सुप्रीम कोर्ट ने कहा: जांच रोकना अदालत का काम नहीं, डिफॉल्ट जमानत रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को उलटते हुए PFI मामले में डिफॉल्ट जमानत समाप्त की और आरोपी को 30 दिनों में सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध की जांच करना पुलिस का विशेष अधिकार है और अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि जांच कब बंद की जाए, केवल विशेष परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप संभव है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
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'पुलिस को जांच कब रोकनी है, यह तय करना अदालतों का काम नहीं’, PFI मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
Contributed by: अमित आनंद चौधरी•Edited by: अशोक उपाध्याय|टाइम्स न्यूज नेटवर्क•
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सुप्रीम कोर्ट ने PFI मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए डिफॉल्ट जमानत खत्म कर दी। कोर्ट ने कहा कि अपराध की जांच पुलिस का विशेष अधिकार है और जांच की दिशा व अवधि तय करने में अदालत को सीमित दखल देना चाहिए।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जांच की प्रक्रिया को लेकर अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी अपराध की जांच करना पुलिस का विशेष अधिकार है। अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि जांच कब पूरी हो या कब रोक दी जाए। कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के एक सदस्य के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए जांच की अवधि बढ़ाने से इनकार कर दिया गया था।
जांच का तरीका तय करना पुलिस का अधिकार
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि जांच एजेंसी को कानून के दायरे में अपनी जांच आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता है। अदालत पुलिस को मिले वैधानिक अधिकारों में सामान्य तौर पर कटौती नहीं कर सकती। हालांकि, ऐसे मामलों में हस्तक्षेप संभव है जहां तथ्यों के आधार पर इसकी जरूरत हो या कानून पुलिस की जांच पर रोक लगाता हो।
पीठ ने कहा, 'किसी अपराध की जांच करना पुलिस का खास काम है। यह तय करना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है कि किसी मामले में जांच कब रोकनी चाहिए।'
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच का तरीका और उसे आगे बढ़ाने का निर्णय जांच एजेंसी पर छोड़ा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी संज्ञेय अपराध की परिस्थितियों की जांच करने के पुलिस के कानूनी अधिकार में अदालत दखल नहीं दे सकती।
कोर्ट ने कहा कि अपराध की जांच करना कार्यपालिका के माध्यम से राज्य का जरूरी कर्तव्य है, ताकि अपराध की सच्चाई सामने आ सके और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।
मोबाइल और बैंक लेनदेन की जांच के लिए मांगा था समय
इस मामले में जांच एजेंसी ने आरोपियों से जब्त मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से मिले डेटा की जांच के लिए अतिरिक्त समय मांगा था। एजेंसी यह पता लगाना चाहती थी कि इन उपकरणों से मिले डेटा का आरोपियों को भारत की संप्रभुता को कमजोर करने वाली कथित आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ने में क्या संबंध है। इसके अलावा आरोपियों के बैंक खातों में हुए लेनदेन की भी जांच की जानी थी। जांच एजेंसी को यह पता लगाना था कि इन वित्तीय लेनदेन का कथित आतंकवादी गतिविधियों से कोई संबंध है या नहीं।
डिफॉल्ट जमानत रद्द, 30 दिन में सरेंडर का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए आरोपियों को मिली डिफॉल्ट जमानत भी रद्द कर दी। कोर्ट ने आरोपियों को 30 दिनों के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में जांच एजेंसी के वैधानिक अधिकार और अदालत की जांच में दखल की सीमाओं को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई है।
लेखक के बारे मेंअशोक उपाध्यायअशोक उपाध्याय, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का 12 साल का अनुभव। साल 2014 में नवभारत टाइम्स हिंदी अखबार से पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की थी। पॉलिटिक्स और क्राइम बीट पर रिपोर्टिंग का काफी अनुभव है। अमर उजाला देहरादून में भी सेंट्रल डेस्क पर काम किया है। साथ ही कई चुनावों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की है। पिछले 6 साल से NBT डिजिटल में न्यूज डेस्क पर काम कर रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स को पकड़ने की अच्छी समझ है।
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पत्रकारिता अनुभव: प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 12 साल से कार्यरत हैं।
JIMMC नोएडा से साल 2013 में पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले साल 2010 में एमएमएच कॉलेज गाजियाबाद (सीसीएस यूनिवर्सिटी मेरठ) से राजनीतिक शास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की। लोक प्रशासन विषय पर खास पकड़ है। पत्रकारिता से पहले यूपीएससी और उत्तराखंड और यूपी पीसीएस एग्जाम की तैयारी के दौरान समाजशास्त्र, संविधान समेत कई विषयों का अध्ययन किया। संवेदनशील मुद्दों पर लिखने की खास कला है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कई मार्मिक लेख लिखे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए लोगों की समस्याओं के समाधान का प्रयास किया है, कई बार सफलता भी मिली है। पत्रकारिता में आगे और बेहतर सीखने और समझने का क्रम जारी है।... और पढ़ें
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