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मंदिर-मस्जिद विवाद: सुप्रीम कोर्ट की पहल का दोनों पक्षों ने किया अस्वीकार

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंदिर-मस्जिद विवादों को लोक अदालत के माध्यम से सुलझाने का प्रस्ताव दोनों पक्षों ने अस्वीकार कर दिया है। ज्ञानवापी, मथुरा और संभल के विवादों की अदालती सुनवाई को प्राथमिकता दी जा रही है।

13 जुलाई 2026 को 07:13 pm बजे
मंदिर-मस्जिद विवाद: सुप्रीम कोर्ट की पहल का दोनों पक्षों ने किया अस्वीकार

सौजन्य से:- Jagran

काशी, मथुरा, संभल विवाद: सुप्रीम कोर्ट की पहल मंदिर-मस्जिद पक्ष को नामंजूर

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंदिर-मस्जिद विवादों को लोक अदालत के माध्यम से सुलझाने का प्रस्ताव दोनों पक्षों ने अस्वीकार कर दिया है। ज्ञानवापी, मथुरा और संभल ...और पढ़ें

HighLights

- सुप्रीम कोर्ट का लोक अदालत प्रस्ताव दोनों पक्षों ने अस्वीकारा।

- ज्ञानवापी, मथुरा, संभल विवादों में अदालती सुनवाई को प्राथमिकता।

- पक्षकारों ने आपसी सुलह समझौते से इनकार किया।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। देश के तीन सबसे बड़े धर्मस्थल विवादों बनारस ज्ञानवापी, मथुरा कृष्ण जन्मस्थान-शाही मस्जिद ईदगाह और संभल जामा मस्जिद विवाद को आपसी सुलह समझौते के जरिए निपटाने की जगी उम्मीद शुरू में ही समाप्त होती दिख रही है।

मंदिर-मस्जिद दोनों पक्षों ने आपसी सुलह समझौते से मध्यस्थता के जरिए विशेष लोक अदालत में इन विवादों को निपटाने की सुप्रीम कोर्ट की पहल अस्वीकार कर दी है। दोनों पक्षों का कहना है कि उनके विवाद विधिवत सुनवाई से अदालत के जरिये निपटाए जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट कर रहा आयोजन

सुप्रीम कोर्ट मेगा लोक अदालत समाधान समारोह 2026 आयोजित कर रहा है। इसके तहत 21, 22 और 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में विशेष लोक अदालत आयोजित होगी, जिसमें पक्षों द्वारा आपसी सुलह समझौते से केस निपटाए जाएंगे। इन विशेष लोक अदालतों में सुलह समझौते से निपटाए जा सकने वाले मुकदमों की सुप्रीम कोर्ट पहचान करता है और फिर उन्हें विशेष अदालत में निपटाने के लिए पक्षकारों को प्रस्ताव भेजा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी क्रम में बनारस के ज्ञानवापी, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान-शाही मस्जिद ईदगाह और संभल की जामा मस्जिद विवाद को भी समाधान समारोह के तहत लगने वाली विशेष लोक अदालत में सुलह समझौते से सुलझाने के लिए चिह्नित किया था।

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सर्वोच्च अदालच ने भेजा था नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में पक्षकारों को नोटिस भेजकर सूचित किया था कि उनके मामलों को भी 21 ,22 और 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में आयोजित होने वाली विशेष लोक अदालत में निपटाने के लिए उचित पाया गया है और चिह्नित किया गया है।

इसके साथ ही पक्षकारों को एक तय तारीख देकर कहा गया था कि उक्त तारीख पर वे प्रि कंसिलियेशन यानी विशेष लोक अदालत में विवाद निपटाने से पहले आपसी मध्यस्थता और सुलह समझौते से विवाद निपटाने पर बातचीत और सहमति के लिए पेश हों।

जब दैनिक जागरण ने सुप्रीम कोर्ट की इस पहल और प्रस्ताव पर तीनों ही मामलों में मंदिर पक्ष के पक्षकार और वकील हरिशंकर जैन से संपर्क किया और पूछा कि क्या वे विशेष लोक अदालत में विवाद के निपटारे के प्रस्ताव पर सहमत हैं और उसमें हिस्सा लेंगे तो हरिशंकर जैन ने कहा कि उन्हें ये प्रस्ताव अस्वीकार्य हैं और वे लोकअदालत में विवाद निपटारे के लिए भाग लेने नहीं जाएंगे।

इसके बाद दैनिक जागरण ने ज्ञानवापी की अंजुमन इंतजामियां मसाजिद के संयुक्त सचिव एस. एम. यासीन से बात की जिसमें यासीन ने बताया कि उन्हें सूचना मिली है लेकिन मस्जिद पक्ष को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं है। मस्जिद पक्ष कोर्ट की सुनवाई से हल चाहता है। उनका कहना है कि दो दर्जन से ज्यादा केस वाराणसी जिला अदालत में इससे संबंधित लंबित हैं।

यासीन कहते हैं कि अगर इतनी समझदारी होती तो ये केस ही नहीं होते। ये समझौते से नहीं होगा। दैनिक जागरण ने मथुरा की शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी के सचिव तनवीर अहमद से जब पूछा तो उन्होंने कहा कि समझौते का कोई मतलब नहीं है। 18 मुकदमे लंबित हैं। ज्यादातर पक्षकार जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष सुलह समझौते के लिए नहीं आए।

