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सुप्रीम कोर्ट ने अडानी-राजस्थान पावर विवाद में फिर किया फेरबदल, पूर्व जज की जगह दूसरे जज को बनाया आर्बिट्रेटर

सुप्रीम कोर्ट ने अडानी से जुड़ी कंपनी पारसा कांटा कोलियरीज लिमिटेड (PKCL) और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के बीच चल रहे मध्यस्थता विवाद में एक पूर्व जज की जगह नए पूर्व जज को नियुक्त करने का आदेश दिया है। 2019 में यही जज एक विवादित फैसला सुना चुके हैं जिसके बाद से आरोप लगा रहे हैं कि इस फैसले को मध्यस्थता की प्रक्रिया से बचाया गया था।

9 अगस्त 2026 को 07:16 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने अडानी-राजस्थान पावर विवाद में फिर किया फेरबदल, पूर्व जज की जगह दूसरे जज को बनाया आर्बिट्रेटर

सौजन्य से:- ThePrint Hindi

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त को अडानी से जुड़ी कंपनी पारसा कांटा कोलियरीज लिमिटेड (PKCL) और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के बीच चल रहे मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) विवाद में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अरुण मिश्रा की जगह एक और पूर्व जज जस्टिस एस.के. कौल को नियुक्त कर दिया.

RRVUNL ने आर्बिट्रेटर बदलने की मांग की थी. उसका कहना था कि 2019 में जस्टिस मिश्रा ने दोनों कंपनियों के बीच एक अलग विवाद में फैसला दिया था.

पहला और मौजूदा विवाद PKCL और RRVUNL के बीच कोयले की ढुलाई से जुड़े 30 साल पुराने समझौते से संबंधित हैं.

2019 का विवाद भी उस समय चर्चा में आया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने उस साल गर्मियों की छुट्टियों के दौरान इस मामले को तय क्रम से हटकर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था. इसके बाद वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने तत्कालीन CJI रंजन गोगोई को एक खुला पत्र लिखा था. अगस्त 2019 में लिखे इस पत्र में दवे ने गर्मियों की छुट्टियों के दौरान जस्टिस मिश्रा की बेंच के सामने अडानी से जुड़े दो मामलों को तय क्रम से हटकर सूचीबद्ध किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई थी.

इनमें से एक मामला PKCL और RRVUNL के बीच का विवाद था.

दो जजों की उस बेंच में जस्टिस एम.आर. शाह दूसरे जज थे.

PKCL, अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड और RRVUNL के बीच एक जॉइंट वेंचर है. दोनों के बीच कोयले के विकास, खनन और ढुलाई के लिए 30 साल पुराना समझौता है. यह वेंचर अक्टूबर 2007 में बनाया गया था. इस समझौते के तहत अडानी एंटरप्राइजेज के पास 74 प्रतिशत और RRVUNL के पास बाकी 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है.

2019 का विवाद क्या था

2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विवाद कीमत बढ़ने, तय लागत और एस्क्रो अकाउंट में रखे गए पैसों से जुड़ा था.

[राजस्थान?] हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों से जुड़े 2015 के एक आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में दखल दिया था और RRVUNL के पक्ष में फैसला दिया था. इसके खिलाफ अपील पर जस्टिस मिश्रा और जस्टिस शाह की बेंच ने PKCL की अपील को आंशिक रूप से मंजूर किया था. कीमत बढ़ने से जुड़े आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को बहाल करते हुए बेंच ने तय लागत और एस्क्रो अकाउंट में रखे गए पैसों से जुड़े 78 करोड़ रुपये के PKCL के दावे को खारिज किए जाने के फैसले को बरकरार रखा था.

इस मामले को तय क्रम से हटकर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने पर दवे ने आपत्ति जताई थी. उन्होंने बताया था कि अगस्त 2018 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आर.एफ. नरीमन और इंदु मल्होत्रा की बेंच ने इस मामले में अपील की अनुमति दी थी.

लेकिन अप्रैल 2019 में रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) ने एक नोटिस जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि गर्मियों की छुट्टियों के दौरान नियमित सुनवाई वाले मामलों की सुनवाई की जाएगी. उस समय CJI की मंजूरी से ऐसा किया गया था.

इसके बाद 9 मई को सुनवाई के लिए मामलों की एक सूची जारी की गई और उसमें PKCL और RRVUNL के बीच की सिविल अपील भी शामिल थी. खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के एक रजिस्ट्रार ने 14 मार्च 2019 के एक आदेश में कहा था कि मामला सुनवाई के लिए तैयार नहीं था.

