सुप्रीम कोर्ट ने पूछा: अर्धसैनिक बलों में नेतृत्व के लिये योग्य अधिकारी क्यों नहीं हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति और अपने कर्मियों की वरिष्ठता पर केंद्र सरकार से प्रश्न उठाए। कोर्ट ने कहा कि 25‑30 साल के अनुभव वाले CRPF, ITBP और BSF के अधिकारियों को नेतृत्व की भूमिका न देने का कदम अनुचित है, और CAPF (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी।

सौजन्य से:- Jagran
क्या अर्धसैनिक बलों में नेतृत्व के लिए योग्य अधिकारी नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने अर्धसैनिक बलों में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति और बल के अपने अधिकारियों की वरिष्ठता विवाद पर केंद्र सरकार से सवाल किया।
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अर्धसैनिक बलों में प्रतिनियुक्ति और वरिष्ठता को लेकर आइपीएस अधिकारियों तथा बल के खुद के अधिकारियों के बीच जारी विवाद को सुलझाने में कथित नाकामी पर केंद्र से बुधवार को सवाल किया।
शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि क्या केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए कोई योग्य अधिकारी नहीं है?
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। याचिका में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह ‘शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।’
बुधवार को जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने सीएपीएफ में आइपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को लेकर केंद्र से सवाल करते हुए एडिशनल सालिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी से पूछा कि क्या अर्धसैनिक बलों में नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए कोई योग्य अधिकारी नहीं हैं।
जस्टिस भुइयां ने पूछा, ‘क्या आपको लगता है कि सीएपीएफ में नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए कोई योग्य अधिकारी नहीं है?’ इसे गलत कदम बताते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘ऐसे अधिकारी भी हैं जिन्होंने सीआरपीएफ, आईटीबीपी और बीएसएफ में 25-30 वर्षों तक सेवा की है, फिर भी उन्हें नेतृत्व की भूमिकाएं नहीं दी गई हैं।’
उन्होंने कहा, ‘आप उनके साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे हैं?’ जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘वे भी हमारी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। वे भी हमारे लिए लड़ रहे हैं और सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं...।’
सरकारी वकील ने सरकार के कदम का बचाव करते हुए कहा कि सीएपीएफ से जुड़ा फैसला ‘एक के मुकाबले दूसरा’ वाला मुद्दा नहीं, बल्कि एक नीतिगत फैसला है। चार अगस्त को पीठ ने 34 सीएपीएफ अधिकारियों की याचिका को लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया था।
(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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