नागरिकता तय करने में निष्पक्षता जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने 27 लोगों को विदेशी घोषित करने का आदेश रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर 27 लोगों को विदेशी घोषित करने का फैसला पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि नागरिकता तय करने की प्रक्रिया निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत होनी चाहिए। इससे 27 अपीलकर्ताओं के मामले फिर से विदेशी न्यायाधिकरण में भेजे गए हैं।

सौजन्य से:- ETV Bharat
27 लोगों को विदेशी घोषित करने का फैसला पलटा! सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश को किया रद्द
कोर्ट ने कहा कि किसी की नागरिकता तय करने की प्रक्रिया निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत होनी चाहिए. जानिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश दिए हैं.
By Sumit Saxena
Published : July 13, 2026 at 4:53 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि नागरिकता और विदेशी नागरिक का दर्जा तय करने के लिए एक 'निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत' प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें 27 अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित किए जाने के फैसले को सही ठहराया गया था.
यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनाया. बेंच ने कहा कि नागरिकता और विदेशी होने का दर्जा तय करना बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी मामला है. बेंच ने सभी 27 अपीलों को स्वीकार कर लिया और इन मामलों को नए सिरे से सुनवाई और फैसले के लिए संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (विदेशी न्यायाधिकरण) के पास वापस भेज दिया.
बेंच ने कहा कि नागरिकता के मुद्दे पर फैसला पूरी तरह निष्पक्षता के नियमों के तहत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही कोर्ट ने भारतीय नागरिकता पर अवैध दावों को रोकने के राज्य सरकार के अधिकार को भी स्वीकार किया.
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह उन लोगों को रोके जो कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता के हकदार नहीं हैं, ताकि वे किसी गलत प्रक्रिया, झूठे दावों या कानूनी देरी का फायदा उठाकर नागरिकता हासिल न कर सकें. हालांकि, बेंच ने साफ किया कि इस मकसद को पूरा करने के लिए कानूनी प्रक्रिया की निष्पक्षता से समझौता नहीं किया जा सकता.
बेंच ने कहा, "इसके साथ ही, इस दर्जे (विदेशी या नागरिक) का फैसला एक ऐसी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए जो निष्पक्ष, कानूनी और तर्कसंगत हो..." बेंच ने यह साफ कर दिया कि उसने अपीलकर्ताओं की नागरिकता के दावों की खूबियों की जांच नहीं की है, और न ही उनके द्वारा पेश किए गए किसी दस्तावेज़ की प्रामाणिकता, स्वीकार्यता, प्रासंगिकता या पर्याप्तता पर कोई राय दी है.
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि संबंधित ट्रिब्यूनल को इन सवालों पर स्वतंत्र रूप से फैसला करना होगा. बेंच ने स्पष्ट किया कि मामले को वापस ट्रिब्यूनल भेजने का मकसद उन लोगों को कोई अनुचित या विशेष लाभ देना नहीं है, जो अपने दावों को साबित करने में असमर्थ हैं.
बेंच ने आगे कहा कि इसका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर परिणाम केवल उसी कानूनी प्रक्रिया से निकले, जो फॉरेनर्स एक्ट 1946, फॉरेनर्स (ट्रिब्यूनल्स) ऑर्डर 1964 और संविधान द्वारा तय निष्पक्षता के मानकों को पूरा करती हो. बेंच ने कहा कि संबंधित ट्रिब्यूनल इन मामलों पर नए सिरे से फैसला करेंगे और वे हाई कोर्ट या पिछले ट्रिब्यूनल द्वारा की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित नहीं होंगे.
बेंच ने निर्देश दिया कि संबंधित व्यक्तियों को आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर अपने-अपने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (विदेशी न्यायाधिकरण) के सामने पेश होना होगा. उन्हें ट्रिब्यूनल के सामने भारतीय नागरिकता के अपने दावे के समर्थन में लिखित बयान, दस्तावेजी सबूत और सभी जरूरी सामग्रियां दाखिल करने की भी छूट दी गई है.
फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल से यह भी अनुरोध किया गया है कि वे कानून के मुताबिक, तरजीही तौर पर छह महीने के भीतर इस नए सिरे से की जा रही सुनवाई और फैसले को पूरा करें.
इस मामले में दो याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील अदील अहमद ने कहा, "यह फैसला नागरिकता तय करने वाली प्रक्रियाओं में स्वाभाविक न्याय (प्रिंसिपल्स ऑफ नेचुरल जस्टिस) के सिद्धांतों की एक महत्वपूर्ण पुष्टि है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि प्रभावित व्यक्तियों को सक्षम फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के सामने अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिले."
इस मुख्य मामले में, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस एकतरफा (ex-parte) आदेश को दी गई चुनौती को खारिज कर दिया था, जिसमें याचिकाकर्ताओं को विदेशी घोषित किया गया था. हाई कोर्ट ने तब यह टिप्पणी की थी कि नोटिस तामील होने के बावजूद, कोई भी व्यक्ति ट्रिब्यूनल के सामने पेश नहीं हुआ था, और ट्रिब्यूनल के इस फैसले को लगभग 23 साल बाद चुनौती दी गई थी.
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