया है।
- इसका परिणाम यह है कि दुर्घटना के समय लोग विभिन्न नंबरों के बीच भ्रमित हो जाते हैं और सहायता मिलने में देरी होती है।
- वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वाले नागरिकों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने Good Samaritan Rules, 2020 भी अधिसूचित किए।
- फिर भी जमीनी स्तर पर इन नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सका है।
- उच्च मृत्यु दर वाले राज्यों में केवल महाराष्ट्र और कर्नाटक ने गुड समैरिटन से जुड़ी शिकायतों के निवारण की व्यवस्था विकसित की है। अधिकांश राज्यों में ऐसी कोई प्रणाली उपलब्ध नहीं है।
- इसका परिणाम यह है कि अनेक लोग कानूनी परेशानियों के भय से दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने से बचते हैं।
- ट्रॉमा रजिस्ट्री किसी भी आधुनिक आपातकालीन स्वास्थ्य प्रणाली की आधारशिला मानी जाती है।
- यह दुर्घटना, एम्बुलेंस प्रतिक्रिया, अस्पताल में उपचार और रोगी के परिणामों से संबंधित विस्तृत आंकड़े संकलित करती है।
- फिर भी देश के 34 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में से 22 के पास ऐसी कोई समर्पित ट्रॉमा रजिस्ट्री नहीं है।
- तमिलनाडु, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश ने इस दिशा में अपेक्षाकृत बेहतर प्रगति दिखाई है।
- विशेष रूप से तमिलनाडु में रियल-टाइम ट्रॉमा रजिस्ट्री प्रणाली कार्यरत है, जिसमें दुर्घटना स्थल से लेकर अस्पताल उपचार तक की जानकारी डिजिटल रूप से दर्ज होती है।
- दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को सुरक्षित निकालना और उसे अस्पताल तक पहुंचाना एक विशेषज्ञ प्रक्रिया है।
- हालांकि आठ प्रमुख राज्यों में से सात ने किसी न किसी रूप में बचाव प्रोटोकॉल विकसित किया है, लेकिन पूरे देश में केवल 17 राज्यों के पास ही स्पष्ट और औपचारिक बचाव दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं।
- इस कमी के कारण कई बार घायल व्यक्ति को गलत तरीके से उठाने या स्थानांतरित करने से उसकी स्थिति और गंभीर हो जाती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने सभी एम्बुलेंसों में GPS ट्रैकिंग सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
- लेकिन अधिकांश राज्यों में यह सुविधा केवल सरकारी एम्बुलेंसों तक सीमित है। निजी एम्बुलेंसों का बड़ा हिस्सा अभी भी इस प्रणाली से बाहर है।
- राष्ट्रीय स्तर पर 13 राज्यों में GPS सुविधा या तो नहीं है या आंशिक रूप से लागू है।
- इसके अलावा केवल उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु ने एम्बुलेंस ट्रैकिंग डैशबोर्ड को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया है। अन्य राज्यों में आम नागरिक यह नहीं जान सकते कि निकटतम एम्बुलेंस वास्तव में भेजी गई है या नहीं।
- सर्वाधिक सड़क मृत्यु वाला राज्य।
- अधिकांश हेल्पलाइन 112 से जुड़ी हैं, लेकिन 102 मेडिकल सेवा अभी अलग है।
- गुड समैरिटन शिकायत प्रणाली नहीं।
- ट्रॉमा रजिस्ट्री पर विचार जारी।
- सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में अग्रणी।
- विस्तृत बचाव प्रोटोकॉल और रियल-टाइम ट्रॉमा रजिस्ट्री उपलब्ध।
- आपातकालीन नंबरों का आंशिक एकीकरण।
- केवल MEMS-108 एम्बुलेंसों में GPS सुविधा।
- गुड समैरिटन शिकायत निवारण प्रणाली उपलब्ध।
- ट्रॉमा केयर नीति विकसित।
- गुड समैरिटन व्यवस्था प्रक्रिया में।
- ट्रॉमा रजिस्ट्री का अभाव।
- केवल 108 एम्बुलेंसों की निगरानी।
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ट्रॉमा रजिस्ट्री की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) निर्माणाधीन।
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दुर्घटना संबंधी डेटा रखा जाता है, लेकिन अलग ट्रॉमा रजिस्ट्री नहीं है।
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112 से पहले से ही 108 आपातकालीन सेवा संचालित।
- नीति आयोग और AIIMS की वर्ष 2021 की Emergency and Injury Care Report के अनुसार भारत में होने वाली लगभग 30% ट्रॉमा-संबंधी मौतें आपातकालीन चिकित्सा सहायता में देरी के कारण होती हैं।
- यह दर्शाता है कि सड़क सुरक्षा केवल बेहतर सड़कें बनाने या यातायात नियमों का पालन कराने तक सीमित नहीं है। दुर्घटना के बाद की प्रतिक्रिया प्रणाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
मुख्य प्रश्न हैं :
- क्या दुर्घटना पीड़ित को समय पर खोजा जा सकता है?
- क्या निकटतम एम्बुलेंस तुरंत पहुंच सकती है?
- क्या आम नागरिक बिना डर के मदद करेंगे?
- क्या उपचार की गुणवत्ता का वैज्ञानिक मूल्यांकन हो रहा है?
- जब तक इन सवालों का सकारात्मक उत्तर नहीं मिलता, तब तक भारत में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों में उल्लेखनीय कमी लाना कठिन रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट की हालिया समीक्षा ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत में सड़क सुरक्षा की सबसे कमजोर कड़ी दुर्घटना के बाद की आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था है। गोल्डन ऑवर के दौरान प्रभावी चिकित्सा सहायता, आधुनिक ट्रॉमा केयर नेटवर्क, GPS आधारित एम्बुलेंस प्रणाली, गुड समैरिटन संरक्षण तथा डिजिटल ट्रॉमा रजिस्ट्री जैसी व्यवस्थाओं को शीघ्र लागू किए बिना सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली हजारों मौतों को रोकना संभव नहीं होगा। अब आवश्यकता केवल नीतियां बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने की है।
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