होमवकीलदिल्ली हाई कोर्ट ने पीएम आवास के पास की झुग्गी‑बस्तियों को 6 हफ्ते में खाली करने, पुनर्वास के लिए विशेष कमेटी का आदेश दिया
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दिल्ली हाई कोर्ट ने पीएम आवास के पास की झुग्गी‑बस्तियों को 6 हफ्ते में खाली करने, पुनर्वास के लिए विशेष कमेटी का आदेश दिया

चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच ने मस्जिद कैंप, बीआर कैंप और डीआईडी कॉलोनी की झुग्गी‑बस्तियों को सावदा घेरे में DUSIB कॉलोनी में वैकल्पिक घर देकर छह सप्ताह के भीतर खाली करने का निर्देश दिया। सात सदस्यीय निगरानी समिति, जिसका अध्यक्षता रिटायर्ड न्यायिक अधिकारी मन मोहन शर्मा करेंगे, पुनर्वास के दौरान सरकार के वादों की पूर्ति और आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी।

28 अगस्त 2026 को 03:55 am बजे
दिल्ली हाई कोर्ट ने पीएम आवास के पास की झुग्गी‑बस्तियों को 6 हफ्ते में खाली करने, पुनर्वास के लिए विशेष कमेटी का आदेश दिया

सौजन्य से:- Navbharat Times

दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास के पास स्थित झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने साथ ही सात सदस्यीय मॉनिटरिंग कमेटी बनाई है, ताकि पुनर्वास बेहतर हो सके।

दिल्ली के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक, प्रधानमंत्री आवास के आसपास रहने वाले झुग्गी बस्ती के परिवारों के पुनर्वास का मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले तक पहुंच गया है। 25 अगस्त 2026 को चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच ने तीन झुग्गी क्लस्टरों के निवासियों को छह सप्ताह में सावदा घेवरा में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। अदालत ने साफ किया कि पुनर्वास अर्थ पूर्ण तरीके से होना चाहिए और लोगों के गरिमा के साथ जीवन के अधिकार की रक्षा भी करनी होगी।

किन किन झुग्गी बस्तियों को खाली करने का आदेश दिया गया?

दरअसल ये दिल्ली की झुग्गी बस्तियां दशकों पुरानी हैं। कई बार पहले भी इन्हें विस्थापित किए जाने की कोशिश हुई थी। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने जो आदेश दिया है, वह मस्जिद कैम्प, बीआऱ कैम्प और डीआईडी कॉलोनी की झुग्गी-झोपड़ी की बस्तियों पर लागू है। ये बस्तियां प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास वाले लोक कल्याण मार्ग रेस कोर्स क्षेत्र के आसपास जिसे अब पंचवटी के नाम से जाना जाता है...स्थित हैं। अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक इन बस्तियों को हटाकर निवासियों को DUSIB Colony, सावदा घेरा में वैकल्पिक आवास देने की योजना बनाई गई है। रिकॉर्ड में लगभग 717 के आसपास रिहाइशी झुग्गियां के हटाए जाने और पात्र निवासियों के पुनर्वास की चर्चा है।

निगरानी समिति जिसमें अलग अलग क्षेत्रों से सात अनुभवी लोग शामिल होंगे, का कार्य यह देखना है कि पुनर्वास के दौरान सरकार द्वारा किए गए वादों के मुताबिक जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों। कमेटी का कार्यकाल छह महीने रखा गया है, जिसे जरूरत पड़ने पर दो महीने और बढ़ाया जा सकता है। उसके चेयरपर्सन को मतभेद की स्थिति में अंतिम और बाध्यकारी निर्णय लेने का अधिकार भी दिया गया है।

दिल्ली हाई कोर्ट की निगरानी समिति की देखरेख में होगा विस्थापन

सरकार ने उठाया था पीएम आवास और संवेदनशील सुरक्षा मुद्दा

सरकार की ओर से अदालत में मुख्य तर्क यह रहा कि ये झुग्गी बस्तियां एक संरक्षित और अति संवेदनशील क्षेत्र में हैं तथा भारतीय वायु सेना स्टेशन के बिल्कुल पास स्थित हैं। केंद्र के मुताबिक अनधिकृत निर्माण हटाना रक्षा ढांचे को सुरक्षित करने और महत्वपूर्ण सार्वजनिक एवं सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है। दिल्ली हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में यह तर्क दर्ज है। ऐसे में कहा जा सकता है कि अदालत के सामने सिर्फ जमीन पर कब्जे या अतिक्रमण का सामान्य विवाद नहीं था। राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा भी सरकार की कार्रवाई का एक प्रमुख आधार था।

दरअसल इस संवेदनशील मामले को दिल्ली हाई कोर्ट ने काफी संवेदनशीलता से हैंडल किया है। अदालत ने कहा कि निवासी छह सप्ताह के भीतर मौजूदा घर खाली करेंगे, लेकिन इसी अवधि में उन्हें सावदा घेवरा में आवंटित वैकल्पिक आवास में बसाया जाना है। छह सप्ताह की अवधि के बाद जमीन खाली कराने के लिए जरूरत पड़ने पर पुलिस सहायता ली जा सकती है। इससे अदालत ने बेदखली एवं पुनर्वास को एक-दूसरे से जोड़ा है। यानी आदेश का कानूनी ढांचा यह है कि पहले वैकल्पिक आवास समाधान हो, फिर मौजूदा जमीन खाली कराई जाए।

गौर तलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी के लिए सात सदस्यीय निगरानी समिति गठित की है। इसकी अध्यक्षता रिटायर्ड दिल्ली हायर ज्यूडिशियल सर्विसेज अधिकारी मन मोहन शर्मा करेंगे। कमेटी में DUSIB, DDA, केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय, दिल्ली जल बोर्ड, शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया जाना है।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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