सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम से बाहर करने की याचिका खारिज की
पाँच जजों की पीठ ने मेडिको लीगल सोसायटी द्वारा दायर क्यूरेटिव याचिका को नकार दिया, जिससे 1995 के V.P. शांथा फैसले में स्थापित चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता कानून के दायरे में रखने वाला सिद्धांत बरकरार रहा। अब रोगी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत डॉक्टर या अस्पताल की लापरवाही के लिए मुकदमा दायर कर सकते हैं, जबकि डॉक्टरों को पूर्णरूपेण दायरे से बाहर नहीं किया गया। फरवरी 2026 में दायर अलग याचिका अभी भी न्यायिक कार्यवाही में है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
कई बार गलत चिकित्सा की वजह से मरीजों को झेलना पड़ जाता है। ऐसे में आम मरीजों के मन में एक बड़ी उलझन रहती है..क्या डॉक्टर और अस्पताल Consumer Protection Act के दायरे में हैं?
नई दिल्ली: देश मे आए दिन मेडिकल लापरवाही की खबरें सामने आती हैं। ऐसे में चिकित्सीय लापरवाही के मामलों में डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लिया है। अदालत ने डॉक्टरों को Consumer Protection Act के दायरे से बाहर करने की मांग वाली क्यूरोटिव याचिका को खारिज कर दिया। इस बड़े फैसले लेने के पीछे पांच जजों की पीठ है...जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन शामिल हैं। आइए जानते हैं....इस फैसले की पूरी बात और लीगल पहलू...
सुप्रीम कोर्ट के सामने Curative Petition, क्यों हुई खारिज
दरअसल...यह याचिका ...मेडिको लीगल सोसायटी की ओर से डॉ. राजीव डी. जोशी ने दायर की थी। इस याचिका के जरिए सर्वोच्च न्यायालय के उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही पर दिए गए 1995 के अपने ऐतिहासिक फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें शीर्ष अदालत ने चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (सीपीए) के दायरे में लाया था।
सुप्रीम कोर्ट में पुराने फैसले, याचिका के तथ्यों और..उपलब्ध दस्तावेजों विचार करने के बाद पांच जजों की पीठ ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं बनता जो याचिका में हस्तक्षेप की तय कसौटियों को पूरा करता हो।
यहां खास बात यह है कि अदालत ने 1995 के Indian Medical Association v. V.P. Shantha & Others फैसले के मेरिट पर नया फैसला देकर नहीं बदला, बल्कि यह कहा कि 1995 के फैसले के मद्देनजर..याचिका को स्वीकार करने के लिए जरूरी आधार ही नहीं है।
साल 1995 में इस केस में तीन जजों की पीठ ने यह सवाल तय किया था कि क्या डॉक्टर और अस्पताल द्वारा दी जाने वाली चिकित्सा को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत 'सेवा' के अंतर्गत माना जा सकता है? इसके फैसले ने मरीज को, परिस्थितियों के अनुसार, उपभोक्ता और डॉक्टर व अस्पताल को सेवा प्रदाता के रूप में उपभोक्ता कानूनों के फ्रेमवर्क में लाने का रास्ता बनाया।
V.P. Shantha & Others, (1995) का फैसला क्या था ?
सुप्रीम कोर्ट और उपभोक्ता हितों का ख्याल
इस पूरे मामले में वर्तमान में तो यही कहना ठीक रहेगा कि Indian Medical Association v. V.P. Shantha & Others, (1995) का फैसले के खिलाफ याचिका खारिज होने से 1995 वाला फैसला ही मान्य है। डॉक्टरों और अस्पतालों की उपभोक्ता कानूनों के प्रति जवाबदेही समाप्त नहीं हुई है। लेकिन एक बात और भी है कि फरवरी 2026 में डॉक्टरों को उपभोक्ता कानूनों के दायरे से बाहर करने की एक अलग याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया था और वह प्रश्न अभी भी अलग से शीर्ष अदालत की कार्यवाही में विचाराधीन है। उम्मीद कर सकते हैं कि उसमें भी सुप्रीम कोर्ट उपभोक्ता हितों का भरपूर ख्याल रखेगा।
फिलहाल की स्थिति यही है कि आम मरीजों के लिए इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि चिकित्सा सेवाओं में कथित कमी के मामलों में कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत उपलब्ध उपाय बना हुआ है। वे उपभोक्ता कानूनों का सहारा ले सकते हैं। दूसरी ओर, डॉक्टरों के लिए इसका मतलब यह भी नहीं है कि इलाज का हर बेकार परिणाम उपभोक्ता या उपभोक्ता कानूनों के प्रति जवाबदेही पैदा करेगा।
दरअसल कानूनी विवाद में यह देखना जरूरी होगा कि क्या वास्तव में सेवा में कमी, लापरवाही या अन्य कार्रवाई योग्य लापरवाही या चूक हुई है। और क्या उसके समर्थन में पर्याप्त तथ्य एवं साक्ष्य हैं। एक बात यह भी है कि 1995 के फैसले का उद्देश्य चिकित्सा परिणामों की शत प्रतिशत गारंटी बनाना भी नहीं था।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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