माता-पिता के विवाद से बच्चों को ही सबसे ज्यादा नुकसान
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के विवाद का सबसे अधिक नुकसान बच्चों को होता है। अदालत ने कहा कि कस्टडी में देरी से बच्चे को मानसिक और शारीरिक परेशानी झेलनी पड़ती है।

सौजन्य से:- Jagran
'माता-पिता के विवाद में बच्चों को होता है नुकसान', चाइल्ड कस्टडी मामले में दिल्ली HC की अहम टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक चाइल्ड कस्टडी मामले में कहा कि पति-पत्नी के विवाद का सबसे अधिक नुकसान बच्चों को होता है, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक परेशानी ...और पढ़ें
HighLights
- पति-पत्नी के विवाद का बच्चों पर सबसे अधिक नुकसान होता है।
- कस्टडी में देरी से बच्चे को मानसिक-शारीरिक परेशानी झेलनी पड़ती है।
- हाई कोर्ट ने पिता को अंतरिम कस्टडी का आदेश बरकरार रखा।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक चाइल्ड कस्टडी मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पति-पत्नी के बीच चल रहे विवाद का सबसे अधिक नुकसान बच्चों को उठाना पड़ता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कस्टडी से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी या बच्चे को दूसरे अभिभावक को सौंपने में टालमटोल करने से नाबालिग को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रतिकूल प्रभाव झेलना पड़ता है।
इसी के साथ हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें गर्मी की छुट्टियों के दौरान नाबालिग बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसके पिता को देने की अनुमति दी गई थी।
बार-बार अदालत के चक्कर लगाना बच्चे के लिए नुकसानदायक
न्यायमूर्ति तेजस करिया और न्यायमूर्ति मधु जैन की खंडपीठ ने कहा कि कस्टडी विवादों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण है। अदालत ने माना कि जब माता-पिता अपने विवाद के कारण बच्चे को समय पर दूसरे अभिभावक के पास नहीं भेजते, तो अंततः इसकी कीमत बच्चे को चुकानी पड़ती है।
ऐसे मामलों में लगातार अदालत का रुख करना भी बच्चे के मानसिक विकास और भावनात्मक संतुलन के लिए उचित नहीं है।
दोनों माता-पिता के साथ समय बिताने का है अधिकार
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि प्रत्येक बच्चे को अपने माता-पिता दोनों के साथ स्वस्थ और सार्थक संबंध बनाए रखने का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि छुट्टियों के दौरान कस्टडी देने में देरी करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया गया, तो इससे बच्चे के हितों के साथ-साथ दोनों अभिभावकों के साथ उसके संबंधों पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।
मां ने पिता की क्षमता पर उठाए थे सवाल
मामले में मां ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए दावा किया था कि पिता पहले तय मुलाकात संबंधी शर्तों का पालन नहीं कर सके थे और विदेश में अकेले बच्ची की देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि स्वयं मां को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं थी कि पिता भारत में रहने के दौरान बच्ची की देखभाल करें। ऐसे में यह तर्क उचित नहीं माना जा सकता कि लंदन में रहते हुए पिता उसकी देखभाल नहीं कर पाएंगे।
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फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने मां की अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के उस आदेश को यथावत रखा, जिसके तहत गर्मी की छुट्टियों के दौरान नाबालिग बच्ची को उसके पिता की अंतरिम कस्टडी में भेजने की अनुमति दी गई थी।
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