तनवीर ने कहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार और विधिक सेवा प्राधिकरण को पत्र भेजा है जिसमें कहा है कि मेरा केस समाधान समारोह के तहत आयोजित विशेष लोक अदालत में न लगाया जाए। उन्होंने कहा कि 1968 में जो समझौता हो गया था, उसकी डिक्री है। तो अब समाधान की क्या जरूरत है। दैनिक जागरण ने संभल की शाही जामा मस्जिद के सदर जफर अली से बात की तो उन्होंने कहा कि वैसे तो उन्हें कोई सूचना नहीं मिली है।

लेकिन उन्हें यह प्रस्ताव अस्वीकार्य है। उनका कहना है कि हम किस बात की सुलह और मध्यस्थता करेंगे। जब सन 1877 में हमारा जामा मस्जिद का पक्ष इलाहाबाद हाई कोर्ट से जीत चुका है और हाई कोर्ट मान चुका है कि ये जामा मस्जिद है।

वो केस छेदालाल का था। ऐसे में हम कोई सुलह या मध्यस्थता नहीं चाहते। आखिर हम किस बात की मध्यस्थता और सुलह करेंगे जब हम पहले ही जीत चुके हैं। इस तरह तीनों मामलों से जुड़े दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है।

निचली अदालत और हाई कोर्ट में मामला लंबित

बताते चलें कि वैसे तो इन मामलों की मूल सुनवाई निचली अदालत और हाई कोर्ट में लंबित है। लेकिन इनकी विशेष अनुमति याचिकाएं जिनमें हाई कोर्ट के फैसलों को चुनौती दी गई है, सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं को विशेष लोकअदालत में आपसी सुलह से निपटाने के लिए उचित पाया था। सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट व जिला स्तर पर लोक अदालतों का आयोजन किया जाता है।

इसका उद्देश्य होता है कि पक्षकार वर्षों अदालत के चक्कर लगाने के बजाए आपसी सहमति एवं समझौते के माध्यम से विवादों का शांतिपूर्ण निस्तारण कर सकें। इसी उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट समाधान समारोह 2026 के अंतर्गत 21, 22 और 23 अगस्त को विशेष लोक अदालत आयोजित कर रहा है। इसमें सुप्रीम कोर्ट में लंबित वादों का निस्तारण सुलह और समझौतों के आधार पर किया जाएगा।

क्या हैं विवाद के मुद्दे समझिए

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी मस्जिद

वाराणसी में श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा ऐतिहासिक और कानूनी विवाद है। मंदिर पक्ष का मानना है कि ज्ञानवापी के नीचे आदि-विश्वेश्वर का मंदिर मौजूद है। 1669 में औरंगजेब द्वारा इसे तोड़े जाने के ऐतिहासिक साक्ष्य दिए जाते हैं। मस्जिद पक्ष का दावा है कि यह जमीन सदियों से वक्फ की संपत्ति है और यहां नियमित नमाज होती रही है।

वह 'पूजा स्थल अधिनियम 1991' का हवाला देता है, जो किसी भी धार्मिक स्थल के 1947 वाले स्वरूप को बदलने से रोकता है। मंदिर पक्ष की मांग पर जिला जज की अदालत ने एएसआइ सर्वे कराया, जिसमें मंदिर से जुड़े अवशेष और मूर्तियां मिलने का दावा किया गया है। फिलहाल यह मामला वाराणसी जिला अदालत, इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान बनाम शाही मस्जिद ईदगाह

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान की भूमि 13.37 एकड़ है। इसी में करीब पौने दो एकड़ भूमि में शाही मस्जिद ईदगाह बनी हुई है। 1670 में औरंगजेब ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान का मूल मंदिर तोड़कर उस पर शाही मस्जिद ईदगाह का निर्माण किया। 1815 में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा नीलामी में इसे वाराणसी के पटनीमल ने ले लिया। 1832 में मुस्लिम पक्ष के अताउल्ला ने डीएम के यहां गलत नीलामी की शिकायत की। तब से यह विवाद चलता रहा।

1968 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की कार्यदायी संस्था श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह के बीच समझौता हो गया। 2020 में लखनऊ निवासी अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री ने मथुरा की सिविल जज सीनियर डिवीजन के न्यायालय में वाद दाखिल कर कहा कि 1968 का समझौता गलत था। इसमें कोर्ट ने जो डिक्री की थी, वह भी अवैध है। डिक्री निरस्त कर जमीन श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को सौंप दी जाए। तब से अब तक 18 वाद इस मामले में दाखिल हो चुके हैं।

श्रीहरिहर मंदिर बनाम शाही जामा मस्जिद

19 नवंबर, 2024 को संभल के चंदौसी स्थित सिविल जज (सीनियर डिवीजन) कोर्ट में वाद दायर किया गया। गाजियाबाद निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन, नोएडा निवासी पार्थ यादव, संभल के कैला देवी महंत ऋषिराज गिरी समेत आठ याचिकाकर्ताओं ने संभल की शाही जामा मस्जिद को हरिहर मंदिर बताते हुए पूजा-अर्चना की अनुमति मांगी।

19 नवंबर को ही कोर्ट ने अधिवक्ता रमेश राघव को कमिश्नर नियुक्त कर सर्वे का आदेश दिया। कमिश्नर ने दोनों पक्षों की मौजूदगी में उसी दिन सर्वे शुरू किया। दो जनवरी को कमिश्नर ने सीलबंद लिफाफे में सर्वे रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल कर दी। इस बीच मस्जिद कमेटी सर्वे के विरोध में सुप्रीम कोर्ट गई। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट का विवादित स्थल पर यथास्थिति का आदेश है।

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