दिल्ली हाई कोर्ट ने पान मसाला केस में कंपनी की याचिका खारिज, शाहरुख, अजय, टाइगर को नोटिस पर चुनौती निरस्त
कोर्ट ने महाराष्ट्र के FDA द्वारा शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को भेजे गए शो‑कॉज नोटिस को चुनौती देती कंपनी की याचिका को क्षेत्रीय अधिकार न होने के कारण खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि ऐसे विवाद के निपटारे के लिए महाराष्ट्र की अदालत ही उपयुक्त होगी और दिल्ली से कंपनी के व्यापार या एंबेसडर नियुक्ति को आधार बना कर अधिकार क्षेत्र नहीं दिया जा सकता।

सौजन्य से:- etvbharat.com
पान मसाला एड केस: SRK, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को भेजे गए नोटिस के मामले में कोर्ट ने कंपनी की याचिका की खारिज
दिल्ली हाई कोर्ट ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को भेजे गए नोटिस के मामले में कंपनी की याचिका खारिज कर दी.
Published : September 14, 2026 at 8:41 PM IST
हैदराबाद: दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को पान मसाला बनाने वाली कंपनी की याचिका खारिज कर दी. इस याचिका में महाराष्ट्र फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) द्वारा कंपनी के सेलिब्रिटी ब्रांड एंबेसडर शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को जारी किए गए 'शो-कॉज नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) को चुनौती दी गई थी.
पीटीआई के मुताबिक, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि अधिकार क्षेत्र (टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन) न होने के कारण यह याचिका सुनवाई के लायक नहीं है. उन्होंने फोरम कन्वेनियंस के सिद्धांत के आधार पर कहा कि याचिकाकर्ता के लिए इस नोटिस से जुड़ी शिकायतों को उठाने के लिए महाराष्ट्र की कोर्ट ही सही और सुविधाजनक जगह हैं.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, 'इसलिए, याचिकाकर्ता की चुनौती के गुण-दोष पर कोई राय दिए बिना, इस आधार पर याचिका खारिज की जाती है. अगर कोई लंबित आवेदन है, तो उसका भी निपटारा किया जाता है.'
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा कि वह अपने ब्रांड के तहत इलायची प्रोडक्ट के प्रमोशन के लिए जाने-माने अभिनेताओं की सेवाएं लेती है और उनके साथ एंडोर्समेंट एग्रीमेंट करती है. कंपनी का कहना है कि उसका विज्ञापन अभियान लागू कानूनों का पूरी तरह से पालन करता है.
कंपनी ने कहा कि महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने रेगुलेटरी नोटिस जारी कर आरोप लगाया था कि कंपनी का विज्ञापन असल में पान मसाला का सरोगेट प्रमोशन (अप्रत्यक्ष प्रचार) हैं, जबकि महाराष्ट्र में चबाने वाले पान मसाला प्रोडक्ट पर प्रतिबंध है.
याचिका में कहा गया कि एफडीए ने विमल इलायची के विज्ञापनों में दिखने वाले अभिनेताओं को ऐसे दस्तावेज देने का निर्देश दिया था जिनसे यह साबित हो सके कि हमारा प्रोडक्ट प्रतिबंधित पान मसाला प्रोडक्ट से अलग है. साथ ही, एफडीए ने प्रमोशन कैंपेन रोकने और डिजिटल प्लेटफॉर्म से इससे जुड़ी सामग्री हटाने को भी कहा था.
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि 11 अगस्त का एफडीए नोटिस केवल अभिनेताओं को भेजा गया था, न कि खुद कंपनी को, जबकि राज्य रेगुलेटर की किसी भी कार्रवाई से कंपनी को ही सबसे ज्यादा और कभी न ठीक होने वाला नुकसान होगा. वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का मौका भी नहीं दिया गया.
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसकी राय में याचिकाकर्ता यह साबित करने में नाकाम रहा है कि इस मामले की कार्रवाई का कोई भी अहम या मुख्य हिस्सा इस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में हुआ है. महाराष्ट्र के एफडीए मुंबई ने याचिकाकर्ता द्वारा नियुक्त ब्रांड एंबेसडर (जो मुंबई के रहने वाले हैं) को महाराष्ट्र में गतिविधियों और कानूनी उल्लंघनों के संबंध में शो-कॉज नोटिसजारी किया था.
इसमें कहा गया है, 'हालांकि याचिकाकर्ता ने दिल्ली में स्थित मंत्रालय और FSSAI को रिट याचिका में पक्षकार बनाया है, लेकिन न तो उनमें से किसी के खिलाफ कोई विशेष राहत मांगी गई है और न ही इन अधिकारियों द्वारा जारी किसी निर्देश या आदेश को कोर्ट में चुनौती दी गई है या रिट याचिका के साथ रिकॉर्ड पर रखा गया है.'
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का दिल्ली से अपना कारोबार चलाना या दिल्ली से ब्रांड एंबेसडर नियुक्त करना—खासकर तब जब विवादित नोटिस याचिकाकर्ता को जारी नहीं किया गया हो, सुप्रीम कोर्ट और इस कोर्ट के न्यायिक उदाहरणों को देखते हुए, अकेले इस कोर्ट को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन) नहीं दे सकता.
जस्टिस शर्मा ने कहा कि कोर्ट याचिकाकर्ता के रजिस्टर्ड ऑफिस, भुगतान की जगह, या विज्ञापन अभियान की योजना या प्रबंधन की जगह जैसे तथ्यों का चुनिंदा रूप से हवाला देकर अधिकार क्षेत्र बनाने की अनुमति नहीं दे सकती, जब उन तथ्यों का विवादित नोटिस की वैधता पर कोई सीधा असर न हो.
हाई कोर्ट ने कहा कि कोर्ट को ऐसी स्थिति से भी बचना चाहिए जहां दलीलों को इस तरह से पेश किया जाए कि मामूली तथ्यों को कॉज ऑफ एक्शन रूप में दिखाया जाए, जबकि असली विवाद से जुड़े मुख्य तथ्य कहीं और हों. इसमें आगे कहा गया कि जिन तथ्यों का मुकदमे पर कोई असर नहीं होता, या जो केवल पृष्ठभूमि के तथ्य होते हैं, वे केवल याचिका में बताए जाने के कारण क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं बनाते हैं.
कंपनी ने दावा किया था कि विज्ञापनों को रोकने के निर्देश जारी करने का अधिकार क्षेत्र महाराष्ट्र के एफडीए के पास नहीं था. अपनी याचिका में, कंपनी ने यह भी दावा किया कि सरोगेट विज्ञापन के आरोप बेबुनियाद थे क्योंकि 2001 से महाराष्ट्र में पान मसाला का निर्माण या बिक्री नहीं हुई है, और सुप्रीम कोर्ट ने 2013 से देश भर में तंबाकू वाले पान मसाले पर रोक लगा रखी है.
केंद्र और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने तर्क दिया था कि याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर की जानी चाहिए थी क्योंकि कारण बताओ नोटिस महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी किया गया था.
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