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वन अधिकार कानून पर वन विभाग की अड़चन: 27 हजार गाँवों को क्यों नहीं मिला सामुदायिक वन अधिकार

मध्यप्रदेश में लगभग 27 हजार गांव सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) के दायरे में आ सकते हैं, पर अभी तक केवल चार को ही मंजूरी मिली है। स्थानीय स्तर पर दावे दर्ज किए गए हैं, फिर भी वन विभाग के हस्ताक्षर और अधिकार पत्रों की कमी के कारण प्रक्रिया अटकी हुई है, जिससे वन संरक्षण की पहलें रुकती दिख रही हैं।

22 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
वन अधिकार कानून पर वन विभाग की अड़चन: 27 हजार गाँवों को क्यों नहीं मिला सामुदायिक वन अधिकार

सौजन्य से:- ETV Bharat

वन अधिकार कानून पर वन विभाग का अड़ंगा? 27 हजार गांव बिना मंजूरी कैसे करेंगे वन संरक्षण

वन अधिकार कानून को लेकर दो मत, प्रदेश के करीब 27 हजार गांवों को सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) मंजूरी पर अटका

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : September 22, 2026 at 10:38 AM IST

भोपाल : मध्यप्रदेश में जंगल बचाने और उसका प्रबंधन करने का अधिकार जिन ग्राम सभाओं को कानून ने दिया, वही अधिकार अब वन विभाग की मंजूरी के फेर में फंसता नजर आ रहा है. यानी प्रदेश के करीब 27 हजार गांव सीएफआर यानी सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के दायरे में आ सकते हैं, लेकिन अब तक सिर्फ 4 गांवों को ही अधिकार मिला है. जबकि करीब 200 गांव दावे दाखिल कर चुके हैं.

कई मामलों में स्थानीय स्तर पर प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद अधिकार पत्र अटके होने का आरोप है. इधर टास्क फोर्स के सदस्यों का कहना है कि अधिकार मिलने के बाद गांव जब जंगल और जलस्रोत बचाने की कोशिश करते हैं, तब भी वन विभाग हस्तक्षेप करता है.

वन विभाग पर अड़ंगे का आरोप, पीसीसीफ के पत्र पर भी सवाल

टास्क फोर्स सदस्य मिलिंद थत्ते का आरोप है कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय की ओर से जारी एक पत्र में गांवों को सीएफआर (कम्यूनिटी फॉरेस्ट रिसोर्स) अधिकार देने की जरूरत पर ही सवाल उठाया गया है. उनका कहना है कि यह वन अधिकार कानून की भावना के विपरीत है और सरकार को इस पत्र को वापस लेना चाहिए. वहीं, टास्क फोर्स के दूसरे सदस्य शरद चंद्र लेले ने कहा, '' सीएफआर अधिकार मिलने के बाद जंगल के संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी भी ग्राम सभा की होती है. वन विभाग को इसे अपनी शक्ति कम होने के तौर पर देखने के बजाय कानून के तहत ग्राम सभाओं की भूमिका के रूप में देखना चाहिए.''

चार गांवों में भी पूरी तरह लागू नहीं हुआ अधिकार

टास्क फोर्स सदस्यों के मुताबिक जिन चार गांवों को सीएफआर अधिकार मिल चुके हैं, वहां भी प्रक्रिया पूरी तरह सुचारू नहीं है. उनका दावा है कि चार में से दो गांवों को सही अधिकार पत्र मिले, जबकि दो गांवों के टाइटल में खामियां हैं. ग्राम सभाएं इन्हें सुधारने के लिए आवेदन कर चुकी हैं. सदस्यों ने यह भी बताया कि झाबुआ के दो गांवों ने अधिकार मिलने के बाद जंगल संरक्षण की गतिविधियां शुरू कीं. एक गांव में श्रमदान से पानी रोकने के लिए बांध बनाने और दूसरे में पौधरोपण की कोशिश की गई, लेकिन उनके अनुसार वन विभाग ने दोनों गतिविधियों में हस्तक्षेप किया.

दावे मंजूर, लेकिन अधिकार पत्र अलमारी में

टास्क फोर्स सदस्यों का कहना है कि कुछ जिलों में जिला स्तरीय समितियों के स्तर पर दावों को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन वन विभाग के अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं होने से अधिकार पत्र जारी नहीं हो पा रहे. उनका सवाल है कि अगर कानून ग्राम सभा को अधिकार देता है और प्रक्रिया में एक विभागीय स्तर पर मामला अटक जाए, तो अधिकारों की मान्यता का उद्देश्य कैसे पूरा होगा.

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टास्क फोर्स की बैठक पर भी सवाल

टास्क फोर्स के सदस्यों के अनुसार पिछली बैठक में जिन मुद्दों पर कार्रवाई का भरोसा दिया गया था, उनका क्रियान्वयन अभी तक नहीं हुआ है. साथ ही करीब एक साल से टास्क फोर्स की बैठक नहीं हुई. उनका कहना है कि टास्क फोर्स का कार्यकाल दो साल का है और नवंबर में मौजूदा कार्यकाल पूरा होना है. सदस्यों की अपेक्षा थी कि छह महीने में कम से कम एक बैठक हो, लेकिन अब तक सिर्फ दो बैठकें हुई हैं. ऐसे में टास्क फोर्स ने मुख्यमंत्री कार्यालय और सचिव स्तर पर बैठक बुलाने को लेकर चर्चा की है. सदस्यों का कहना है कि बैठक नहीं होने की स्थिति में अब वे इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में हैं.

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