सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों को उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में रहने की पुष्टि की
सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के ऐतिहासिक फैसले को पुनः खोलने वाले क्यूरेटिव याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि चिकित्सा सेवाओं में लापरवाही के लिए उपभोक्ता अदालत में कार्रवाई की जा सकती है। पाँच जजों की पीठ ने यह निर्णय फिर से नहीं बदलेगी, जिससे डॉक्टर और अस्पताल उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उत्तरदायी रहेंगे।

सौजन्य से:- Hindustan
डॉक्टर उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में ही रहेंगे
सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में लिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें डॉक्टरों और अस्पतालों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत लाया गया था। पांच जजों की पीठ ने सुधारात्मक याचिका खारिज करते हुए कहा कि उपभोक्ता अदालत में चिकित्सा सेवाओं में लापरवाही के लिए कार्रवाई हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर और अस्पताल को उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में लाने वाले अपने 31 साल पुराने फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने 1995 के फैसले के खिलाफ दाखिल क्यूरेटिवक यानी सुधारात्मक याचिका खारिज करते हुए उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत डॉक्टरों और अस्पतालों की जिम्मेदारी पर अपनी आखिरी कानूनी मुहर लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में ऐतिहासिक फैसला देते हुए चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में लाया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति. प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पांच जजों की पीठ ने मेडिको लीगल सोसाइटी ऑफ इंडिया के डॉ. राजीव डी. जोशी की ओर से दाखिल सुधारात्मक याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि इस याचिका पर विचार करने के लिए तय किए गए नियमों के तहत कोई मामला नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जारी संक्षिप्त आदेश ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वी.पी. शांता मामले में 1995 के फैसले को चुनौती देने वाले हालिया प्रयास को खत्म कर दिया है। इस फैसले के तहत मरीज के इलाज में किसी तरह की लापरवाही/सेवाओं में कमी के लिए डॉक्टरों और अस्पतालों के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उपभोक्ता अदालत में जाने का प्रावधान किया था।पीठ ने सुधारात्मक याचिका खारिज करते हुए कहा कि हमने इस याचिका और संबंधित दस्तावेजों को देखा है। हमारी राय में, रूपा अशोक हुरा बनाम अशोक हुरा मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2002 के फैसले में बताए गए नियमों के तहत कोई मामला नहीं बनता है। दरअसल, यह घटनाक्रम तब हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में शांता फैसले पर फिर से विचार करने से इनकार कर दिया था। यह मामला वकीलों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे से बाहर रखने के फैसले के बाद उठा था। वकीलों को उपभोक्ता संरक्षण के दायरे से बहार रखने के फैसले में तीन जजों की पीठ ने कहा था कि ‘क्या 1995 के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है, क्योंकि कोर्ट ने फैसला दिया था कि कानूनी पेशेवरों के खिलाफ सेवा में कमी के लिए उपभोक्ता कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती। अब पांच जजों की पीठ ने अपने संक्षिप्त फैसले में कहा कि इस रेफरेंस ही जरूरत नहीं थी। पीठ ने कहा कि वकीलों पर पिछला फैसला खास तौर पर कानूनी पेशे से संबंधित था और वकीलों को उपभोक्ता कानून से बाहर रखने का मतलब यह नहीं है कि मेडिकल सेवाओं से जुड़े कानून को फिर से खोलने की जरूरत है।
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