इसके बावजूद, 21 मई को मामले को जस्टिस मिश्रा और जस्टिस शाह की बेंच के सामने सूचीबद्ध किया गया. दो दिनों तक इसकी सुनवाई हुई और 22 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया गया. पांच दिन बाद मामले में फैसला सुना दिया गया. अंतिम फैसला जस्टिस शाह ने लिखा था.

मौजूदा विवाद क्या है

मौजूदा विवाद में RRVUNL ने 2019 की कार्यवाही का हवाला देते हुए जस्टिस मिश्रा की आर्बिट्रेटर के तौर पर नियुक्ति का विरोध किया था.

लेकिन 3 जुलाई को राजस्थान हाई कोर्ट की एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की अगुवाई वाली बेंच ने जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति कर दी. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में RRVUNL ने नए आर्बिट्रेटर की नियुक्ति की मांग की.

3 अगस्त को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने RRVUNL की अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कौल को नियुक्त करने का आदेश दिया. लेकिन यह फैसला दोनों पक्षों की सहमति के बाद लिया गया, जिसे कोर्ट ने काफी समझाने के बाद हासिल किया.

सुनवाई के दौरान PKCL के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव बनर्जी ने आर्बिट्रेटर बदलने के सुझाव से असहमति जताई. उन्होंने कहा कि RRVUNL की अपील में जिस फैसले का हवाला दिया गया है, वह पुराना है. उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से मामला पेश किया गया, उस पर उन्हें गंभीर चिंता है.

CJI सूर्यकांत की बेंच के सवाल पर RRVUNL के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि 2019 में तय किया गया मामला उसी कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा था, जिसकी अब एक अलग विवाद में जांच हो रही है. उन्होंने कहा कि इसमें शामिल पक्ष भी वही थे.

इस पर बनर्जी ने साफ किया कि जस्टिस मिश्रा ने वह फैसला नहीं लिखा था.

दीवान ने आर्बिट्रेटर बदलने की मांग पर जोर दिया और बेंच से कहा कि “इन परिस्थितियों में” एक आर्बिट्रेटर नियुक्त करके “हम सभी को शर्मिंदगी से बचाया जाए.”

बेंच ने अपनी स्थिति बताई और कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व जज को शर्मिंदगी में नहीं डालना चाहती. बाद में दोनों पक्ष जस्टिस कौल के नाम पर सर्वसम्मति से सहमत हो गए. बेंच ने अपने आदेश में इस सहमति को दर्ज किया और उनकी नियुक्ति को अंतिम रूप दे दिया.

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि RRVUNL की याचिका में आर्बिट्रेटर बदलने के लिए दिया गया आधार कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं था.

RRVUNL के वकील अधिवक्ता कार्तिक सेठ ने दिप्रिंट से कहा, “न्यायिक प्रक्रिया की ईमानदारी उतनी ही इस बात पर निर्भर करती है कि वह निष्पक्ष दिखाई दे, जितनी इस बात पर कि वह वास्तव में निष्पक्ष हो. वकील के तौर पर हमारा मकसद किसी मौजूदा या रिटायर्ड जज पर कोई आरोप लगाना नहीं था. हमारी चिंता ने कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया था. क्या कोई ऐसा जज, जिसने पहले उन्हीं पक्षों के बीच हुए विवादों पर न्यायिक रूप से काम किया हो, बाद में आर्बिट्रेटर के तौर पर काम कर सकता है, खासकर तब जब सेक्शन 12 के तहत किए गए खुलासे में उस पहले के न्यायिक संबंध का जिक्र नहीं हो.”

हालांकि, उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा मामले में RRVUNL ने इस सवाल पर जोर नहीं दिया और न ही इस पर अंतिम फैसला हुआ, “क्योंकि दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट के सामने एक और योग्य पूर्व जज को आर्बिट्रेटर नियुक्त करने पर सहमत हो गए.”

सेठ ने कहा, “इसलिए हमारी चुनौती का मकसद पूरा हो गया था और उस बड़े सवाल पर सिर्फ कानूनी चर्चा के लिए फैसला मांगने की बहुत कम वजह थी, क्योंकि उस मामले में अब इसका जवाब देना जरूरी नहीं रह गया था.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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